समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट: कब-कब क्या-क्या हुआ

  • 19 फरवरी 2018
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18 फ़रवरी 2007 की उस रात को ग्यारह साल हो चुके हैं जब दिल्ली से पाकिस्तान के लाहौर जा रही समझौता एक्सप्रेस में बम धमाका हुआ जिसमें 68 लोगों की मौत हो गई.

इस मामले की जांच पहले हरियाणा पुलिस ने की लेकिन बाद में कई दूसरे भारतीय शहरों में इसी तर्ज़ के धमाकों के बाद केस की जांच नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी को सौंप दी गई.

ग्यारह सालों में आज कहां है मामला?

इस केस में पंचकुला की विशेष अदालत में मामले से जुड़े सरकारी अधिकारियों की गवाही जारी है. मुख्य अभियुक्त असीमानंद ज़मानत पर रिहा हैं.

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इस तरह बढ़ा मामला आगे:

फ़रवरी 2007: भारत-पाकिस्तान के बीच सप्ताह में दो दिनों चलनेवाली समझौता एक्सप्रेस में 18 फ़रवरी 2007 में बम धमाका हुआ जिसमें 68 लोगों की मौत हो गई. 12 लोग घायल हुए. ट्रेन उस रविवार दिल्ली से लाहौर जा रही थी. मारे जानेवालों में ज़्यादातर पाकिस्तानी नागरिक थे.

2001 के संसद हमले के बाद से बंद की गई ट्रेन सेवा को जनवरी 2004 में फिर से बहाल किया गया था.

धमाके के दो दिनों बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़ुर्शीद अहमद कसूरी भारत आने वाले थे. घटना की दोनों मुल्कों में कड़ी निंदा हुई. लेकिन इस कारण कसूरी का भारत दौरा रद्द नहीं हुआ.

भारतीय प्रशासन ने दिल्ली से सात पाकिस्तानी घायलों को ले जाने के लिए पाकिस्तानी वायु सेना के विमान को आने की आज्ञा भी दी.

फ़रवरी 2007: 19 फ़रवरी को दाख़िल पुलिस एफ़आईआर के मुताबिक़ 23:53 बजे दिल्ली से क़रीब 80 किलोमीटर दूर पानीपत के दिवाना रेलेव स्टेशन के पास ट्रेन में धमाका हुआ. इसकी वजह से ट्रेन के दो जनरल कोच में आग लग गई. यात्रियों को दो धमाकों की आवाज़ें सुनाई दी जिसके बाद ट्रेन के डिब्बों में आग लग गई.

मारे जाने वाले 68 लोगों में 16 बच्चे शामिल थे. मृतकों में चार रेलवेकर्मी भी शामिल थे.

बाद में पुलिस को घटनास्थल से दो ऐसे सूटकेस बम मिले जो फट नहीं पाये थे.

20 फरवरी, 2007: प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर पुलिस ने दो संदिग्धों के 'स्केच' जारी किए. ऐसा कहा गया कि ये दोनों ट्रेन में दिल्ली से सवार हुए थे और रास्ते में कहीं उतर गये जिसके बाद धमाका हुआ. पुलिस ने संदिग्धों के बारे में जानकारी देने वालों को एक लाख रुपए का नक़द इनाम देने की भी घोषणा की थी.

हरियाणा ने इस केस के लिए एक विशेष जांच दल या एसआईटी का गठन कर दिया था.

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15 मार्च, 2007: हरियाणा पुलिस ने इंदौर से दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया. यह इन धमाकों के सिलसिले में की गई पहली गिरफ्तारी थी. पुलिस इन तक सूटकेस के कवर के सहारे पहुंच पाई थी. ये कवर इंदौर के एक बाज़ार से घटना के चंद दिनों पहले ही ख़रीदी गई थीं.

बाद में इसी तर्ज़ पर हैदराबाद की मक्का मस्जिद, अजमेर दरगाह और मालेगांव में भी धमाके हुए और इन सभी मामलों के तार आपस में जु़ड़े हुए बताए गए. समझौता मामले की जांच में हरियाणा पुलिस और महाराष्ट्र के एटीएस को एक हिंदू कट्टरपंथी संगठन 'अभिनव भारत' के शामिल होने के संकेत मिले थे.

इन धमाकों के सिलसिले में आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार से भी पूछताछ की गई थी.

26 जुलाई, 2010: मामला एनआईए को सौंपा दिया गया.

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जून 2011: एनआईए ने 26 जून 2011 को पांच लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाख़िल की. पहली चार्जशीट में नाबा कुमार उर्फ़ स्वामी असीमानंद, सुनील जोशी, रामचंद्र कालसंग्रा, संदीप डांगे और लोकेश शर्मा का नाम था.

जांच एजेंसी का कहना है कि ये सभी अक्षरधाम (गुजरात), रघुनाथ मंदिर (जम्मू), संकट मोचन (वाराणसी) मंदिरों में हुए इस्लामी आतंकवादी हमलों से दुखी थे और 'बम का बदला बम से' लेना चाहते थे.

बाद में एनआईए ने पंचकुला विशेष अदालत के सामने एक अतिरिक्त चार्जशीट दाख़िल की. 24 फ़रवरी 2014 से इस मामले में सुनवाई जारी है.

अगस्त 2014: समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट केस में अभियुक्त स्वामी असीमानंद को ज़मानत मिल गई. कोर्ट में जांच एजेंसी एनआईए असीमानंद के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं दे पाई. उन्हें सीबीआई ने 2010 में उत्तराखंड के हरिद्वार से गिरफ़्तार किया गया था.

उन पर वर्ष 2006 से 2008 के बीच भारत में कई जगहों पर हुए बम धमाकों को अंजाम देने से संबंधित होने का आरोप था.

असीमानंद के ख़िलाफ़ मुक़दमा उनके इक़बालिया बयान के आधार पर बना था लेकिन बाद में वो ये कहते हुए अपने बयान से मुकर गए कि उन्होंने वो बयान टॉर्चर की वजह से दिया था.

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