पति को इंसाफ़ दिलाने के लिए 20 साल लड़ी लड़ाई

  • 25 फरवरी 2018
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"बीस साल कैसे गुज़ारे, बताना आसान नहीं है. पांच बच्चों को रिश्तेदारों के घर जाकर और पेट काटकर पढ़ाती रही. पुलिसवालों ने जीवन भर का ज़ख़्म दिया है. अब बाबू जी (ससुर) की मेहनत और हिम्मत पर ही ज़िंदा हैं."

यह कहती हुईं झारखंड में पांकी थाना के सुदूर गांव सिरम में रहने वालीं अहुलास देवी फफक-फफकर रो पड़ती हैं. अपने पति की हत्या के मामले में चार पुलिस अफ़सरों को पांच साल की जेल होने पर उनकी यही प्रतिक्रिया थी.

साल 1998 में उनके पति पारसनाथ सिंह को नक्सली संबंधों के आरोप में पुलिस घर से उठाकर ले गई थी. पुलिस हिरासत में कथित पिटाई से पति की मौत के बाद अहुलास देवी और उनके ससुर रामजनम सिंह बीस साल से इंसाफ़ पाने की लड़ाई लड़ते रहे.

इसी मामले में रांची स्थित सीबीआई के विशेष न्यायाधीश ए.के. मिश्रा की अदालत ने चार पुलिस अफ़सरों को पांच साल की कैद और एक-एक लाख रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई है.

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Image caption सीबीआई कोर्ट

दोषी पुलिसकर्मियों को पीड़ित पक्ष के परिजनों को दस लाख रुपये बतौर मुआवज़ा देने को भी कहा गया है.

सज़ा पाने वालों में तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक दीनानाथ रजक, इंस्पेक्टर देवलाल प्रसाद, पांकी के थाना प्रभारी रहे सुरेंद्र प्रसाद और दारोगा रुख़सार अहमद शामिल हैं. अब ये लोग बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में बंद हैं.

कई साल चर्चा में रहा मामला

अधिवक्ताओं से मिली जानकारी के मुताबिक़, सीआरपीएफ़ के एक जवान की हत्या और एक राइफ़ल की लूट के मामले में पुलिस ने पारसनाथ सिंह को उनके घर से उठाया था.

पांकी के स्थानीय पत्रकार संजय कुमार बताते हैं कि यह मामला पूरे पलामू में सुर्खियों में रहा है. बड़े-बुज़ुर्ग इस घटना की चर्चा सालों से चौपालों में करते रहे हैं कि कैसे दर्जनों बंदूकधारी पुलिसवाले आए थे और कई लोग पीटे गए थे. ज़ाहिर है कोर्ट के फ़ैसले पर हज़ारों लोगों की निगाहें टिकी थी.

उधर अहुलास देवी उस दिन को याद नहीं करना चाहतीं, जिस दिन यह सब हुआ था.

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Image caption बेटी दिव्या के साथ अहुलास देवी

वह बताती हैं, "आंखों के सामने पति को ख़त्म कर दिया पुलिसवालों ने. बच्चों को दुर्दिन से बचाने के लिए बहुत मुसीबतें सही. छोटी बेटी की शादी की चिंता में इन दिनों नींद नहीं आती."

अहुलास बताती हैं कि तारीख 18 जुलाई, शनिवार की सुबह पुलिस ने अचानक घर को घेर लिया और गाली-गलौज करते हुए उनके पति को घसीटा जाने लगा. पुलिस बार-बार नक्सली के बारे में पूछती और वो किसी तरह के रिश्ते से इनकार करते रहे.

वह कहती हैं कि पति को बचाने के लिए वह उनके ऊपर गिर गईं, तब उनके साथ भी बदसलूकी की गई. पुलिस ने घर का सामान तहस-नहस कर दिया.

यह बताते हुए वो फिर खामोश हो जाती हैं और अपने सुसर की तरफ़ इशारा करते हुई बाकी जानकारी उनसे लेने को कहती हैं. इस बीच उनकी छोटी बेटी दिव्या मां को संभालने की कोशिश में उनसे लिपटकर सिसकने लगती है.

बातों में पता चला जिस दिन पारसनाथ सिंह की मौत हुई थी, तब दिव्या मां के पेट में थीं.

सीने पर बल्ली रखकर दबाया

रामजनम सिंह आगे बताने लगे कि गांव के कई लोगों ने पुलिस की कार्रवाई का विरोध किया और कहा कि पारस नक्सली नहीं है.

वह बताते हैं, "पुलिस ने विरोध करने वालों की भी पिटाई कर दी गई. इसके बाद वे लोग पीटते-घसीटते मेरे बेटे को पिपराटांड़ पिकेट ले गए. वहां पूछताछ करते हुए उसके सीने पर लकड़ी की बल्ली रखकर रोल कर दिया गया. मेरा बेटा दर्द से चिल्लाता रहा, पानी के लिए कराहता रहा. इसके बाद पिपराटांड़ पिकेट से पुलिसवाले उसे पांकी सरकारी अस्पताल ले गए और एडमिट कराना चाहा, लेकिन डॉक्टर ने इससे मना किया. डॉक्टर बार-बार कहते रहे कि मौत हो चुकी है तो इलाज के लिए कैसे भर्ती करें."

यह कहते हुए रामजनम सिंह का गला पूरी तरह से रूंध जाता है. आंखें डबडबा जाती हैं.

हर जगह लगाई गुहार

रामजनम सिंह अपने बेटे पारसनाथ सिंह की तस्वीर दिखाते हुए कहते हैं, "हमारा एक बेटा अपने भाई की मौत से इतना विचलित था कि वो बार-बार कहता कि आप बुत बने बैठे हैं. शोक में ही उस बेटे की हृदयाघात से मौत हो गई."

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रामजनम बताते हैं कि बेटे की मौत के बाद गांव के एक व्यक्ति ने हिम्मत दिलाते हुए कहा कि चुप बैठने से कुछ नहीं होगा.

वे कहते हैं, "साठ किलोमीटर दूर चलकर हम ज़िला मुख्यालय पहुंचे. वकील से बात की और बहू की तरफ़ से मानवाधिकार आयोग के नाम दरख़्वास्त तैयार कराकर भेज दी. बहू कहती रही कि पुलिस से इंसाफ़ नहीं मिलेगा बाबूजी, हमें लड़ना ही होगा."

इसके बाद अहुलास देवी ने प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, चीफ़ जस्टिस, डीजीपी को भी आवेदन भेजकर इंसाफ़ की गुहार लगाई. तब पलामू एकीकृत बिहार का हिस्सा था और पटना राजधानी. इस बीच मानवाधिकार ने इस मामले का संज्ञान लिया. कई दफ़्तरों से भी पत्र आने लगे.

गवाही कठिन थी

रामजनम सिंह बताते हैं कि पुलिस वालों के ख़िलाफ़ गवाही दिलाने में भी उन्हें काफ़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. रह-रहकर अहुलास का मन भी विचलित होता रहा, वह बीमार पड़ती रहीं.

गांव से ज़िला मुख्यालय, अस्पताल, थाना और राजधानी की दौड़ में ससुर-बहू चप्पलें घिसते रहे.

इस बीच अहुलास के ससुर रिटायर हो गए और घर की माली हालत बिगड़ती चली गई. संयुक्त परिवार खेती पर टिका रहा. अहुलास देवी के लिए भी घर-गृहस्थी संभालना कठिन होने लगा था.

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वरिष्ठ अधिवक्ता शिवकुमार काका ने बीबीसी को बताया, "पूरे मुकदमे के दौरान 27 लोगों की गवाही हुई. इससे पहले पीड़िता ने न्याय की गुहार लगाते हुए साल 2001 में झारखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी.

तब न्यायाधीश एम.वाई. इक़बाल ने इसकी जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया. इसके बाद सीबीआई की दिल्ली ब्रांच ने प्राथमिकी दर्ज कर कार्रवाई शुरू की."

बचाव पक्ष के अधिवक्ता अनिल कुमार सिंह का कहना है कि मृतक पारसनाथ सिंह को गिरफ़्तार करने में सीआरपीएफ़ और राज्य पुलिस की संयुक्त और बड़ी टीम शामिल थी.

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Image caption झारखंड उच्च न्यायालय ने दिया था सीबीआई जांच का आदेश

वह कहते हैं, "सीआरपीएफ़ वालों पर भी कई आरोप लगे थे, लेकिन केंद्र से उनके खिलाफ़ अभियोजन चलाने की स्वीकृति नहीं मिली. इधर राज्य पुलिस के अधिकारियों पर मुकदमा चलता रहा. "

सभी पक्षों को सुनने के बाद पुलिस हिरासत में पारसनाथ सिंह की मौत के लिए चारों को दोषी ठहराया गया है. अब इस फैसले पर ऊपरी अदालत में अपील की जा सकती है.

महानिरीक्षक नवीन सिंह कहते हैं कि मानवाधिकार को लेक गाइडलाइन और कानूनों का संजीदगी से पालन हो, किसी किस्म की कार्रवाई पर कैसे कैसे एहतियात बरते जाएं, इस बारे में सभी पुलिस अधीक्षकों को स्टैंडिग ऑर्डर दिए गए हैं.वह बताते हैं, "पुलिस मुख्यालय में मानवाधिकार को लेकर एक सेल भी बना हुआ है. उल्लंघन होने पर कार्रवाई भी होती है. इस मामले में भी कार्रवाई होने पर सजा हुई है."

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