नज़रिया: येदियुरप्पा पर मार्गदर्शक मंडल का बाण क्यों नहीं चला पाई बीजेपी

  • 28 फरवरी 2018
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ऐसा लग रहा है कि भारतीय जनता पार्टी अब अपने 75 साल की आयु वाले नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में भेजने वाली नीति को छोड़ने वाली है.

वो इसलिए क्योंकि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोहराया कि बी एस येदियुरप्पा ही कर्नाटक में पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे.

येदियुरप्पा भाजपा के लिए क्यों ज़रूरी?

मोदी पिछले तीन हफ़्तों में तीसरी बार कर्नाटक गए थे जहां उन्होंने एक किसान रैली में हिस्सा लिया और येदियुरप्पा के 75वें जन्मदिन पर उन्हें बधाई दी.

मोदी ने येदियुरप्पा को 'रैथा बंधु' यानि किसान बंधु कहा जो किसानों के लिए खुशहाली ला सकता है और युवाओं की उम्मीदों को पूरा कर सकता है.

उन्होंने कहा, "येदियुरप्पा के नेतृत्व में हमें कर्नाटक को ऊंचाइयों पर ले जाने का मौका दें".

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येदियुरप्पा दक्षिण भारत के पहले भाजपा नेता थे जो 2008 में मुख्यमंत्री बने. तीन साल बाद ही भ्रष्टाचार के आरोपों में उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा.

इसके बाद उन्होंने अपनी स्थानीय पार्टी बना ली और 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के वोट बैंक को काफ़ी नुकसान पहुंचाया था. लेकिन 2014 लोकसभा चुनावों से ठीक पहले नरेंद्र मोदी उन्हें पार्टी में वापस ले आए.

दो साल पहले भाजपा ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया और पिछले साल भी इस बात को दोहराया.

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भाजपा के लिए अब फ़ैसले से हटना मुश्किल

कर्नाटक भाजपा के प्रवक्ता सुरेश कुमार ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मार्गदर्शक मंडल में भेजने का कोई विशेष पैमाना नहीं है. ये ग़लतफ़हमी है कि जो कोई 75 साल को हो जाए तो उसे मार्गदर्शक मंडल भेज दिया जाएगा."

उन्होंने बताया, "येदियुरप्पा एक जननेता हैं और पूरे राज्य में लोकप्रिय हैं. वो पार्टी के लिए ज़रूरी हैं. ये येदियुरप्पा के कद को छोटा करना होगा अगर उन्हें सिर्फ लिंगायत समुदाय का नेता कहा जाए."

येदियुरप्पा कर्नाटक लिंगायत समुदाय से आते है जो पूरे प्रदेश में एक अगड़ी जाति मानी जाती है और उत्तर कर्नाटक में तो एक प्रभावशाली वोट बैंक है. कर्नाटक की कुल 224 विधानसभा सीटों में से 105 सीटें इसी क्षेत्र में हैं.

जैन विश्वविद्यालय के उप-कुलपति और राजनीति विशेषज्ञ डॉ. संदीप शास्त्री कहते हैं, "भाजपा की दिक्कत ये है कि उसने दो साल पहले येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया और अब वो फंस गई है. वो चाहे भी तो अपना फ़ैसला वापस नहीं ले सकती."

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'मार्गदर्शक मंडल प्रति़द्वंद्वियों के लिए'

तो क्या ये मार्गदर्शक मंडल का विचार भाजपा की देन है?

इस पर डॉ. शास्त्री कहते हैं, "मार्गदर्शक मंडल तो उनके लिए था जो प्रधानमंत्री के प्रतिद्वंद्वी थे. राज्यों में तो इसे इतना लागू किया भी नहीं किया गया सिवाय बी सी खंडूरी के जिन्हें 75 साल की उम्र हो जाने की वजह से मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं बनाया गया था. लेकिन आज इन हालात में येदियुरप्पा को बदलना पार्टी के लिए नुक़सानदेह होगा."

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वहीं कांग्रेस पार्टी तो 1990 से ही लिंगायत समुदाय की नाराज़गी झेल रही है जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने उनके नेता वीरेंद्र पाटिल को मुख्यमंत्री पद से हटाया था.

कांग्रेस के उपाध्यक्ष बी एल शंकर कहते हैं, "भाजपा अपनी सुविधा से फ़ैसला करती है. दिल्ली में कुछ नेताओं को रास्ते से हटाना था तो अपनी सुविधा से कर लिया. अब कर्नाटक में उन्हें येदियुरप्पा चाहिए क्योंकि उनके बाद कोई नेता उनके पास नहीं है तो यहां भी सुविधा है. वो येदियुरप्पा के लिंगायत समुदाय से होने का भी फ़ायदा उठाना चाहते हैं. सत्ता के लिए अपने उसूलों से समझौता कर रहे हैं."

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