नीरव मोदी और विक्रम कोठारी जैसों के साथ क्या करता है चीन?

सांकेतिक तस्वीर

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विजय माल्या, नीरव मोदी और अब विक्रम कोठारी, देश या सरकारी बैंकों को करोड़ों का चूना लगाकर मुकरने या भागने वालों की कहानी सामने आती है तो दिमाग़ में सबसे पहले सवाल आता है कि ऐसों के साथ क्या किया जाना चाहिए.

बड़े घोटाले करने वालों के नाम सामने आते हैं तब ख़बर होती है कि कितना नुकसान हो गया. लेकिन बैंकों के डूबे हुए कर्ज़ (NPA) के आंकड़े इशारा करते हैं कि उधार लेकर डकार जाना भारतीयों की बड़ी दिक्कत है.

पंजाब नेशनल बैंक कार्रवाई कर रहा है तो नीरव मोदी ने धमकी दी है कि इन सारी ख़बरों ने उनके ब्रांड को नुकसान पहुंचाया है.

न लोन, न प्रमोशन

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ऐसों के साथ क्या किया जाए, इसका एक हल हमें पड़ोसी देश चीन से मिल सकता है. चीन की सुप्रीम पीपल्स कोर्ट ने हाल में 67 लाख से ज़्यादा बैंक डिफ़ॉल्टरों को काली सूची में डाल दिया है.

इसका मतलब ये कि वो विमान से सफ़र नहीं कर सकते, लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन नहीं कर सकते और उन्हें प्रमोशन भी नहीं मिलेगा.

ग्लोबल टाइम्स की ख़बर के मुताबिक अब तक चीनी सरकार ने 61.5 लाख लोगों को विमान टिकट ख़रीदने और 22.2 लाख लोगों के तेज़ रफ़्तार रेलगाड़ियों में सफ़र करने पर पाबंदी लगा दी है.

कैसे शिकंजा कसा जाता है?

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सुप्रीम पीपल्स कोर्ट के एंफ़ोर्समेंट ब्यूरो चीफ़ मेंग ज़ियांग ने बताया कि कोर्ट ने आधिकारिक आईडी और पासपोर्ट की मदद से एयरलाइन और रेल कंपनियों के साथ सहयोग शुरू कर दिया है.

मेंग ने बताया कि कोर्ट ने जिन डिफ़ॉल्टर्स को ब्लैकलिस्ट किया है, उनमें सरकारी नौकर, स्थानीय विधायिका और राजनीतिक सलाहकार संस्थाओं के सदस्य और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना के प्रतिनिधि शामिल हैं.

इनके अलावा कुछ ऐसे भी हैं जिनका डिमोशन कर दिया गया है और इस कड़ी कार्रवाई का क्या असर हुआ? कम से कम दस लाख डिफ़ॉल्टर्स ने ख़ुद ही अदालत का आदेश मानने की बात कही है.

सामान ख़रीदने पर पाबंदी?

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बिज़नेस इनसाइडर की पिछले साल दिसंबर की एक ख़बर के मुताबिक चीन ऐसी पब्लिक ब्लैकलिस्ट रखता है जो कर्ज़ डकारने वालों की आवाजाही और सामान ख़रीदने तक पर पाबंदी लगाता है.

देश की सबसे बड़ी अदालत अपनी वेबसाइट पर 'बेईमान लोगों' के नाम और आईडी नंबर छापती है. ये लोग न तो विमान और हाई-स्पीड रेलगाड़ी में सफ़र कर सकते हैं बल्कि उनके बच्चे भी महंगे स्कूलों में नहीं पढ़ सकते.

डिफ़ॉल्टर तीन-सितारा या उससे ज़्यादा महंगे होटलों में ठहर नहीं सकते. इसके अलावा अगर वो सिविल सर्विस से जुड़ना चाहते हैं तो उन्हें मुश्किल परीक्षा से गुज़रना होता है. कार बुक कराने के लिए ज़्यादा पैसा ख़र्च करना होता है.

प्लास्टिक सर्जरी का सहारा

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ये पाबंदियां आईडी नंबर के ज़रिए लगाई जाती थीं. कुछ लोगों ने सफ़र करने पर लगी रोक से बचने के लिए अपने पासपोर्ट इस्तेमाल करने शुरू किए, लेकिन अब वो ख़ामी भी दूर कर दी गई है.

ये लिस्ट साल 2013 में शुरू की गई थी और उस समय इसमें 31 हज़ार से ज़्यादा नाम थे. तब से दिसंबर, 2017 तक इसमें क़रीब 90 लाख लोग जुड़े.

साल 2017 की शुरुआत में चीन में एक ऐसे ही कर्ज़दार के पहले दर्जे से विमान सफ़र करने पर 15 हज़ार डॉलर का जुर्माना लगाया गया था.

रोज़गार में दिक्कत

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डिफ़ॉल्टर पर कार्रवाई को लेकर इतना ख़ौफ़ है कि एक व्यक्ति ने बचने के लिए प्लास्टिक सर्जरी करा ली थी. यही नहीं ब्लैकलिस्ट में जो नाम जुड़ जाते हैं, उससे रोज़गार की संभावनाओं पर भी असर पड़ता है.

कई कंपनियां इसकी जांच करती हैं और लिस्ट में शामिल डेढ़ लाख से ज़्यादा लोगों को कार्यकारी पद नहीं दिए गए हैं.

इस साल की शुरुआत में चीन की कोर्ट ने एक बयान में कहा था, ''ऐसी उम्मीद है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस तरह की दिक्कतें पैदा करने से कर्ज़दारों को वक़्त रहते उधार लौटाने की आदत पड़ेगी.''

पिछले साल अगस्त में चीन के सिचुआन प्रांत की अदालत ने 20 कर्ज़दारों के फ़ोन पर रिकॉर्ड मैसेज डाल दिए थे.

फ़ोन कॉल पर मैसेज रिकॉर्ड

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जब कोई ऐसे डिफ़ॉल्टर कर्ज़दार को फ़ोन करता है तो आवाज़ आती, ''जिस व्यक्ति को आप कॉल कर रहे हैं, उसे अदालतों ने उधार न चुकाने के कारण ब्लैकलिस्ट में डाल दिया गया है. कृपया इस आदमी को कानूनी देनदारी का सम्मान करने का आग्रह कीजिए.''

चीन भर के बैंक डिफ़ॉल्टर के नाम, आईडी नंबर, फ़ोटोग्राफ़ और घर का पता अब अख़बारों में छापा जा सकता है, रेडिया या टीवी पर दिखाया जा सकता है. इसके अलावा बसों और लिफ़्ट में भी चस्पा किया जा सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक स्थानीय सरकारों को भी नेम एंड शेम डाटाबेस तैयार करने के लिए कहा गया है, जिसे कोई भी सर्च कर सके. इसका मक़सद है नाम लेकर शर्मसार करना, ताकि कर्ज़ न चुकाने वाले लोगों से वसूली की जा सके.

चीन में ये प्रक्रिया पुरानी है. साल 2015 में कोर्ट ने निजी कंपनियों के साथ काम करना शुरू कर दिया था. ये कंपनियां अदालत की तरफ़ से लगने वाले जुर्माने पर डिफ़ॉल्ट करने वाले लोगों के क्रेडिट पॉइंट काट लेती थीं.

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