राष्ट्रपति हसन रुहानी के भारत दौरे से ईरान को क्या मिलेगा?

  • 17 फरवरी 2018
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ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी भारत दौरे पर आए हुए हैं. वो चाहते हैं कि भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना का काम आगे बढ़ाने और बाक़ी बुनियादी ढांचे के निर्माण को लेकर निवेश करे.

ईरान पर भारत की पेट्रोलियम को लेकर निर्भरता है, लेकिन ईरान को इस रिश्ते से क्या मिलता है? भारत और ईरान के बीच व्यापारिक संबंध क्या है? ईरान को भारत से क्या कारोबारी लाभ मिलता है? इन्हीं मुद्दों पर बीबीसी संवाददाता अभिजीत श्रीवास्तव ने मध्य-पूर्व मामलों के विशेषज्ञ क़मर आग़ा से बात की.

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तीन चीज़ें सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं. सबसे पहले चाबहार बंदरगाह और उसका विकास.

दूसरा, ईरान चाबहार में बने इंडस्ट्रियल ज़ोन में भारत से निवेश चाहता है, जिसमें भारत ने जापान को भी साथ लिया है. दक्षिण कोरिया भी इसे लेकर बहुत इच्छुक है.

तीसरा है- कनेक्टिविटी. चाबहार अफ़ग़ानिस्तान से जुड़ रहा है. इस परियोजना का एक भाग पूरा हो चुका है और वहां अच्छा ट्रैफिक भी आ रहा है. ईरान का ट्रेड बढ़ रहा है. पहले जो जहाज़ कराची जाते थे, अब वे चाबहार होकर आगे जा रहे हैं.

इस दौरे पर हुए समझौते के अनुसार अब नेपाल और भूटान के बाद ईरान ऐसा तीसरा देश बन गया है जहां रुपये में निवेश किया जा सकेगा.

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फरज़ाद-बी ब्लॉक अहम

भारत के साथ ईरान के रिश्ते बहुत अच्छे हैं. जब ईरान पर प्रतिबंध लगे थे, तब भी भारत ने उसका साथ दिया. फरज़ाद-बी ब्लॉक भी बहुत अहम है. ओएनजीसी विदेश ने यहां गैस की खोज की है. भारत यहां निवेश करना चाहता है और सस्ती दरों पर गैस चाहता है.

ईरान को हार्ड कैश की ज़रूरत है. संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध तो हट गए हैं लेकिन अमरीकी प्रतिबंध लगे हुए हैं. उनको निवेश की ज़रूरत है. भारत की कई कंपनियां वहां निवेश करना चाहेंगी.

भारत के लिए चाबहार बंदरगाह बहुत महत्वपूर्ण हैं. इसके जरिए अफ़ग़ानिस्तान के साथ ही सेंट्रल एशिया, रूस, पीटर्सबर्ग, सेंट्रल एशिया का लैंड लॉक्ड इलाक़े तक के जुड़ जाएगा.

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भारत को ओमान से 1,100 किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन लानी है. अगर ईरान उस पर राज़ी हो जाता है तो ये तीनों देशों के बीच अच्छा होगा.

पाकिस्तान से होकर ईरान से पाइपलाइन आई है लेकिन जिस इलाक़े से होकर ये गुज़रती है, उन इलाकों में बहुत अराजकता है. इसकी वजह से ये सफल नहीं हो सकी. ओमान से ईरान होकर पाइपलाइन लाना बहुत महंगा है लेकिन लंबे समय में भारत और ओमान के साथ-साथ ईरान को भी इससे बहुत फ़ायदा होगा.

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कनेक्टिविटी बहुत अहम

भारत 2009 में जरांज-देलाराम सड़क बना चुका है. ईरान इस तरह अफ़ग़ानिस्तान के साथ-साथ मध्य एशिया और रूस से जुड़ गया है. आने वाले वक़्त में वहां रेल नेटवर्क भी बनाया जाना है.

इससे मध्य एशिया तक भारत को कनेक्टिविटी मिल जाएगी. चारों तरफ ज़मीन से घिरे उस इलाक़े में तेल और गैस के अकूत भंडार हैं लेकिन उन्हें ला पाना आसान नहीं था. इस निर्माण के बाद ऐसा करना आसान हो जाएगा. भारत के लिए मध्य एशिया और रूस तक जाने के लिए यही एक रास्ता है.

रूस सड़क, रेल और पाइपलाइन के ज़रिए यूरोप से जुड़ा है. आज़ादी से पहले भारत की ईरान से रेल और सड़क कनेक्टिविटी थी, जिसे पाकिस्तान ने अब ब्लॉक किया हुआ है. भारत के पास कोई और रास्ता नहीं है.

गुजरात के कांडला बंदरगाह से केवल छह दिनों में चाबहार पहुंचा जा सकता है. वहां से रेल या सड़क के माध्यम से सामान आगे पहुंचाया जा सकता है. यही लाभ ईरान को भी होगा.

एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत भारत, म्यांमार, थाईलैंड के बीच रेल कनेक्टिविटी जल्दी ही शुरू हो जाएगी. मध्य एशिया से जो सामान आएगा उसे पूर्वी एशिया या दक्षिण पूर्व एशिया ले जाने में भी काफ़ी आसानी होगी.

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भारत से क्या लेता है ईरान?

ईरान खाने की वस्तुएं, चावल और इंजीनियरिंग गुड्स भारत से आयात करता है. दोनों देश भारत और चाबहार फ्री इंडस्ट्रियल ज़ोन में जॉइंट प्रोडक्शन भी कर सकते हैं.

ईरान को पूर्वी एशिया और दक्षिण-पूर्व के देशों से कनेक्टिविटी मिल रही है. भारत का रेल नेटवर्क अच्छा है, जो जल्द ही म्यांमार से भी जुड़ जाएगा. बांग्लादेश के साथ यह पहले से ही जुड़ा हुआ है.

ईरान पश्चिमी देशों के साथ अच्छे संबंध बना रहा है तो भारत के साथ भी अपने रिश्ते मज़बूत कर रहा है ताकि वो केवल एक कैंप से नहीं जुड़ा रहे.

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ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध का असर

ईरान और भारत के बीच रुपया-रियाल ट्रेड का सिस्टम निकाला गया है. भारत संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध को मानता है लेकिन किसी एक देश के प्रतिबंध को नहीं मानता है.

संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध हट रहे हैं. यूरोप, फ्रांस, जर्मनी अब ईरान के साथ व्यापार कर रहे हैं. भारत भी उसी तरह से अपने संबंध बढ़ा रहा है.

भारत नहीं चाहेगा कि ईरान के कारण वो अमरीका से संबंध ख़राब करे. भारत के संबंध जितने अमरीका के साथ अच्छे हैं, उतने ही इसराइल, अरब देशों और ईरान के साथ भी हैं. भारत ने काफ़ी समय से इन देशों के साथ अपने रिश्तों को अच्छा बनाए रखने पर काम कर रहा है.

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Image caption ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी ने हैदराबाद से की भारत दौरे की शुरुआत

ईरान की भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण

वैश्विकरण का ज़माना है. आज देशों के लिए अर्थव्यवस्था का मुद्दा बेहद अहम है. यही देखते हुए ईरान के जैसे व्यापारिक संबंध फ्रांस और जर्मनी के साथ हैं, वैसे ही संबंध वह भारत के साथ भी बनाए रखना चाहता है. भारत भी ऐसा ही चाहता है.

ईरान एक बहुत बड़ी पावर के रूप में उभर रहा है. ईरान की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण हैं. वहां इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास बहुत शानदार हुआ है. शिक्षा का फैलाव बहुत हुआ है. अंग्रेज़ी बोलने वाले तकनीकी के जानकार लोगों की बड़ी तादाद है. ऐसा इसराइल को छोड़कर मध्य-एशिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है.

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मध्य-पूर्व में ईरान की स्थिति

ट्रंप ईरान के साथ परमाणु समझौते को रद्द करना चाहते हैं. लेकिन जहां तक परमाणु हथियार का सवाल है तो उसकी संधि हो चुकी है. हर छह महीनों में उसे सर्टिफ़िकेट भी मिलता है. अमरीका भी उसमें हस्ताक्षर करने वालों में से था.

ट्रंप ने कई बयान जरूर दिए हैं लेकिन पश्चिमी यूरोप या यूरोपीय संघ का मानना है कि ईरान अपने वादे पूरे कर रहा है. उनका कहना है कि इस संधि को नहीं छेड़ा जाना चाहिए.

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ईरान को भारत से बहुत फ़ायदे

भारत को ईरान से तेल, गैस और मध्य-एशिया के लिए कनेक्टिविटी चाहिए ताकि पाइपलाइन के ज़रिए गैस लाई जा सके. इसके बदले में ईरान में निवेश होगा. चाबहार बंदरगाह का विकास होगा. भारत में एक समानांतर बंदरगाह बनेगा.

फरज़ाद-बी ब्लॉक में उनकी गैस बिकेगी. अगर दोनों देशों के बीच एक संधि हो जाती है तो यहां एक ब्लॉक है, जिसे भारत लेगा. पिछले दिनों भारत की तेल सप्लाई में कमी आई थी जिसके बढ़ने की संभावना है.

बहुत सारी कंपनी चाबहार इंडस्ट्रियल ज़ोन में निवेश करेंगी जिससे ईरान के पास कैश भी आएगा और रोज़गार भी बढ़ेंगे. वहां पिछले दिनों बेरोज़गारी को लेकर प्रदर्शन भी हुए थे. बंदरगाह की गतिविधियां बढ़ेंगी तो लाखों लोग इसमें रोज़गार पा सकेंगे.

इसलिए ईरान के राष्ट्रपति के इस दौरे से ईरान को बहुत फ़ायदा होने की संभावना है.

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