PNB स्कैम: नीरव मोदी को कैसे रोका जा सकता था?

  • 19 फरवरी 2018
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पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में 11 हज़ार करोड़ से ज़्यादा का घोटाला सामने आने के बाद मोदी सरकार के चीफ़ इकॉनोमिक एडवाइज़र अरविंद सुब्रमण्यम का कहना है कि सरकारी बैंकों में निजी भागीदारी ज़्यादा होना चाहिए.

सुब्रमण्यम के मुताबिक सरकार इन बैंकों के रिकैपिटलाइज़ेशन में लगी हुई है लेकिन निगरानी, जांच-पड़ताल और अनुशासन को बेहतर बनाने के लिए बैंकों में ज़्यादा निजी हिस्सेदारी की ज़रूरत है.

उनका कहना है बैंकों के कामकाज पर घोटालों और फ़र्ज़ीवाड़े से जो असर हुआ है, उससे निपटने के लिए रिज़र्व बैंक ने कई सारे रेगुलेशन पास किए हैं. बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने हाल में दक्षिण अफ़्रीका में अपना कारोबार समेटा है और अब PNB का मामला सामने है.

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ज़ाहिर है, मुख्य आर्थिक सलाहकार का एक इशारा बैंकों के निजीकरण की तरफ़ है और दूसरा कड़े नियम बनाने की ओर.

लेकिन क्या PNB में घोटाला इस वजह से हुआ कि कड़े नियमों की कमी थी? क्या नीरव मोदी बैंक को इतनी बड़ी चपत लगाकर भारत छोड़ने में इसलिए कामयाब रहे कि उन्हें रोकने लायक नियम नहीं थे? क्या और नियम ऐसा घोटाला रोक सकत थे? ऐसा लगता नहीं है.

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जैसे-जैसे पूरी कहानी के पर्दे हटते जा रहे हैं, ये साफ़ होता जा रहा है कि नियम तो थे लेकिन उनका पालन नहीं किया गया. या यूं कहें कि जिन लोगों पर नियमों का पालन करने और कराने की ज़िम्मेदारी थी, वही भ्रष्ट बन गए और हज़ारों करोड़ रुपए की ये चपत सामने आई.

लेकिन ये सब हुआ कैसे? दरअसल, गलती पंजाब नेशनल बैंक के मोर्चे पर हुई और वो भी कई सारी. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक पंजाब नेशनल बैंक ने सात गलतियां कीं.

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  • जब कभी कोई ट्रेड फ़ाइनेंस कंपनी पैसा मांगती है तो भारत के बैंक एक क्रेडिट लिमिट तय करते हैं और लेटर ऑफ़ अंडरटेकिंग (LoU) जारी करने की प्रक्रिया शुरू होती है. ये LoU विदेश में मौजूद बैंक शाखा में पेश किया जाता है. आम तौर पर इतनी बड़ी रकम के मामले में लोन के लिए आग्रह और LoU पर सीनियर मैनेजमेंट फ़ैसला करता है लेकिन PNB के मामले में क्या हुआ, नहीं पता.
  • विदेश में मौजूद शाखा को SWIFT मैसेज भेजा जाता है और इस प्रक्रिया में तीन चरण होते हैं और तीन अधिकारी शामिल होते हैं. इन्हें मेकर, वेरिफ़ायर और ऑथोराइज़र कहते हैं. सभी के पास अलग-अलग लॉगइन और पासवर्ड होते हैं. शुरुआती जांच में पता चला है कि PNB के मामले में एक ही व्यक्ति ने दो भूमिका निभाई.
  • SWIFT लेन-देन भी बैंक के कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (CBS) से जुड़ा होता है. इसमें सभी ग्राहकों का ट्रांजैक्शन से जुड़ा इतिहास होता है और सभी शाखाओं की इस तक पहुंच होती है. जब कभी रकम बड़ी होती है, बैंक के वरिष्ठ अधिकारी इसे ख़ुद ही देखते हैं. लेकिन इस मामले में भ्रष्ट लोगों ने कथित तौर पर नीरव मोदी और मेहुल चोकसी की कंपनियों के मामले में SWIFT को CBS से डीलिंक कर दिया. हालांकि दूसरी कंपनियों के LoU, SWIFT-CBS सिस्टम से पास होकर ही गए. इसलिए जो निर्देश दिए गए, वो CBS में दर्ज ही नहीं हुए.
  • बैंकिंग कंप्यूटर नेटवर्क में SWIFT-CBS इंटीग्रेशन सिस्टम बेहद स्वाभाविक है. ऐसे में ये बात हैरान करती है कि बैंक के आईटी विभाग ने कुछ मामलों में इसे डीलिंक करने की बात नहीं पकड़ी. और ये सब सात साल जारी रहा, ये इशारा करता है कि अंदरूनी लोगों की मिलीभगत रही या फिर घोर लापरवाही.
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  • जब कभी SWIFT के ज़रिए इतनी बड़ी रकम भेजी जाती है तो दैनिक आधार पर रिपोर्ट दी जाती है. लेकिन इस बारे में जानकारी नहीं मिली है कि किसी भी स्तर पर किसी भी अधिकारी को मोदी और चोकसी के मामले में ऐसी कोई रिपोर्ट क्यों नहीं मिली. बैंक के सतर्कता विभाग, फ़्रॉड मैनेजमेंट कमेटी, आंतरिक और बाहरी ऑडिट, किसी ने भी इसे क्यों नहीं पकड़ा.
  • स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार का कहना है कि किसी भी अधिकारी को तीन साल से ज़्यादा वक़्त तक एक पद पर नहीं रहने दिया जाता और कई संवेदनशील पदों पर ख़ास निगाह रखी जाती है. लेकिन इस मामलें में गिरफ़्तार एक बैंकर कथित तौर सात साल तक नीरव मोदी की कंपनियों को कर्ज़ मुहैया करा रहा था. हैरानी है कि ये इतने समय तक कैसे जारी रहा.
  • जब कभी LoU जारी किया जाता है तो रिसीव करने वाला बैंक इसे जारी करने वाली शाखा और रीजनल या ज़ोनल ऑफ़िस जैसे कंट्रोलिंग ऑफ़िस को कंफ़र्म करते हुए पत्र लिखता है. इस मामले में साफ़ नहीं है कि क्या ऐसा कोई पत्र भेजा गया और अगर भेजा गया तो पंजाब नेशनल बैंक में इस पर क्यों नज़र नहीं डाली गई.
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ये तो बात हुई पंजाब नेशनल बैंक में हुई चूक की. लेकिन क्या इस घोटाले के बाद ये गारंटी कोई दे सकता है कि सरकारी बैंकों में इस तरह का कोई फ़र्ज़ीवाड़ा नहीं होगा? क्या ऐसा तंत्र तैयार कर लिया जाएगा कि ऐसे रिसाव को रोका जा सके?

बैंकिंग सिस्टम के जानकार हेमिंद्र हजारी ने बीबीसी से इसके जवाब में कहा, ''ये स्वीकार किया गया है कि रेगुलेशन को और कड़ा बनाया जाना चाहिए. अगर नियमों का पालन किया जाएगा तो घोटाले कम होंगे. लेकिन सच ये है कि आगे भी ऐसी घटनाएं सामने आएंगी.''

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''ऐसा सोचना गलत है कि फ़र्ज़ीवाड़ा नहीं होगा. पूरी दुनिया और भारत में ऐसे घोटाले होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे. लेकिन ये ज़रूर है कि कायदे-कानूनों को कड़ा बनाया जा सकता है.''

हजारी का कहना है कि ये घोटाला बड़ी आसानी से अंजाम दिया गया है. अगर टेक्नोलॉजी न हो तो भी इसे मैन्युली भी पकड़ा जा सकता था. उन्होंने उम्मीद जताई है कि रिज़र्व बैंक ऐसे नियम लाएगा जिनसे ऐसा घोटाले को दोहराना आसान नहीं होगा.

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