'जड़ें ईरान में पर जुड़ाव हैदराबाद से महसूस करता हूं'

  • दीप्ति बत्तिनी
  • बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद
हैदाराबाद ईरानी चाय

इमेज स्रोत, Sangeetham Prabhakar

"जब कोई हैदराबाद का नाम लेता है तो जो पहली चीज़ दिमाग में आती है, वो है ईरानी चाय और बिरयानी. ये मेरी रोज़ की ज़िंदगी का अहम हिस्सा हैं. मुझे हर रोज़ चलते रहने के लिए तीन कप चाय की ज़रुरत होती है."

एक से दूसरे प्याले में चाय डालते हुए एक 50 बरस के फुटवेयर व्यापारी ने ये बातें कहीं.

'रेड रोज़' रेस्टोरेंट उन तमाम जगहों में से एक है जहां ईरानी पाकशैली के असर वाले लखमी समोसा जैसे पकवानों के साथ ईरानी चाय परोसी जाती है.

इमेज स्रोत, Sangeetham Prabhakar

हैदराबाद से है लगाव

चाय पीने जुटे लोगों की फ़रमाइश पूरी कराते और कांउटर की ज़िम्मेदारी संभाल रहे नौजवान की उमर है 18 बरस और नाम है सैयद मोहम्मद रज्ज़ाक.

उनके दादा सैयद अली अकबर बोलूकी सत्तर के दशक में ईरानी अंदाज़ का कैफ़े 'सिटी लाइट्स' शुरू करने हैदराबाद आए थे.

रज्ज़ाक बताते हैं, "मेरे पिता सैदय रज्ज़ाक बोलूकी ने 28 साल पहले रेड रोज़ रेस्त्रां को शुरू किया था. हालांकि मेरी जड़ें ईरान में हैं लेकिन मैं भारत ख़ासकर हैदराबाद की संस्कृति से ज्यादा जुड़ाव महसूस करता हूं. बहुत कम कैफ़े हैं जहां हमारी तरह की ईरानी चाय मिलती है. जिस प्यार के साथ लोग इसे पीते हैं, उसे देखकर मुझे बहुत गर्व होता है."

इमेज स्रोत, WIKEPEDIA

ईरान का प्रभाव

ईरानी चाय ऐसा इकलौता तार नहीं है जो हैदराबाद और ईरान को जोड़ता है. 16 वीं सदी में क़ुली क़ुतब शाह का शाही घराना ईरान से दिल्ली आया था और वहां से उसने दक्कन यानी दक्षिण की ओर रुख किया.

हैदराबाद पर ईरान की संस्कृति, वास्तु शिल्प, खान-पान और भाषा का गहरा प्रभाव था. निज़ाम ईरानियों को सम्मान के साथ 'आगा साहब' कहते थे.

दक्कन के इतिहास में ख़ासा दखल रखने वाले और डेक्कन हेरिटेज ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी मुहम्मद सफीउल्लाह कहते हैं, "अगर हम इतिहास देखें तो हैदराबाद को ईरानियों ने बसाया था. इतिहास के मुताबिक दक्कन अवसरों की सुनहरी ज़मीन के तौर पर मशहूर था. तमाम साम्राज्यों के बीच व्यापार ने अर्थव्यवस्था को मजबूती दी. ये एक वजह है जिसे लेकर ईरान के लोग इस क्षेत्र के प्रति आकर्षित हुए."

क़ुली क़ुतुब शाही साम्राज्य और निज़ामों के शासन के दौरान वास्तु शिल्पियों, उलेमाओं और इंजीनियरों को हैदराबाद बुलाया गया.

इमेज स्रोत, Sangeetham Prabhakar

मजबूत होते रिश्ते

ऑल इंडिया शिया मजलिस ए उलेमा वा ज़ाकरीन के अध्यक्ष डा. सैयद निसार हुसैन हैदर आगा कहते हैं, "हैदाराबाद के स्थापत्य पर ईरानी शहर शिराज़ का गहरा प्रभाव है. हैदराबाद और ईरान के लोगों के बीच वैवाहिक संबंधों के जरिए भी ये ताल्लुक मजबूत हुए जो आज तक जारी हैं."

ईरान से लोगों का हैदराबाद आना चार सौ साल पहले शुरू हुआ.

ईरान के कई ऐसे परिवार हैं जिन्होंने हैदराबाद को अपना घर बना लिया है. ऐसा ही एक परिवार 'दरविशियों' का है.

इमेज स्रोत, Sangeetham Prabhakar

लुभाती है गर्मजोशी

आर्किटेक्ट जमाल दरविशी का परिवार तीन पीढ़ी पहले ईरान से आया था. उनके दादा साल 1919 में ईरान के याज़्द प्रांत से मुंबई आए थे.

जमाल कहते हैं, "उन दिनों मुंबई में कई ईरानी परिवार थे. उनमें से कुछ हमारे पैतृक गांव से थे. इसलिए मेरे दादा को लगा कि मुंबई में परिवार सुरक्षित रहेगा. 1960 के दशक में मेरा परिवार हैदराबाद आ गया. हमें यहां ईरान का प्रभाव ज़्यादा नज़र आया. धर्मनिरपेक्ष ताने बाने और गर्मजोशी ने हमें हैदराबाद की ओर खींच लिया और हमने इसे अपना घर बना लिया"

जमाल को उम्मीद है कि शांति और दोस्ती का माहौल आगे भी बना रहेगा. मोहम्मद सफ़ीउल्लाह कहते हैं कि दुनिया में हैदराबाद इकलौती जगह है जहां शिया और सुन्नी मुसलमानों ने शांति से जीने का रास्ता तलाश लिया है.

इमेज स्रोत, Sangeetham Prabhakar

ये ईरानी हैं पक्के हैदराबादी

ईरान से आकर बसे लोगों की तीसरी और चौथी पीढ़ियां खुद को 'पक्का हैदराबादी' कहती हैं लेकिन वो अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं.

हैदराबाद में ईरानी रेस्त्रां 'सर्वी' चलाने वाले 23 साल के हैदर जौकर कहते हैं, "हम घर में फ़ारसी में बात करते हैं. मैंने इस भाषा का कोई औपचारिक ज्ञान नहीं लिया है लेकिन मैं फ़ारसी सुनते हुए बड़ा हुआ हूं और मैंने ये भाषा सीख ली. हमारे भोजन में ईरान के पकवान आम हैं. हमारे घर की आंतरिक सज्जा में भी ईरानी संस्कृति का प्रभाव है. हमें अपनी विरासत पर गर्व है जिसने हमें विनम्र बने रहना और अपने मेहमानों का प्यार और गर्मजोशी के साथ स्वागत करना सिखाया है और हैदराबाद के मायने भी यही हैं, प्यार, गर्मजोशी और खाना."

हैदर ईरान से यहां आकर बसे परिवार की तीसरी पीढ़ी से हैं. हैदर कहते हैं कि 'सर्वी' भारत की उन दो जगहों में से एक है जहां ईरान की सबसे मशहूर डिश चेलो कबाब परोसी जाती है.

वो कहते हैं, "ईरानी डिश अवाश हलीम में तब्दील हो गई. ईरानी चाय का भी संशोधन हो गया. बिरयानी हैदराबाद का पर्याय बन गई. ईरानी खाना भी बदल गया और हैदराबादियों को हम सा बना दिया."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)