'कसम ली थी कि सदन में मुख्यमंत्री बनकर ही लौटूंगी'

  • रेहान फ़ज़ल
  • बीबीसी संवाददाता
जयललिता

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25 मार्च 1989 का दिन था. तमिलनाडु विधानसभा में बजट पेश किया जा रहा था. जैसे ही मुख्यमंत्री करुणानिधि ने बजट भाषण पढ़ना शुरू किया कांग्रेस के सदस्य ने प्वाएंट ऑफ़ ऑर्डर उठाया कि पुलिस ने विपक्ष की नेता जयललिता के ख़िलाफ़ अप्रजातांत्रिक तरीके से काम किया है.

जयललिता ने भी उठ कर शिकायत की कि मुख्यमंत्री के उकसाने पर पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की है और उनके फ़ोन को टैप किया जा रहा है. स्पीकर ने कहा कि वो इस मुद्दे पर बहस की अनुमति नहीं दे सकते क्योंकि बजट पेश किया जा रहा है.

ये सुनना था कि विधानसभा सदस्य बेकाबू हो गए. एआईडीएमके के सदस्य चिल्लाते हुए सदन के वेल में पहुंच गए. एक सदस्य ने ग़ुस्से में करुणानिधि को धक्का देने की कोशिश की जिससे उनका संतुलन बिगड़ गया और उनका चश्मा ज़मीन पर गिर कर टूट गया. एक एआईडीएमके सदस्य ने बजट के पन्नों को फाड़ दिया.

विधानसभा के अध्यक्ष ने सदन को स्थगित कर दिया. जयललिता की जीवनी 'अम्मा जर्नी फ़्राम मूवी स्टार टु पॉलिटिकल क्वीन' लिखने वाली वासंती बताती हैं, "जैसे ही जयललिता सदन से निकलने के लिए तैयार हुईं, एक डीएमके सदस्य ने उन्हें रोकने की कोशिश की. उसने उनकी साड़ी इस तरह से खींची कि उनका पल्लू गिर गया. जयललिता भी ज़मीन पर गिर गईं."

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अभिनेत्री नहीं बनना चाहती थीं जयललिता

प्रतिज्ञा की

"एक बलिष्ट एआईडीएमके सदस्य ने डीएमके सदस्य की कलाई पर ज़ोर से वार कर जयललिता को उनके चंगुल से छुड़वाया. अपमानित जयललिता ने पांचाली की तरह प्रतिज्ञा ली की कि वो उस सदन में तभी फिर कदम रखेंगी जब वो महिलाओं के लिए सुरक्षित हो जाएगा. दूसरे शब्दों में वो अपने आप से कह रही थीं कि वो अब तमिलनाडु विधानसभा में मुख्यमंत्री के तौर पर ही वापस आएंगी."

अभिनेत्री से राजनेता बनीं जयललिता के बारे में बहुत कम लोगों को पता है कि वो अभिनेत्री कतई नहीं बनना चाहती थीं. वो बहुत अच्छी छात्रा थीं. स्कूल के दिनों में उन्हें सर्वश्रेष्ठ छात्रा की शील्ड मिली और दसवीं कक्षा की परीक्षा में उन्हें पूरे तमिलनाडु में दूसरा स्थान मिला.

गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वो अपनी माँ के साथ एक समारोह में गईं जहाँ एक प्रोड्यूसर वीआर पुथुलू ने उन्हें अपनी फ़िल्म में काम करने का प्रस्ताव दिया. उनकी माँ ने उनसे पूछा और उन्होंने हाँ कर दी.

अपनी दूसरी ही फ़िल्म में जयललिता को उस समय तमिल फ़िल्मों के चोटी के अभिनेता एमजी रामचंद्रन के साथ काम करने का मौका मिला.

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जयललिता की ज़िंदगी...हर पड़ाव-हर लम्हा

वासंती कहती हैं, "एमजीआर उनसे शुरू से फ़ैसिनेटेड थे. जयललिता बहुत अच्छी अंग्रेज़ी बोलती थीं. दूसरी अभिनेत्रियों और उनमें बहुत अंतर था. शूटिंग के समय वो एक कोने में बैठ कर अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ा करती थीं और किसी से कोई बातचीत नहीं करती थीं."

"देखने में बहुत सुंदर थी... एकदम गोरी चिट्टी. तमिलनाडु में आमतौर से इतनी गोरी लड़कियाँ नहीं दिखाई देती हैं."

एमजीआर का जयललिता के प्रति शुरू से ही साफ़्ट कॉर्नर हो गया था. एक बार थार रेगिस्तान में शूटिंग के दौरान रेत इतना गर्म था कि जयललिता उस पर चल नहीं पा रही थी. तभी एमजीआर ने पीछे से आ कर उन्हें गोदी में उठा लिया था ताकि उनके पैर न जलें.

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बीबीसी के दफ़्तर में रेहान फ़ज़ल के साथ वरिष्ठ पत्रकार और जयललिता पर किताब लिख चुकीं वासंती

जयललिता और एमजीआर

वासंती बताती हैं, "जयललिता ने खुद कुमुदन पत्रिका में लिखा है कि कार पार्किंग थोड़ी दूर पर थी. पैरों में कोई चप्पल और जूते नहीं थे. एक कदम भी नहीं चल पा रही थी. मेरे पैर लाल हो गए थे. मैं कुछ कह नहीं पा रही थी लेकिन एमजीआर मेरी परेशानी को समझ गए और उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठा लिया."

एमजीआर और जयललिता के संबंधों में भी बहुत उतार चढ़ाव आए. उन्होंने उन्हें पार्टी के प्रोपेगेंडा सचिव के साथ साथ राज्यसभा का सदस्य भी बनाया. लेकिन पार्टी में जयललिता का इतना विरोध हुआ कि एमजीआर को उन्हें प्रोपेगेंडा सचिव के पद से हटाना पड़ा.

इस बीच एमजीआर गंभीर रूप से बीमार हो गए. जब उनका देहांत हुआ तो उनके परिवार वालों ने जयललिता को उनके घर तक में नहीं घुसने दिया.

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वासंती बताती हैं, "जयललिता एमजीआर के घर के सामने कार से उतरीं और अपनी हथेलियों को ज़ोर ज़ोर से गेट पर मारने लगीं. जब गेट खुला तो किसी ने उनसे नहीं बताया कि एमजीआर के शव को कहाँ रखा गया है."

"वो गेट से पीछे की सीढ़ियों तक कई बार दौड़ कर गईं लेकिन एमजीआर के घर का हर दरवाज़ा उनके लिए बंद कर दिया गया."

"बाद में उन्हें बताया गया कि एमजीआर के पार्थिव शरीर को पिछले दरवाज़े से राजाजी हॉल ले जाया गया है. जयललिता तुरंत अपनी कार में बैठीं और ड्राइवर से राजाजी हॉल चलने के लिए कहा. वहाँ वो किसी तरह अपने आप को एमजीआर के सिरहाने पहुंचाने में सफ़ल हो गईं."

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फ़ाइल फ़ोटो

वासंती बताती हैं कि उस दिन जयललिता की आँखों से एक आँसू नहीं निकला. वो दो दिनों तक एमजीआर के पार्थिव शरीर के सिरहाने खड़ी रहीं...13 घंटे पहले दिन और 8 घंटे दूसरे दिन. एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन की कुछ महिला समर्थकों ने उनके पैरों को अपनी चप्पलों से कुचलने की कोशिश की.

"कुछ ने उनकी त्वचा में नाख़ून गड़ा कर उन्हें चिकोटी काटने की कोशिश की ताकि वो वहाँ से चली जांए. लेकिन जयललिता सारा अपमान सहते हुए वहाँ से टस से मस नहीं हुईं. जब एमजीआर के पार्थिव शरीर को अंतिम यात्रा के लिए गन कैरेज पर ले जाया गया तो जयललिता भी उसके पीछे पीछे दौड़ीं. उस पर खड़े एक सैनिक ने अपने हाथों का सहारा देकर उन्हें ऊपर आने में भी मदद की."

"तभी अचानक जानकी के भतीजे दीपन ने उन पर हमला किया और उन्हें गन कैरेज से नीचे गिरा दिया. जयललिता ने तय किया कि वो एमजीआर की शव यात्रा में आगे नहीं भाग लेंगीं. वो अपनी कंटेसा कार में बैठीं और अपने घर वापस आ गईं."

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1992 के आम चुनाव में जयललिता ने पहली बार जीत दर्ज की और राज्यपाल भीष्म नारायण सिंह ने उन्हें पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई.

गाजर का हलवा पसंद था

भीष्म नारायण सिंह बताते हैं, "जयललिताजी जब शपथ लेने के बाद मुझसे मिलने आईं तो मुझे पता चल चुका था कि वो गाजर का हलवा पसंद करती हैं. इसलिए मैंने उनके लिए गाजर का हलवा बनवाया. मैंने उनसे कहा कि आपका दृष्टिकोण राष्ट्रीय है, इसलिए मैं उम्मीद करता हूँ कि आप कानून और व्यवस्था के मुद्दे पर वही लाइन लेंगीं और एलटीटीई जैसे पृथकतावादी संगठनों को अपनी जड़ें जमाने का मौका नहीं मिलेगा."

"मेरे प्रति उनके मन में इतना सम्मान था कि वो हर हफ़्ते कोशिश करती थीं कि आकर राज्यपाल को ब्रीफ़ करें. भारत के किसी राज्य में एसपी से लेकर मुख्य सचिव की ट्रांसफ़र की फ़ाइल कभी भी राज्यपाल को नहीं भेजी जाती हैं, लेकिन जब तक मैं वहाँ का राज्यपाल रहा, ट्रांसफ़र और पोस्टिंग की फ़ाइल हमेशा मेरे पास आती थी."

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तमिलनाडु के पूर्व राज्यपाल भीष्म नारायण सिंह के साथ रेहान फ़ज़ल

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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जयललिता चार बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री चुनी गई थीं. अपने मज़बूत प्रशासन के लिए जहाँ उन्हें अक्सर वाहवाही मिली है, वहीं उन पर व्यक्ति पूजा और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार एम आर नारायणस्वामी कहते हैं, "काफ़ी अद्भुत करियर रहा है इनका. ध्यान देने वाली बात ये है कि ये ब्राह्मण जाति से आती हैं और इनका जन्म कर्नाटक में हुआ है. उन्होंने जिस तरह से एआईडीएमके पार्टी पर अपना नियंत्रण जमाया, उसे एक बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाएगा."

"चाहे हम उन्हें पसंद करें या नापसंद करें. इनके प्रशासन में बहुत कमियाँ रही हैं, लेकिन बहुत उपलब्धियाँ भी रही हैं, जिस तरह उन्होंने सुनामी के दौरान प्रशासन चलाया, लोग उसे आज भी याद करते हैं. ये अलग बात है कि जब पिछले साल चेन्नई में बाढ़ आई थी तो उनका प्रशासन फ़ेल हो गया था."

जयललिता की मीडिया से बहुत कम बनी. उन पर सनकी और मूडी होने का ठप्पा भी लगा. बीबीसी के लिए दिए एकमात्र इंटरव्यू में वो मशहूर पत्रकार करण थापर के सवाल पूछने के ढ़ंग से नाराज़ हो गईं. जब इंटरव्यू के अंत में थापर ने कहा कि उन्हें उनसे बात कर बहुत खुशी हुई है तो जयललिता का जवाब था, "मुझे आपसे मिल कर कतई ख़ुशी नहीं हुई. नमस्ते."

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1998 में उन्होंने वाजपेयी सरकार को समर्थन दिया, लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनकी करुणानिधि सरकार को बर्ख़ास्त करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, तो उन्होंने समर्थन वापस ले लिया. सन 2002 में जब आधी रात को करुणानिधि को जगा कर गिरफ़्तार किया गया तो उन पर बदले की कार्रवाई करने का आरोप भी लगा.

बदले की भावना

नारायणस्वामी कहते हैं, "वो बदले की भावना से काम करने में यकीन करती हैं. वो बहुत मूडी हैं, मतलब आज वाजपेयी से हाथ मिला लिया. कल धकेल दिया. आज सोनिया गांधी से गले मिल गईं. कल कह दिया बेकार हैं. उनमें स्थायित्व का अभाव एक बड़ा अवगुण रहा. वो मास लीडर हैं. उनको लाखों लोग पसंद करते हैं लेकिन उन्होंने चंद लोगों को जिनका राजनीति से कोई वास्ता नहीं है, अपने इर्द गिर्द रख रखा है."

उन्होंने बताया- "जिस ढ़ंग से उन्होंने मुंहबोले भान्जे की शादी करवाई, इसने उनको बहुत नुकसान पहुंचाया. इससे साफ़ लगा कि जो शादी करवा रहा है, वो राजनीति का बंदा नहीं है. उसे इस बात की समझ ही नहीं है कि देश और तमिलनाडु में कितनी गरीबी है और लोग किस तरह से रहते हैं. राजनीति में इस तरह के इंप्रेशन या संकेत ज्यादा नुकसान करते हैं, बजाए इसके कि अदालत में ये तय हो कि आप भ्रष्ट हैं या नहीं."

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वो तुनुकमिज़ाज हों, अस्थिर हों, अक्खड़ हों, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि वो बहुत मज़बूत नेता रही हैं जिनको लोगों ने असीम प्यार दिया है.

वासंती कहती हैं, "उनकी ताक़त थी कि वो बहुत मज़बूत नेता रही हैं. उनका पार्टी पर इतना मज़बूत नियंत्रण है कि लोग उनके सामने काँपा करते हैं. वो अपने मंत्रियों से मिलना भी पसंद नहीं करती हैं. लोगों में मुफ़्त चीज़े बांटने की नीति ने भी उन्हें बहुत लोकप्रिय बनाया... मुफ़्त ग्राइंडर, मुफ़्त मिक्सी, बीस किलो चावल देने पर अर्थशास्त्रियों ने बहुत नाक भौं सिकोड़ी, लेकिन इसने महिलाओं के जीवनस्तर को उठा दिया... और लोगों के बीच उनकी जगह बनती चली गई."

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