नगालैंड: भाजपा के लिए मुसीबत बना चर्च का एक ख़त

  • 25 फरवरी 2018
नागालैंड में चर्च इमेज कॉपीरइट शरद बधावे

नगालैंड देश का ऐसा राज्य है जिसकी 90 फीसदी से ज़्यादा आबादी ईसाई है. ज़ाहिर है कि नागाओं के इस राज्य में चर्च की राय आम ज़िंदगी मे भी ज़्यादा मायने रखती है और राजनीति में भी.

27 फ़रवरी को होने जा रहे विधानसभा चुनावों में चर्च की ही एक राय की वजह से राजनीतिक भूचाल-सा आ गया है.

नगालैंड की 1500 से ज़्यादा चर्चों की मुख्य संस्था कही जाने वाली 'नगालैंड बाप्टिस्ट चर्च काउन्सिल' के जनरल सेक्रेटरी रेव्हरंड डॉ झेल्हू किहो ने 1 फ़रवरी को एक खुला खत लिखकर बीजेपी, आरएसएस और हिंदुत्व की विचारधारा पर हमला कर दिया.

कथित तौर पर उनके खत में लिखा है, "आरएसएस का राजनीतिक संगठन भाजपा जब से देश में सत्ता में आया है तब से हिंदुत्व की ताकत बढ़ी है और उसका रूप आक्रामक हो गया है. आप आम आदमी को कितना भी समझाने की कोशिश करो इसे नकारा नहीं जा सकता. आप इससे भी इनकार नहीं कर सकते कि केंद्र में सत्तासीन ये पार्टी पूरी ताकत से ईसाई बहुल नगालैंड में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है. क्या आपने यह सोचा है कि इसके पीछे उनका उद्देश्य क्या है? अगर नहीं सोचा है, तो बेवकूफ़ ना बनें.'

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Image caption 'नागलैंड बाप्टिस्ट चर्च काउन्सिल' के जनरल सेक्रेटरी रेव्हरंड डॉ झेल्हू किहो

इस खुले खत में लिखा गया है कि भाजपा सरकार के आने के बाद ईसाई, मिशनरी, फ़ादरों पर हमले बढ़े हैं. खत के आख़िरी हिस्से में रेव्हरंड किहो अपील करते हैं, "जो ईसा को ज़ख़्मी करना चाहते हैं उनके हाथों, पैसों और विकास के नाम पर अपने धर्म के सिद्धांतों से समझौता ना करें."

नगालैंड में चर्च बीजेपी के ख़िलाफ़ है और उसे वोट ना करने की सलाह दे रहा है- इस मायने से राज्य की राजनीति में हड़कंप मच गया है.

भाजपा इस चुनाव में तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके निफ़्यू रियो की पार्टी एनडीपीपी के साथ गठबंधन में है और 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर रही है.

रेव्हरंड किहो कहते हैं, "मैंने खत में ऐसा कभी नहीं लिखा कि लोग भाजपा को वोट ना दें. मैंने कहा कि भाजपा आरएसएस की राजनीतिक शाखा है और वो सांप्रदायिक पार्टी है. पूरा देश इसका अनुभव कर पा रहा है. और चर्च में हमें यह लगा की हमारे लोगों को आगाह करना हमारी ज़िम्मेदारी है. जो अन्य प्रदेशों में हो रहा है वो नगालैंड में भी आ सकता है."

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रेव्हरंड किहो कहते हैं, "राजनीतिक पार्टियां सेक्युलर होनी चाहिए, सांप्रदायिक नहीं, ऐसा ही मैंने कहा और उसके लिए बहुत आलोचना भी झेल रहा हूं."

लेकिन फिर भी, इस खत का चुनावी माहौल में जो असर पड़ना था वो पड़ ही गया दिखता है.

भाजपा के साथ गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार निफ़्यू रियो ने बीबीसी से कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ये नगालैंड के ईसाई संप्रदाय के साथ धोखा है और अगर भविष्य में धर्म और नगा पहचान पर कोई सवाल आया तो वो इस गठबंधन से बाहर निकल आएंगे.

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Image caption नगालैंड के लिए भाजपा के जनरल सेक्रेटरी एडुझू थेलुओ

भाजपा बचाव में

भाजपा भी इस खत में लिखी बातों को नकारते हुए रैलियों में खुद का बचाव कर रही है.

नगालैंड के लिए भाजपा के जनरल सेक्रेटरी एडुझू थेलुओ कहते हैं, "चर्च ने किसी एक पार्टी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा, वह सिर्फ़ परिस्थितियों पर अपनी राय दे रहे थे. मैं खुद एक बाप्टिस्ट ख्रिश्चन क्रिश्चियन हूं और मुझे ख़ुद भाजपा में होने से कोई ऐतराज़ नहीं है. भाजपा एक राजनीतिक पार्टी है और हम देश के संविधान के तहत काम करते हैं. हमने हमारे मैनिफ़ेस्टो मे भी लिखा है की हम अल्पसंख्यकों का ख्याल रखते हैं और सेक्युलर हैं."

हालांकि, थेलुओ मानते हैं कि इस खत से पार्टी को चुनाव में नुकसान हो सकता है.

एनडीपीपी के साथ गठबंधन में भाजपा राज्य के 30 में से 20 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा कर रही है. ये सारे उम्मीदवार ईसाई धर्म से हैं.

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Image caption इम्ती ज़मीर राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं

दिमापुर की एसडी जैन कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले इम्ती ज़मीर को लगता है की ईसाई अल्पसंख्यक के साथ पूरे भारत में जो हो रहा है उसे देखकर चर्च के अधिकारियों में असुरक्षा की भावना पैदा हुई होगी और इसीलिए यह ख़त लिखा गया होगा.

वो कहते हैं, "चर्च का प्रभाव हमेशा से नगालैंड की राजनीति पर रहा है. 1982 से ही चर्च क्लीन इलेक्शन का कैम्पेन चला रहा है. इसलिए जो हो रहा है वो कुछ नया नहीं है. अगर कोई पार्टी नागा लोगों की पहचान पर, राजनीतिक झुकाव पर प्रभाव डालती है तो ज़ाहिर है कि इसका प्रभाव चर्च पर भी पड़ेगा क्योंकि नागालैंड में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा ईसाई हैं. असुरक्षा की भावना ने उन्हें यह क़दम उठाने को मजबूर किया होगा. लेकिन मुझे लगता है की अंतिम निर्णय नागा वोटर ही लेंगे, चर्च नहीं."

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Image caption सुज़ैन लोथा

जनता की राय बंटी हुई

चर्च के इस खुले ख़त के बारे में नगालैंड में आम जनता की राय बंटी हुई है. सुज़ैन लोथा जुवेनाइल जस्टिस में काम करने वाली एक मनोवैज्ञानिक है.

वो कहती हैं, "चर्च कह रहा है कि हमें हिंसा नहीं चाहिए. वह ये नहीं कह रहा कि इसको वोट दो और इसको ना दो. हाँ, एनबीसीसी ने बीजेपी के बारे में कुछ कहा है. मगर बीजेपी ने भी तो हमेशा धर्म के नाम पर राजनीति की है. वह भारत को हिंदुस्तान कहते हैं. लेकिन भारत में सभी धर्म के लोग रहते हैं. आप यह नहीं कह सकते है की वह सिर्फ़ हिंदुओं के लिए ही है. ऐसे में तो आप लोकशाही की हत्या कर रहे हो."

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Image caption फ़ेसबुक ब्लॉगर कवितो केरा

फ़ेसबुक ब्लॉगर कवितो केरा कहते हैं, "किसी संस्था को मुझे यह बताने का अधिकार नहीं है कि मैं किसे वोट दूँ या किसे ना दूँ. मगर धर्मनिरपेक्षता से किसी को भी समझौता नहीं करना चाहिए, फिर वह मोदी ही क्यों न हो. मगर धर्म के नाम पर कोई मुझे यह भी ना बताए कि मैं किसे वोट ना दूँ."

नगालैंड में चुनाव का प्रचार अब समाप्त हो गया है.

मतदान के बाद जब 3 मार्च को नतीजे सामने आएंगे तभी पता चलेगा की चर्च के इस खत की राजनीतिक कीमत क्या और कितनी रही.

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