#HerChoice: 'अगले दस दिन के लिए ना मैं किसी की पत्नी, ना ही मां'

  • 24 फरवरी 2018
हर च्वाइस, औरतों की कहनी

क्या आप कभी स्पीति गए हैं? ये देश के उत्तर में हिमालय की पहाड़ियों में मौजूद एक घाटी है जहां काफ़ी कम लोग रहते हैं.

यहां मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता और यही कारण है कि मैं यहां जाती हूं. मैं यहां बिल्कुल आज़ाद और पूरी तरह से अपने साथ अपनी ज़िंदगी जीने जाती हूं.

हम दो युवा महिलाएं थीं और साथ में था हमारा ड्राइवर. मुझे आज भी वो रात याद है जब कागज़ के कप में उसने हमें देसी शराब पीने के लिए दी थी.

शुक्र है कि हमने उस वक्त उस कड़वे ज़हर के समान शराब को चखा क्योंकि ऐसा करने में मज़ा आया. मैं कार की छत पर बैठी थी और ठंडी हवा के झोंके मेरे शरीर और आत्मा को सहला रहे थे.

30 साल की उम्र में पहुंचने से पहले शादी करने वाली मध्यवर्ग की किसी महिला के लिए ये सब लगभग नामुमकिन ही था. अनजाने रास्ते पर, अनजाने लोगों के बीच और अपने पति की नज़रों और अपने घर की चिंताओं से दूर.

लेकिन मैंने ऐसा सिर्फ़ इसलिए नहीं किया कि मुझे इसमें मज़ा आया. साल-दो साल में अपने घर से दूर ऐसी किसी जगह जाना जहां मोबाइल का नेटवर्क ना मिलता हो, ऐसा करने के पीछे मेरी अपनी वजहें हैं.

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#HerChoice 12 भारतीय महिलाओं के वास्तविक जीवन की कहानियों पर आधारित बीबीसी की विशेष सिरीज़ है. ये कहानियां 'आधुनिक भारतीय महिला' के विचार और उसके सामने मौजूद विकल्प, उसकी आकांक्षाओं, उसकी प्राथमिकताओं और उसकी इच्छाओं को पेश करती हैं.

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मैं और मेरे पति दोनों कलाकार हैं और घूमना हम दोनों का ही शौक है. लकिन जब भी हम साथ में कहीं घूमने जाते हैं मेरे पति मुझे अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं.

जितने फ़ैसले होते हैं सभी वो लेते हैं, जैसे किस गाड़ी में जाना है, कब निकलना है, कहां रुकना है, कौन सा होटल होटल, कितनी सुरक्षा और बाकी सब भी. वो मेरी राय तो पूछते हैं लेकिन वो बस अपने लिए फ़ैसले के बारे में बताना भर होता है.

होटल के कमरे में मेरे जाने से पहले वो खुद जा कर कमरा चेक करते हैं, वो पहले मेन्यू कार्ड पकड़ते हैं और मुझसे पूछते हैं कि मुझे क्या चाहिए. ताला लगाने से लेकर सामान उठाने तक- सभी काम वो ही करते हैं.

मैं एक ज़िम्मेदारी होती हूं और वो फ़ैसला लेने वाले. अब बस भी कीजिए!

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सच कहूं तो मुझे एक ब्रेक चाहिए था. मेरे बेटे के पैदा होने के बाद मुझे इसकी अधिक ज़रूरत महसूस हुई. मेरा काम करना और मेरा बाहर जाना कम हो रहा था लेकिन मेरे पति के लिए सब कुछ पहले की तरह ही था.

तब मैंने सोचा कि मैं अकेले ही बाहर जाऊंगी. हम दोनों इस बात पर राज़ी थे कि वो कुछ दिन के लिए घर पर रहेंगे और बच्चे की देखभाल करेंगे.

मेरे पति के बिना मेरा जो पहला सफ़र था, वो काफ़ी हद तक पहले से प्लान किया हुआ था. लेकिन इसके बावजूद वो मुझे मैसेज भेजते या फिर हर घंटे-दो घंटे में मुझे फ़ोन करते और पूछते कि मैं कहां तक पहुंची? क्या वहां पर ज़्यादा ट्रैफ़िक है? क्या मैंने ये चेक किया? क्या मैंने वो देखा?

मुझे यकीन है कि ये मेरी सुरक्षा के लिए ही था. लेकिन मैं हर थोड़ी देर में उनको हर बारे में जानकारी देते-देते तंग आ चुकी थी. मुझे लगा कि मुझ पर नज़र रखी जा रही है, मेरे सफ़र की हर एक बात की निगरानी हो रही है.

और इस कारण मैंने ऐसी जगहों के बारे में तलाशना शुरु कर दिया जहां पर मोबाइल नेटवर्क ही न हो.

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ज़बरदस्ती करने वाले पति को मैंने छोड़ दिया

मेरे हिसाब से हर छोटी बात पर घर फ़ोन करना और पूछना कि खाना खाया या नहीं, होमवर्क किया या नहीं- या फिर घर के बारे में सवालों के उत्तर देना मेरे लिए घूमने के मज़े लेने जैसा नहीं था. मैं खुशी पाने के लिए घूमने निकली थी.

ये बात सच है कि मैं मध्य वर्ग से हूं और अधेड़ उम्र की शादीशुदा महिला हूं जिसका सात साल का बेटा है. लेकिन क्या केवल यही मेरी पहचान हैं? एक पत्नी और एक मां? और क्या इस तरह का कोई नियम है कि शादीशुदा महिला को अपने पति के साथ ही घूमने जाना चाहिए?

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जब मैं भूटान गई हुई थी तो उस बीच मेरे बेटे के स्कूल में पेरेंट-टीचर मीटिंग हुई. मेरे पति उस मीटिंग में गए थे. बाद में उन्होंने मेरे बेटे के एक दोस्त के साथ हुई अपनी बातचीत मुझे बताई.

उन्होंने मेरे पति से पूछा, "आपकी पत्नी कहां हैं?" मेरे पति ने कहा, "वो शहर से बाहर गई हैं."

उन्होंने कहा, "ओह... काम के लिए?" "नहीं बस ऐसे ही... घूमने के लिए", मेरे पति ने कहा.

आश्चर्यचकित होते हुए उन्होंने कहा, "क्या वाक़ई? आपको अकेला छोड़ कर?" उन्होंने इस तरह ये बात कही जैसे कि मैंने अपने पति को ही छोड़ दिया हो!

मेरे पति उस वक्त इस पूरे वाक़ये पर हंस दिए और एक चुटकुला सुनाने की तरह ही मुझे ये सब सुनाया. लेकिन मुझे ये कतई मज़ाक नहीं लगा.

कुछ महीने पहले इन्हीं महिला से मेरे मुलाक़ात हुई और हमारे बीच कुछ इसी तरह की बात हुई थी. उस वक्त उनके पति 'बाइक एक्सपीडिशन' के लिए गए हुए थे और वो इस बात को मुझे बहुत गर्व के साथ बता रही थीं.

मैंने उस वक्त उनसे ये नहीं पूछा, "क्या वो आपको अकेला छोड़ गए? मतलब आपको छोड़ कर चले गए?"

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वो अकेली नहीं हैं. केवल अपने आनंद के लिए महिला का अकेले घूमने जाने कईयों को अजीब लगता है और मेरे परिवार के कुछ लोगों के लिए भी ये अजीब ही था.

जब मैंने पहली बात अकेले घूमने जाने का फ़ैसला किया तो मेरी सास को ये ठीक नहीं लगा. लेकिन मेरे पति समझते हैं कि मेरा अकेले घूमने जाना क्यों ज़रूरी है. उन्होंने मेरी सास को समझाया तो उन्होंने फिर इसका विरोध नहीं किया.

मेरी अपनी मां भी अब तक 'मेरे अपने समय' के मेरे विचार को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाईं हैं. मैं इस बार घूमने निकली तो मैंने उन्हें नहीं बताया.

बाद में उन्होंने फ़ोन किया और पूछा, "तुम कहां पर हो? मैं कल से तुमसे बात करने की कोशिश कर रही हूं." मैंने कहा, "मां, मैं ट्रिप पर बाहर हूं."

"फिर से? क्यों? कहां?", उन्होंने पूछा.

"हां, बस ऐसे ही.... बस थोड़ा ब्रेक चाहिए था. इस बार रोड़ ट्रिप पर निकली हूं", मैंने कहा.

उन्होंने फिर पूछा, "ठीक है. तुम्हारा बच्चा और उसके पिता कैसे हैं?"

"अच्छे हैं. वो मेरे साथ नहीं हैं, वो लोग घर पर हैं" मैंने कहा.

वो बोलीं, "हे भगवान! किस तरह की मां हो तुम? तुम उस नन्हें बच्चे को ऐसे ही छोड़ कर कैसे घूमने के लिए जा सकती हो? उसकी मां उसे नज़रअंदाज़ कर रही है, भगवान जाने उसे कैसा लगता होगा. मुझे नहीं पता कि तुम्हें तुम्हारी सास ने जाने कैसे दिया?"

मैंने सवाल किया, "मां क्या आप चाहती हैं कि मैं एक खूंटे से बंधी रहूं?"

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ये कोई नई बात नहीं थी. मैं जब भी अकेले घूमने के लिए निकली हूं ऐसा ही हुआ है. मुझे नहीं लगता कि वो इस बात से सहमत नहीं है लेकिन शायद उन्हें 'मेरे अपने वक्त' की मेरी ज़रूरत से इस बात का ज़्यादा डर है कि लोग क्या कहेंगे.

मैं अपन आप को खोजती हुई अकेले ही निकलती हूं. मैं अपने परिवार की चिंता करती हूं लेकिन मैं अपनी चिंता भी करती हूं. जब भी मैं घूमने निकलती हूं मैं अपना ख्याल रखती हूं.

जब भी मां इस तरह अकेली बाहर जाती हूं मेरे ज़िम्मेदारी और फ़ैसले- सभी मेरे ही होते हैं. मैं सुरक्षित रहती हूं लेकिन मैं नया कुछ करने का साहस भी करती हूं. मैं उस दौरान एक अलग महिला होती हूं.

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हमें स्पीति ले कर जाने वाला ड्राइवर जिसने हमें देसी शराब पीने के लिए दी वो हैंडसम आदमी था और मुझे उसके साथ बात करने और शराब पीने में मज़ा आया. उसने बहुत अच्छा पहाड़ी लोकगीत भी गया.

बीते साल जब मैं अपनी महिला दोस्त के साथ घूमने गई थी और हमारे ड्राइवर ने हमें होटल में छोड़ा था तो उसने हमसे पूछा था, "कुछ और इंतज़ाम लगेगा आपको?"

मैंन अब भी ये सोच कर हंसती हूं कि उसका मतलब क्या था- वो हमें शराब के लिए पूछ रहा था या जिगोलो के लिए पूछ रहा था!

इस तरह के अनुभव और असल ज़िंदगी के इन लोगों से आपकी मुलक़ात तभी होती है जब आप अपने ऊपर लगे शादीशुदा के ठप्पे को हटा दें या फिर कुछ दिन के लिए सिर्फ़ एक औरत नज़र आएं, किसी की मां या किसी की पत्नी नहीं.

(यह कहानी पश्चिम भारत में रहने वाली एक महिला की है जिनसे बात की बीबीसी संवाददाता अरुंधती रानाडे जोशी ने. महिला के आग्रह पर उनकी पहचान गुप्त रखी गई है. इस सिरीज़ की प्रोड्यूसर दिव्या आर्य हैं.)

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