जिसकी मुर्दहिया ने देश को झकझोरा वो 'पत्नी' को कैसे भूल गया

  • 8 मार्च 2018
प्रोफेसर ​तुलसीराम, मुर्दहिया, दलित चिंतन, दलित लेखक, दलित लेखन इमेज कॉपीरइट Bharat Janmat
Image caption दलित चिंतक और लेखक तुलसीराम के निधन के तीन साल बाद राधा देवी का दावा, वो उनकी पहली पत्नी थीं

एक वीडियो सामने आया है जिससे प्रख्यात दलित चिंतक प्रोफ़ेसर तुलसीराम की पहली पत्नी का पता चला है, प्रोफ़ेसर तुलसीराम के निधन के तीन साल बाद ये सच सामने आया है.

आजमगढ़ की ये महिला राधादेवी बता रही हैं कि उनका दो साल की उम्र में तुलसीराम के साथ बालविवाह हुआ था. उनके परिवार वालों ने तुलसीराम की पढ़ाई में सहायता की और इसके लिए उनके गहने बेचे गए लेकिन तुलसीराम ने अपनी मशहूर आत्मकथा "मुर्दहिया" में इस महिला का ज़िक्र तक नहीं किया जिसने बहुत उत्पीड़न झेला है.

हालाँकि लेखक के निजी जीवन और उसके लेखन को जोड़कर देखना ही अपने आप में अच्छी ख़ासी बहस का विषय है लेकिन ये मामला इसलिए ख़ास है क्योंकि कुछ युवा मांग कर रहे हैं कि राधादेवी को तुलसीराम की किताब की रॉयल्टी और संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए.

तीन साल पहले, जेएनयू में प्रोफ़ेसर रहे प्रोफ़ेसर तुलसीराम के निधन पर मैंने लिखा था- "उनकी तुलना में जेएनयू के ज़्यादातर प्रोफ़ेसर प्लास्टिक के ज्ञानी लगते हैं."

उनकी आत्मकथा में उस धातु की महीन झनकार सुनाई देती है जिसके बूते भुखमरी, जातीय प्रताड़ना का शिकार, डेढ़ आंख वाला चेचक पीड़ित एक दलित लड़का घर से भागकर, एक आश्चर्य की तरह प्रोफ़ेसरों की दुनिया में चला आया था.

इमेज कॉपीरइट Bharat Janmat
Image caption दलित चिंतक और लेखक तुलसीराम का आजमगढ़ स्थित घर

मुर्दहिया

अब मुझे अपनी राय कुछ बदलनी पड़ रही है क्योंकि प्रोफ़ेसर तुलसीराम की ज़िंदगी का सच बदल गया है. वह वैसा नहीं रहा जैसा उन्होंने अपनी आत्मकथा 'मुर्दहिया' में बयान किया है.

आजमगढ़ के धर्मपुर गांव की ही तरह खुद तुलसीराम के भीतर भी एक 'मुर्दहिया' थी जिसमें उन्होंने अपनी पहली पत्नी राधादेवी को जीते जी दफ़न कर दिया था. मुर्दहिया, गांव के बाहर एक जंगल हुआ करता था जिसमें दलितों के मुर्दे और मृत पशु दफ़न किए जाते थे, यही मुर्दहिया तुलसीराम के उत्पीड़ित और अभिशप्त जीवन का एक सटीक रूपक बनाता है.

तुलसीराम के चाहने वाले कुछ युवाओं की कोशिश से तुलसीराम की मृत्यु के तीन साल बाद राधादेवी सामने आई हैं. वह बता रही हैं कि तुलसीराम के साथ उनका बालविवाह हुआ था. घर वाले चाहते थे कि वे भी अपने पिता की तरह मज़दूरी करें, लेकिन उन्हें यह मंजूर नहीं था.

पढ़ाई के लिए तुलसीराम ने उनके गहने बेचे, उनके मायके से पैसों और अनाज की मदद ली, लेकिन बाद में उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया. उन्होंने कभी राधादेवी को पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया, न उनका किसी रूप में अपनी किताब में ज़िक्र किया जो हिंदी में सबसे ज़्यादा इज़्ज़त पाने वाली दलित-आत्मकथा है.

तुलसीराम ने जेएनयू में प्रोफ़ेसर होने के बाद दूसरी शादी कर ली थी. उनकी दूसरी पत्नी और बेटी दिल्ली में रहती हैं जिन्हें उनकी मृत्यु के बाद ही पहले विवाह का पता चल पाया.

तुलसीराम की दूसरी पत्नी को सामने लाने वाले युवा मांग कर रहे हैं कि तुलसीराम की पेंशन का एक हिस्सा बेहद ग़रीबी में रह रही, बेसहारा राधादेवी को दिया जाना चाहिए.

इमेज कॉपीरइट FACEBOOK PROFILE TULSIRAM

पत्नी का जिक्र क्यों नहीं?

इस विवाद में एक तबका कह रहा है कि इस बाल विवाह में तुलसीराम की कोई भूमिका नहीं थी जो उन पर बचपन में थोप दिया गया था. बड़े होने पर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया. अपने घर वालों से संबंध खत्म कर लिए और बाकी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जिए इसलिए पहली पत्नी का ज़िक्र करना, न करना ख़ास मायने नहीं रखता है. जो लोग पहली पत्नी का मसला उठा रहे हैं वे उन लोगों के हाथ में खेल रहे हैं जो तुलसीराम के कृतित्व और प्रेरक व्यक्तित्व पर पानी फेर देना चाहते हैं.

जो भी हो तुलसीराम ने जान-बूझकर राधादेवी को दफ़न किया, अपने विवाह का ज़िक्र आत्मकथा में नहीं आने दिया और दूसरी पत्नी से भी छिपाकर रखा. उन्होंने अपने समय की बहुत सी सामाजिक कुरीतियों और उनसे बर्बाद हुई ज़िंदगियों के बारे में आत्मकथा में लिखा है. वे चाहते तो बालविवाह की कुरीति के विरोध के साथ भी अपनी असहाय स्थिति का ज़िक्र करते हुए राधादेवी के दुर्भाग्य के बारे में लिख सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

यह वाक़या बताता है कि अंतरराष्ट्रीय बौद्ध आंदोलन, दलित राजनीति और साहित्य के विशेषज्ञ तुलसीराम ने लेखक के तौर पर पूरी ईमानदारी नहीं बरती. उन्होंने आत्मकथा में उन सदाशय सवर्ण पुरूषों का ज़िक्र तो किया जिन्होंने उन्हें कभी खाना खिलाया, उनकी फ़ीस भरी और विपरीत परिस्थितियों में टिके रहने का हौसला दिया, लेकिन अपनी पत्नी को भुला दिया.

राधादेवी भी उन्हीं परिस्थितियों की शिकार हुईं जिनके शिकार वे खुद थे. वे अपने विरोध के साथ अपने बालविवाह और पढ़ाई में मददगार पहली पत्नी को आत्मकथा में जगह देते तो वे और बड़े व्यक्तित्व के रूप में सामने आते.

आत्मकथा लेखक की सुविधा का मामला नहीं होता कि किस घटना का जिक्र किया जाए और किसे गोल कर दिया जाए. वहां आत्मनिरीक्षण करते हुए अपने जीवन का स्याह-सफेद सामने रखना होता है. उम्मीद की जाती है कि लिखने वाला अपनी ज़िंदगी की सच्ची और विश्वसनीय तस्वीर पेश करेगा ताकि पढ़ने वाले उससे सीख ले सकें.

विश्व साहित्य में एक विधा के तौर आत्मकथा लेखन की शुरुआत चौथी शताब्दी में संत आगस्तीन के 'कनफ़ेशन्स' से मानी जाती है. बाद में दास प्रथा के अनुभव लिखने वाले गुलामों ने इसे समृद्ध किया जो भारत में दलित आत्मकथाओं की प्रेरणा साबित हुईं.

औरत, दलितों में भी दलित

इस बात पर ध्यान जाए बगैर नहीं रहता कि हिंदी के दस से अधिक बुज़ुर्ग लेखकों की दो-दो पत्नियां हैं और वे इसे छिपाते हैं. इस भाषा की अधिकतर आत्मकथाएं बेईमान हैं, खासकर लेखकीय छवि के प्रचार के लिए लिखी गई हैं यही वजह है कि उन्हें पाठक नहीं मिलते.

शिक्षा, राजनीतिक आंदोलन और मार्क्स-बुद्ध-आंबेडकर के प्रभाव में ख़ुद तुलसीराम की ज़िंदगी तो पूरी तरह बदल गई, लेकिन औरत के प्रति उनका नजरिया शायद नहीं बदला. उन्हें विवाह के बावजूद पत्नी की तरह कभी न स्वीकार की गई, गांव में हर तरह से उपेक्षित रहीं राधादेवी का दुख और संघर्ष अपनी करिश्माई कामयाबी में बदनुमे दाग़ की तरह लगता रहा होगा जो दूसरे वैवाहिक संबंध में बाधा बन सकता था, इसलिए उन्होंने चुप्पी साध ली.

इमेज कॉपीरइट Bharat Janmat

तुलसीराम अकेले नहीं हैं. बहुतेरे दलित लेखकों, चिंतकों, राजनेताओं, व्यापारियों में यह प्रवृत्ति वैसी ही दिखाई देती है जैसी दूसरी जातियों में है. दो साल पहले क्रांतिकारी मराठी कवि और दलित पैंथर्स के संस्थापक नामदेव ढासाल की पत्नी मल्लिका अमरशेख की आत्मकथा 'आय वान्ट टू डिस्ट्रॉय माइसेल्फ़' आई जो पति से मिली पिटाई, यौन रोगों और उपेक्षा का एक क्रुद्ध आख्यान है.

इस विवाद के बावजूद तुलसीराम की आत्मकथा इस मायने में विशिष्ट है कि वह अन्य दलित आत्मकथाओं की तरह सिर्फ़ सहानुभूति पाने के लिए अत्याचार की शिकायत नहीं करती. वह दिखाती है कि दलितों की भी प्रतिरोध की अपनी परंपरा है और हथियार हैं. उसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश की ऐसी औरतें दिखाई देती हैं जो मृत पशुओं की हड्डियों से बनी तलवारों और जचगी के कचरे वाली हंडिया लेकर लड़ती हैं और अपवित्र होने के डर से ब्राह्मण-जमींदार भागते हैं.

राधादेवी को मूर्तिभंजक खलनायिका की तरह देखने के बजाय इस तरह देखा जाना चाहिए कि उन्होंने तुलसीराम की अधूरी आत्मकथा को पूरा किया है और इस तथ्य को सामने रखा है कि औरत, दलितों में भी दलित है. उन्होंने उम्मीद जगाई है कि दलित जीवन की असली आत्मकथाएं आने वाले दिनों में दलित औरतें लिखेंगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे