सोहराबुद्दीन मामले में कुछ अभियुक्तों को बरी करना सही नहीं था : जस्टिस थिप्से

  • 24 फरवरी 2018
जस्टिस अभय थिप्से

इलाहाबाद और बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस अभय थिप्से ने कहा है कि सोहराबुद्दीन शेख की कथित फर्ज़ी मुठभेड़ मामले में हुई सुनवाई में कुछ अनियमितताएं हैं.

उन्होंने मांग की है कि इस मामले में जो डिस्चार्ज आदेश यानी बरी किए जाने के दिए गए हैं उन्हें फिर से देखा जाना चाहिए. इस मामले में विशेष अदालत ने भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और कई आईपीएस अधिकारियों को बरी कर दिया था.

जस्टिस थिप्से ने ये भी मांग की है कि जज बृजगोपाल लोया के फो़न कॉल रिकॉर्ड्स की भी जांच की जाए. सोहराबुद्दीन केस में जज लोया भी एक न्यायाधीश थे. साल 2014 में नागपुर में उनकी मौत हो गई थी जिसके बाद उनकी मौत को लेकर भी सवाल उठे थे.

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फ़ैसले पर सवाल

जस्टिस थिप्से ने बीबीसी संवाददाता अभिजीत कांबले से बातचीत में इस केस की तीन 'अनियमितताओं' का जिक्र किया.

पहली अनियमितता के बारे में थिप्से कहते हैं, "मुझे लगता है कि इस मामले में अदालत का कुछ अभियुक्तों को बरी करना सही नहीं था."

"अभियुक्तों को कई साल तक ज़मानत नहीं मिली थी. अगर उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं था तो उन्हें पहले ही ज़मानत मिल जाती."

"इन अभियुक्तों ने समय-समय पर अलग-अलग अदालतों में जमानत के लिए गुहार लगाई थी और अदालतों ने इन्हें ख़ारिज कर दिया था. लेकिन बाद में स्पेशल कोर्ट ने कहा कि इनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला, ये चौंकाने वाला था."

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थिप्से कहते हैं कि इस मामले में केस सुनवाई के संबंध में ख़बरें न छापी जाएं इसके लिए मीडिया को आदेश जारी किए गए थे जो ग़ैरज़रूरी था.

वो कहते हैं, "वास्तव में, मुक़दमा निष्पक्ष हो इसके लिए खुली सुनवाई होना बेहद ज़रूरी है. मानवाधिकारों की दृष्टि से ये उस व्यक्ति के लिए ज़रूरी है जिस पर आरोप लगाए गए हैं."

"आश्चर्य की बात यह है कि इस मामले में अभियुक्तों ने यानी जिन पर आरोप लगे हैं उन्होंने मीडिया में इस केस की चर्चा न किए जाने की गुज़ारिश की और अदालत ने तुरंत इसका अनुमोदन कर दिया."

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क्यों बदले गए जज?

जस्टिस थिप्से के मुताबिक तीसरी अनियमितता ये है , "जब सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई गुजरात की बजाय महाराष्ट्र में कराने का आदेश जारी किया था तो ये कहा गया था कि आख़िर तक एक ही जज को इस मामले में सुनवाई करनी चाहिए."

लेकिन सुनवाई के दौरान पहले जज को उनका कार्यकाल ख़त्म होने से पहले ही बदल दिया गया था. बाद में जज लोया की नियुक्ति हुई. इस बात को स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कार्यकाल ख़त्म होने से पहले जज को क्यों बदला गया."

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जज लोया की मौत पर जस्टिस थिप्से कहते हैं, "मैं ये नहीं कहूंगा कि जज लोया की मौत प्राकृतिक है या नहीं. लेकिन इस मामले में आरोप लगाए गए हैं, कई जाने माने क़ानून के जानकारों ने इसकी जांच की मांग की है. उनकी मौत को लेकर जो सवाल उठे हैं. उनके उत्तर तलाशने के लिए इसकी जांच की जानी चाहिए."

वो कहते हैं, "ये महत्वपूर्ण बात है कि जज लोया मामले में कई और आरोप लगाए गए हैं. आरोप लगाए गए हैं कि उनसे संपर्क करने की कोशिश की गई थी. उन्हें इसकी जांच के लिए उनके कॉल रिकॉर्ड की जांच की जानी चाहिए ताकि उनसे संबंधित अन्य मामलों पर भी रोशनी डाली जा सके."

जस्टिस थिप्से ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्तों को बरी करने के जो आदेश जारी किए हैं उन पर हाई कोर्ट फिर से ग़ौर कर सकती है.

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क्या है सोहराबुद्दीन मामला?

साल 2005 में गुजरात में सोहराबुद्दीन शेख की मौत हो गई थी. गुजरात पुलिस का कहना था कि एक मुठभेड़ में उनकी मौत हो गई थी. हालांकि इस प्रकार के आरोप लगाए गए थे कि ये मुठभेड़ फ़र्ज़ी थी.

साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि इस मामले की सुनवाई गुजरात के बजाय महाराष्ट्र में की जाए.

इस मामले में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी अभियुक्त बनाए गया था. साल 2010 में अमित शाह को गिरफ़्तार किया गया था और बाद में उन्हें ज़मानत दे दी गई थी.

इस मामले में अमित शाह समेत कुल 15 लोगों को आरोपमुक्त कर दिया गया था. इनमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी शामिल थे.

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वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे का कहना है कि अमित शाह को बरी किए जाने के ख़िलाफ़ बॉम्बे लॉयर एसोसिएशन ने कोर्ट में एक याचिका दायर की है. इस याचिका पर अब तक सुनवाई नहीं हुई है.

सोहराबुद्दीन शेख के भाई रबाबुद्दीन शेख के वकील गौतम तिवारी कहते हैं, "हमने इस मामले में तीन अभियुक्तों को बरी किए जाने के ख़िलाफ़ आवेदन किया है. ये तीन लोग हैं- दिनेश एमएन, राजकुमार पांडियन और डीजी वंजारा. ये सभी लोग वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं."

तिवारी ये भी कहते हैं कि इस मामले में करीब तीस गवाह अपने बयान से पलट गए थे.

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