जिनकी पार्टी से 'परेशान' हैं आर्मी चीफ़ बिपिन रावत

  • 22 फरवरी 2018
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भारत के आर्मी चीफ़ जनरल बिपिन रावत के एक बयान को लेकर विवाद छिड़ गया है.

बुधवार को जनरल बिपिन रावत ने एक सेमिनार में कहा था कि बांग्लादेश से जारी अवैध प्रवासियों का घुसपैठ पाकिस्तान के छद्म युद्ध का हिस्सा है और यह चीन को मदद करने के लिए है.

भारतीय मीडिया में छपे बयान के मुताबिक़ जनरल बिपिन रावत ने इस सेमिनार में कहा था, "यहां एक एआईयूडीएफ़ नाम की पार्टी है. अगर आप देखें तो इस पार्टी को असम में पांव पसारने में बहुत कम वक़्त लगा जबकि बीजेपी को सालों लग गए."

एआईयूडीएफ का गठन बदरूद्दीन अजमल ने 2005 में किया था. अभी इस पार्टी के तीन सांसद हैं और असम विधानसभा में 13 विधायक.

आइए आपको बताते हैं कि जनरल बिपिन रावत जिसकी पार्टी से चिंतित हैं वो आख़िर हैं कौन?

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कौन हैं बदरुद्दीन?

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने पूछा था कि ये बदरुद्दीन कौन हैं?

ज़ाहिर है कि वे जानकर भी अनजान बन रहे थे. वे उस शख़्स को पहचानने से इनकार कर रहे थे, जिसकी असम के चुनाव बाज़ार में सबसे ज़्यादा मांग थी.

बदरुद्दीन अपनी आर्थिक हैसियत से साथ-साथ अपनी धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों से ग़रीब और पिछड़े मुसलमानों में काफ़ी लोकप्रिय हैं.

परेशान हाल लोग उनके पास अपनी मुसीबतें सुनाने आते हैं और बदरुद्दीन अपने अनूठे अंदाज़ में उनका निवारण भी करते हैं.

बदरुद्धीन उनके लाए पानी में कुरान की आयतें पढ़कर फूंक देते हैं.

अंधविश्वास फैलाने का आरोप लगने पर उन्होंने कहा कि अगर मेरी दुआओं से किसी को फ़ायदा होता है तो उसमें हर्ज क्या है.

अवैध नागरिक ठहराए जाने से आतंकित मुस्लिम उनको संरक्षक के तौर पर भी देखते हैं.

दरअसल, कांग्रेस हो या बीजेपी या फिर कोई और दल, सबकी नज़र मौलाना बदरुद्दीन अजमल पर टिकी हुई थी.

बदरुद्दीन तुरुप का वह पत्ता रहे हैं जो जिसके भी हाथ में आएगा, चुनाव में उसके वारे न्यारे हो जाएंगे. इसीलिए सभी उन्हें पटाने में लगे रहे हैं.

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अजमल परफ़्यूम ब्रैंड

केवल 10 साल के अंदर असम की राजनीति में ख़ास हैसियत हासिल करने वाले 65 वर्षीय बदरुद्दीन अजमल मूल रूप से इत्र के बड़े कारोबारी हैं.

इत्र बनाना और बेचना उनका ख़ानदानी पेशा है जिसे वे पिछले 60 साल से कर रहे हैं. कहा जाता है कि कुल 500 रुपये लेकर वे मुंबई गए थे.

वहाँ से उन्होंने इत्र के अपने ब्रैंड अजमल परफ़्यूम को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में फैलाना शुरू किया.

फिर उन्होंने दुबई में ब्रांच खोली और अब 20 देशों में उनके इत्र ख़ुशबू बिखेरकर उनकी झोली भर रहे हैं.

हमेशा कंधे पर असमिया गमछा लटकाए रखने वाले मौलाना बदरुद्दीन का व्यापारिक साम्राज्य अब इत्र तक सीमित नहीं रह गया है.

रियल इस्टेट से लेकर चमड़ा उद्योग, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा जगत तक वे अपना पैर पसार चुके हैं. लेकिन बदरुद्दीन की छवि केवल व्यापारी भर की भी नहीं है.

वे दारूल उलूम देवबंद से इस्लाम और अरबी में फ़ाज़िल-ए-देवबंद (पोस्ट ग्रेजुएट के समतुल्य) हैं.

ज़ाहिर है कि इसका इस्तेमाल उन्होंने ख़ुद को मुसलमानों के धार्मिक नेता के रूप में स्थापित करने के लिए किया है. इसमें वे काफ़ी हद तक कामयाब भी हुए हैं.

अपनी तीसरी पहचान उन्होंने समाजसेवा के क्षेत्र में बनाई है. अजमल फ़ाउंडेशन की देखरेख में असम में कई शिक्षा संस्थान, मदरसे, अनाथालय और अस्पताल चलते हैं.

बदरुद्दीन का कहना है कि वे अपने पिता की नसीहत के मुताबिक़ अपनी कमाई का 25 फ़ीसदी असम के विकास पर ख़र्च करते हैं.

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वंशवादी सियासत

पिछले एक दशक में इत्र के इस कारोबारी ने एक सियासी खिलाड़ी के रूप में अपनी मज़बूत पहचान गढ़ी है.

असम में बढ़ता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण उनके लिए बेहद मददगार साबित हुआ है. उन्होंने ख़ुद भी कई बार सांप्रदायिक पैंतरेबाज़ी दिखाकर उसका भरपूर लाभ उठाया है.

राज्य में मुस्लिम नेतृत्व के मामले में पैदा हुए शून्य को उन्होंने बख़ूबी भुनाया है. लेकिन वो भड़काऊ भाषण नहीं देते.

उनकी राजनीतिक भाषा में टकराव के तत्व बहुत कम हैं. हाँ, अल्पसंख्यकों के भय को भुनाने की कला में उन्हें महारत हासिल है.

हालाँकि मौलाना पर बीजेपी का साथ देने के आरोप भी लगते रहे हैं.

लोकसभा चुनाव में उन्होंने सात सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर दिए थे, जिसकी वजह से वोट बँटे और दो सीटों पर उसका लाभ बीजेपी को मिला.

उन्हें 'हुजूर' कहकर संबोधित करने वालों ने ही इसका जमकर विरोध किया था. उनके विरोध की एक बड़ी वजह मौलाना की वंशवादी सियासत भी है.

उन्होंने अजमल ख़ानदान को नए राजनीतिक घराने के रूप में क़ायम किया है.

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धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण

वास्तव में असम की आबादी की बनावट बदरुद्दीन की सबसे बड़ी मददगार साबित हो रही है.

विधानसभा की 126 में से 39 सीटें ऐसी हैं जिनमें मुस्लिम आबादी 35 फ़ीसदी के आसपास है, जबकि 20 सीटों पर वे 25 से 30 प्रतिशत तक है.

यानी लगभग 50 सीटों पर धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करके वे अपना जलवा दिखा सकते हैं.

चतुर व्यापारी और घाघ नेता बदरूद्दीन इससे वाक़िफ़ हैं और इस मौक़े को भुनाने के लिए वे हर संभव दांव खेलने के लिए तैयार भी.

इसके लिए वे तमाम दलों के साथ कड़ी सौदेबाज़ी में लगे हुए रहते हैं.

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