ट्रांसजेंडर टॉयलेट में क्या होता है ख़ास?

  • 18 फरवरी 2018
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नागपुर के ज़िला प्रशासन ने शनिवार को किन्नर समुदाय के लिए एक सार्वजनिक टॉयलेट बनाने की घोषणा की है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, ये टॉयलेट पचपाओली और सीताबुल्दी नाम की दो जगहों पर बनाए जाएंगे.

ख़ास बात ये है कि सार्वजनिक शौचालयों में सिर्फ ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग ही जा सकेंगे.

साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्रांसजेंडरों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था होनी चाहिए.

भोपाल में ट्रांसजेंडरों का टॉयलेट

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इसी फ़ैसले के बाद से नागपुर की एक एनजीओ सारथी ट्रस्ट इस दिशा में काम कर रही थी.

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कैसा होता है ट्रांसजेंडरों का टॉयलेट?

अगर टॉयलेट की रूपरेखा की बात करें तो इस टॉयलेट में वो सभी सुविधाएं होंगी जो किसी भी सार्वजनिक टॉयलेट में होती हैं.

सारथी ट्रस्ट के संस्थापक आनंद चंद्रानी ने बीबीसी से इस मुद्दे पर बात की है.

चंद्रानी बताते हैं, "इस टॉयलेट पर साफ़ शब्दों में तीसरी पंक्ति लिखा होगा. शुरुआती तौर पर हम पायलट प्रोजेक्ट के तहत एक टॉयलेट बनाएंगे. इस टॉयलेट के निर्माण के बाद हम देखेंगे कि किन्नर समुदाय को इससे कितना फ़ायदा हो रहा है."

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इससे पहले भी मध्यप्रदेश के भोपाल में ट्रांसजेंडरों के लिए टॉयलेट बनाया जा चुका है.

इस टॉयलेट में वॉशरूम और मेकअप रूम भी बनाया गया था.

क्यों ज़रूरी है एक अलग टॉयलेट?

दुनिया के कई देशों में जेंडर न्यूट्रल शौचालयों को बनाए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जा रहा है.

इसका उद्देश्य ट्रांसजेंडर समुदाय को मुख्य धारा में लाना है.

एक शौचालय ट्रांसजेंडरों के लिए भी...

लेकिन नागपुर और भोपाल में बने ये टॉयलेट सिर्फ़ ट्रांसजेंडरों के लिए हैं.

ट्रांसजेंडर समुदाय अपने लिए जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट की जगह अलग शौचालयों की मांग करता है.

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क्योंकि ऐसे टॉयलेटों में ट्रांसजेंडर मानसिक और शारीरिक शोषण झेलने का दावा करते हैं.

कितनेअहम हैं ये टॉयलेट!

अगर ढांचे और मूलभूत सुविधाओं की बात करें तो ट्रांसजेंडर टॉयलेट दूसरे सार्वजनिक शौचालयों जैसे ही होंगे.

लेकिन अगर इन टॉयलेट्स के महत्व की बात करें तो किन्नर समुदाय दुनियाभर में अपने लिए अलग टॉयलेट हासिल करने की लड़ाई लड़ रहा है.

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अमरीका में ओबामा प्रशासन ने आदेश जारी करके कहा था कि ट्रांसजेंडर छात्र, लड़के-लड़कियों के लिए बने टॉयलेट्स का इस्तेमाल अपनी सुविधा अनुसार कर सकते हैं.

लेकिन इस फ़ैसले को अमरीका के 13 प्रांतों से कानूनी चुनौती मिली थी.

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अमरीका के प्रांत न्यू जर्सी में एक ट्रांसजेंडर एरिन बिसन ने छोटी दूरी के सफर वाले पानी के जहाजों में बाथरूम में लेडीज़ और जेंट्स लिखे होने के ख़िलाफ़ मुकदमा किया था.

इस मामले में एरिन बिसन को जीत हासिल हुई थी.

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