नज़रिया: 'सबका साथ-सबका विकास में किसान शामिल क्यों नहीं?'

  • 24 फरवरी 2018
भारतीय किसान इमेज कॉपीरइट Getty Images

भाजपा सरकार का कहना है कि वो किसानों के मुद्दों को लेकर संजीदा हैं. बीते साल कई जनसभाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भाजपा सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का संकल्प रखती है और इसी दिशा में आगे बढ़ रही है.

प्रधानमंत्री का कहना था कि किसानों की बेहतरी के लिए कृषि उत्पादों की मूल्य वृद्धि के लिए उन्होंने किसान संपदा योजना की घोषणा की है जो "सच्चे अर्थ में देश की अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम देगा."

इधर इसी सप्ताह राजस्थान में क़र्ज़ माफ़ी को लेकर जयपुर में पड़ाव डालने निकले किसान संगठनों और प्रदेश की भाजपा सरकार में ठन गई है. पुलिस ने किसान संगठन के मुख्य नेताओं को हिरासत में ले लिया है.

गांव देहात से निकले इन किसान संगठनों की मांग है कि सरकार ने कर्ज़ माफ़ी का जो वादा किया था उसका पालन नहीं किया है. पांच महीने पहले भी इन्हीं किसान संगठनों ने राज्य में प्रदर्शन किया था और राज्य में कमकाज लगभग ठप कर दिया था.

क्या मूंगफली बिगाड़ देगी गुजरात में बीजेपी का सियासी खेल?

कांग्रेस किस दम पर देख रही गुजरात में सत्ता का ख़्वाब?

राष्ट्रीय किसान महासंघ और दूसरे संगठनों से जुड़े किसानों ने इसी सप्ताह दिल्ली घेराव का एलान किया था. ये संगठन समर्थन मूल्य और ऋण माफ़ी की मांग उठा रहे हैं.

किसानों की अगुवाई करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिव कुमार शर्मा कक्काजी ने आरोप लगाया कि सरकार आंदोलन को नाकाम करने के लिए दमन कर रही है और किसानों को दिल्ली नहीं पहुंचने दे रही.

उन्होंने बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय को बताया, "किसान को उसकी लागत से 30-40 फ़ीसदी तक कम कमाई हो रही है जिस कारण वो कर्ज़दार होता जा रहे हैं. हम सरकार से कर्ज़ माफ़ी की बात नहीं करना चाहते, हमें कर्ज़ से मुक्ति चाहिए."

केंद्र सरकार ने मौजूदा बजट में किसान को लागत का डेढ़ गुना दाम देने का वादा किया है.

कक्काजी का कहना है कि ये जुमलेबाज़ी है. वो कहते हैं, "इसके लिए बजट में प्रवधान नहीं है तो ये कैसे संभव है. उन्होंने कहा है 2022 तक वो किसान की आय दोगुनी कर देंगे. लेकिन उस वक़्त तक तो ये काम बाज़ार ख़ुद कर देगा. सरकार को 2019 तक का जनादेश है. इसी में काम क्यों नहीं कर रही है."

संघ की ही उपज हैं मंदसौर के विद्रोही किसान नेता कक्का जी

व्यंग्य--पीएम के बताए योगासन, आज़माएँ नाराज़ किसान

इमेज कॉपीरइट Dinesh shukla
Image caption किसानों के प्रमुख नेता के रूप में पहचान रखने वाले शिव कुमार शर्मा कक्काजी बीते दिनों मध्यप्रदेश में हुए किसान आंदोलन में राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ के अध्यक्ष और संस्थापक सदस्य के रूप में किसानों की अगुवाई कर रहे थे.

अब सड़कों पर दिखने लगी है किसानों की समस्याएं

हाल में हुए गुजरात चुनाव के दौरान भी सरकार से नाराज़ किसान चर्चा में रहे थे. इसका असर चुनाव के नतीजों में भी देखने को मिला था और ग्रामीण इलाक़ों में कांग्रेस को समर्थन मिला था.

बीते कुछ महीनों में भारत के किसानों को अपने उत्पाद सड़कों पर फेंकने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

इससे पहले, बीते साल प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत मध्य प्रदेश में कुछ रुपये हर्ज़ाना मिलने पर किसानों ने शिकायत की थी.

साल 2016 में छत्तीसगढ़ में धान के किसानों को राज्य सरकार ने फ़सल बीमा के नाम पर 5 रुपए से लेकर 25 रुपए तक की रक़म थमा दी.

बीते साल कर्नाटक से दिल्ली पहुंचे सैंकड़ों किसानों ने दिल्ली के जंतर मंतर में अनूठे अंदाज़ में प्रदर्शन किया. तमिलनाडु में भारी सूखे की मार और क़र्ज़ के बोझ के तले दबे क़रीब 100 किसान यहां भूख आंदोलन पर बैठे थे.

'किसान से प्रीमियम 1800 और मुआवज़ा 100 रुपये'

प्रधानमंत्री के वायदे के बाद भी किसान सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं? इस मुद्दे पर बीबीसी संवाददता मानसी दाश ने बात की कृषि मामलों के विशेषज्ञ देवेन्द्र शर्मा से. पढ़िए उनका नज़रिया-

किसानों के साथ अन्याय हो रहा है

सरकार का कहना है कि वो किसान की आय दोगुनी करेगी, लेकिन पहले तो हम ये जानने की कोशिश करें कि आज किसान की आय क्या है.

1990 के आसपास से ये कृषि संकट बढ़ता जा रहा है. 2016 का जो सरकार आर्थिक सर्वे है उसके अनुसार 17 राज्यों में किसानों की सालाना आय औसत बीस हज़ार रुपए है. इस हिसाब से किसान हर महीने क़रीब 1,700 से 1,800 रुपए में अपने परिवार को पाल रहा है.

'देश में किसान और किसानी की हत्या हो रही है'

Image caption तेलंगाना के यदादिरी भुवनगिरी जिला से ताल्लुक रखने वाली ललिता के पति सत्या ने कीटनाशक खाकर जान दे दी थी. ललिता के अनुसार उनके पति पर लाखों का बोझ था जिसे वो चुका नहीं पा रहे थे.

मुझे नहीं समझ आता कि 1,700 रुपए में कोई परिवार अपना गुज़ारा कैसे कर सकता है. आज के वक़्त में यदि आप एक गाय भी पालते हैं तो इसके लिए आपको साल में 20,000 रुपये और महीने में 1,700 रुपये से अधिक रुपए खर्च करने पड़ते हैं. इतने कम में किसान परिवार कैसे जीवित रहता होगा?

अगर सरकार अपने ही आंकड़ों को देखकर उसे दोगुना करने की बात कर रही है तो क्या किसानों के साथ अन्याय और धोखा नहीं है?

किसान के लिए एक महीना गुज़ारना मुश्किल है, उसे नहीं पता अगले महीने या फिर पांच महीने बाद वो क्या करेगा. और सरकार किसान से पांच साल का वायदा कर रही है. किसान जानता है कि ये बस एक जुमला है और इससे कुछ हासिल नहीं होगा.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
तमिलनाडु के किसानों ने कहा सूखे के कारण उनके साथी कर रहे हैं आत्महत्या

क्यों मुश्किल में हैं किसान?

किसानों को काफ़ी हद तक ये समझ भी नहीं आता कि उसे जो मार पड़ रही है वो क्यों पड़ रही है. उसे पता है कि है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है. अगर किसान अपना काम भी कराने जाता है तो सरकारी दफ्तरों में एड़ियां रगड़ने के बाद भी काम नहीं होते.

खाद लेने में मुश्किल, कीटनाशक लेने में दिक्क़त- ये इसीलिए है क्योंकि किसानों के लिए बनाई गई सारी व्यवस्थाएं ही सड़-गल चुकी हैं. उसे ठीक करने की ज़िम्मेदारी कोई नहीं ले रहा है. ये सब चीज़ें किसान के ग़ुस्से को बढ़ावा देती हैं या उसे बढ़ाती हैं.

लेकिन मूल संकट ये है कि किसान को समझ नहीं आ रहा है कि जब उसकी पैदावार अच्छी होती है और वो बाज़ार में अपना सामान लेकर आता है तो अचानक दाम क्यों गिर जाते हैं. बाज़ार में उचित दाम न मिलने पर उसे टमाटर, आलू और अपनी अन्य फसल सड़कों पर फेंकनी पड़ती है.

ये भी देखा गया है कि जहां गेहूं और धान जैसे उत्पादों पर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य देती है वहां भी सड़क पर फेंकना पड़ता है.

इमेज कॉपीरइट REUTERS/Amit Dave

किसान को जान-बूझ कर ग़रीब बनाया गया है

मैंने एक अध्ययन किया है जिसके अनुसार 1970 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 76 रुपये प्रति क्विंटल था. 2015 में वो बढ़ कर 1450 रुपये प्रति क्विंटल है. आज वो 1735 रुपये प्रति क्विंटल है. यदि 1970 से 2015 तक का वक़्त आप देखें तो आपका पता चलेगा कि इसमें 20 गुना बढ़ोतरी हुई है.

सरकारी मुलाज़िम की सैलरी और डीए देखा तो मैंने पाया कि 1970 से 2015 तक में उनकी आय में 120 से 150 गुना बढ़ोतरी हुई है. इसी दौरान कॉलेज और यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसरों की आय 150 से 170 गुना बढ़ी है. कंपनी के मध्यम स्तर के नौकरीपेशा लोगों की आय 3000 गुना बढ़ी है.

इमेज कॉपीरइट REUTERS/Rupak De Chowdhuri

अगर किसान की तरह सरकारी मुलाज़िमों की आय को 20 गुना पर रोक दिया गया होता तो आप सोच सकते हैं क्या हुआ होता.

हम जानबूझकर किसानों को ग़रीब बनाए रख रहे हैं. हम उनका हक़ नहीं देना चाहते क्योंकि हमें शहरों में भी महंगाई को भी बढ़ने से रोकना है.

इसका मतलब ये हुआ कि शहरों के लोगों को सस्ता अनाज देने के लिए गांवों में किसानों को समझौता करना पड़ रहा है.

अगर पूरा हिसाब को देखें तो किसान के लिए अगर गहूं के समर्थन मूल्य को 120 गुना ना बढ़ाया गया तो उसे फ़ायदा नहीं मिलगा. लेकिन हम ऐसा नहीं करते क्योंकि हमारे लिए किसान का विकास कोई मुद्दा ही नहीं हैं.

इमेज कॉपीरइट REUTERS/Amit Dave

किसानों के लिए क्यों नहीं है कोईआय कमीशन?

ये अच्छी बात है कि आज देश में किसानों के मुद्दों पर चर्चा तो हो रही है. प्रधानमंत्री ने जब कहा कि वो किसानों की आय को दोगुना करेंगे उन्होंने संकेत दिया कि वो किसान की आय से संबंधित मुद्दों पर ध्यान देना चाहते हैं.

इससे पता चलता है कि इस बात की समझ अब बन रही है कि किसानों की आय के मुद्दों को सुलझाना बेहद ज़रूरी है और आय कम होने के कारण उत्पादन कम होना नहीं बल्कि पैसे कम होना है.

सरकारी मुलाज़िमों के लिए पे कमीशन की बात होती है तो किसान के लिए भी किसी ऐसे कमीशन की बात की जानी चाहिए जो उसकी आय को निर्धारित कर सके.

इमेज कॉपीरइट SAM PANTHAKY/AFP/Getty Images

न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने वाले कमीशन से अलग या फिर इसी कमीशन के साथ एक अन्य कमीशन बनाया जाए जो ये सुनिश्चित करे कि किसानों को कैसे महीने में 18 हज़ार रुपए मिल सकेंगे.

अगर ऐसा किया जा सका तो हम सही मायनों में कह सकेंगे कि 'सबका साथ-सबका विकास' में किसान भी शामिल हैं. मेरा मानना है कि जिस दिन साठ करोड़ किसानो के हाथ में पैसा होगा ये जीडीपी के आंकड़ों की लड़ाई ख़त्म हो जाएगा और सीधे 20 फीसदी बढ़ जाएगी.

सरकार वाकई मदद करना चाहे तो उसे 2022 तक इंतज़ार नहीं करना चाहिए, उसे आज से ही काम करना शुरू करना चाहिए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए