जब केपीएस गिल की हीरोइन बनने को तैयार थीं श्रीदेवी

  • 28 फरवरी 2018
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"मैं पहले पंजाब आने से डरती थी लेकिन यहां आकर मेरा सारा डर निकल गया है."

"अगर केपीएस गिल नायक की भूमिका निभाएं तो मैं उनकी नायिका की भूमिका निभाने को तैयार हूं."

दिवंगत श्रीदेवी के ये बयान मार्च 1993 में पंजाब के अख़बारों में छपे थे.

यह ख़बर अजीत अखबार में सुर्खी थी, "गिल को आख़िर सपनों की रानी मिल ही गई."

उस समय इस सुर्ख़ी के कई मायने निकाले गए थे. 1 अप्रैल, 1993 को इंडियन एक्सप्रेस में शोभा डे ने कटाक्ष किया था कि श्रीदेवी के केपीएस गिल की फ़िल्म में नायिका बनने की ख़बर किसी विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसी की साज़िश नहीं तो और क्या है.

शूटिंग के लिए चंडीगढ आई थीं श्रीदेवी

अपनी मौत से तकरीबन 26 साल पहले श्रीदेवी पंजाब पुलिस द्वारा चरमपंथ के ख़िलाफ़ चलाए गए अभियान का चेहरा बनी थीं.

अहम चरमपंथी संगठनों पर निर्णायक जीत के बाद पंजाब पुलिस गायकी और नाटकों की प्रस्तुतियों के माध्यम से जीत का एलान कर रही थी.

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पंजाब में शांति बहाल होने के बाद लोगों को इस बात का अहसास कराने के लिए पंजाब पुलिस की सरपरस्ती में गायकी के अखाड़े लग रहे थे.

श्रीदेवी चंडीगढ़ में सावन कुमार की फ़िल्म 'चांद का टुकड़ा की शूटिंग के लिए आई थीं और इस फ़िल्म में अहम किरदार सलमान खान, शत्रुघ्न सिन्हा और अनुपम खेर ने निभाए थे.

ऊपर जिन बयानों का ज़िक्र है, श्रीदेवी वे बयान चंडीगढ़ में पंजाब पुलिस के तत्कालीन डीजीपी केपीएस गिल की मेहमान नवाज़ी में चुनिंदा पत्रकारों के सवालों के जवाब में दिए थे.

चरमपंथी भी देखते थे श्रीदेवी की फिल्में

चंडीगढ़ में ही है केंद्रीय जेल बुड़ैल. इस जेल में कैद खाड़कू (चरमपंथी) श्रीदेवी की फ़िल्में देखा करते थे.

पंजाब संकट की खूनी लड़ाई के दौरान दोनों पक्षों में श्रीदेवी के कद्रदान मौजूद थे.

साल 1987 से 1990 तक जेल में बंद रहे ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट फ़ेडेरेशन के कार्यकर्ता सुरेंद्र सिंह कृष्णपुरा को श्रीदेवी की मौत की ख़बर उनके बेटे ने सुनाई.

कृष्णपुरा के मुंह से अचानक निकला, "श्रीदेवी नहीं मर सकती." कृष्णपुरा को याद आया कि उन्होंने बुड़ैल जेल में वीसीआर पर श्रीदेवी की फिल्म 'रूप की रानी चोरों को राजा' देखी थी.

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अहम खाड़कुओं को मारने या गिरफ़्तार करने के बाद पंजाब पुलिस ऑपरेशन 'हीलिंग टच' शुरू किया था.

केपीएस की छवि

उन दिनों में केपीएस गिल की तीन तरह की तस्वीरें अख़बारों में छपती थीं.

एक उनकी पंजाब में पुलिसकर्मियों का पुरस्कृत करते या फिर खाड़कुओं के पीड़ितों को मुआवज़ा देते हुए.

दूसरी- खुली जीप में मार्च पास्ट की सलामी लेने की तस्वीरें होती थीं और तीसरी पंजाब से बाहर कहीं सम्मान लेने की.

इसके अलावा खाड़कुओं के हथियार डालने या हथियारों की खेप पकड़े जाने की ख़बरों के साथ भी उनकी तस्वीरें होती थी.

इस तरह के माहौल में श्रीदेवी के साथ केपीएस गिल की तस्वीर छपना भी बाकी तस्वीरों जैसा ही था. मगर सारी तस्वीरों के नायक केपीएस गिल होते थे, लेकिन इसमें नायिका भी थी.

टाइम्स ऑफ इंडिया ने 8 मार्च 1993 को लिखा था, "उन (केपीएस गिल) के 'कारनामे' और उन (श्रीदेवी) की अदाकारी ने उन्हें एक-दूसरे का प्रशंसक बना दिया है."

इस ख़बर में 'एनकाउंटर' शब्द एक तरफ़ उन दोनों की मुलाक़ात की बात बताता है तो दूसरी तरफ़ पुलिस के साथ मुठभेड़ की याद करवाता था.

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यही खेल पंजाबी ट्रिब्यून ने 7 मार्च के अख़बार में 'मुठभेड़' शब्द के साथ खेला था.

इस तरह पुलिस केपीएस गिल को नायक बना रही थी.

श्रीदेवी का अदाकारा के तौर पर लोगों के दिमाग़ में नायिका का छवि बनी हुई थी. 

इस नायिका के साथ बैठे केपीएस गिल की नायक वाली छवि उभारने में श्रीदेवी के बयानों की अहम भूमिका रही.

जब केपीएस गिल कहते कि उन्होंने श्रीदेवी की फ़िल्में 20-20 बार देखी हैं तो उनकी एक कठोर पुलिस अफ़सर वाली छवि भी नरम हो जाती है.

साल 2004 से 2007 तक डीजीपी के पद पर तैनात रहे जी. एस. औजला ने तत्कालीन माहौल के बारे में बीबीसी को बताया, "उस वक़्त लोगों का भरोसा हासिल करने और माहौल में तब्दीली का संदेश भरने के लिए पुलिस ने बहुत सारे कलाकारों को अपने साथ जोड़ा और उनकी प्रस्तुतियों से लोगों का मनोरंजन किया."

जी.एस. औजला को पुलिस की इस कार्रवाई में शामिल होने वाले कई गायकों के नाम याद हैं पर वह श्रीदेवी के बारे में कहते हैं, "मुझे श्रीदेवी के बारे में याद नहीं है लेकिन पुलिस ने कलाकारों के माध्यम से शांति कायम हो जाने का संदेश देने की मुहिम ज़रूर चलाई थी."

राजनीति शास्त्र के कॉलेज अध्यापक डॉक्टर तगिंद्र इस तस्वीर की नब्ज़ इस तरह पकड़ते हैं,"भले ही श्रीदेवी उस वक़्त रस्मी तौर पर पुलिस की मुहिम का हिस्सा न हों लेकिन अख़बार की ख़बर और तस्वीर पुलिस की सांस्कृतिक मुहिम के चौखटे में पूरी उतरती थी."

'श्रीदेवी राष्ट्रवादी कलाकार'

पंजाबी कवि गुरभजन गिल गुरुनानक स्टेडियम के समागम में दर्शक के तौर पर मौजूद थे. इस कार्यक्रम के सरपरस्त केपीएस गिल थे और मुख्य मेहमान तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह थे. कलाकार थीं- श्रीदेवी.

गुरभजन गिल ने बीबीसी को बताया,"श्रीदेवी ने साधारण से शब्दों में पंजाब में शांति कायम होने का स्वागत किया था और लोगों से मिलजुलकर रहने की विनती की थी."

उस कार्यक्रम के प्रबंधकों में कांग्रेस के कार्यकर्ता अमरजीत सिंह टिक्का शामिल थे. वह कहते हैं, "श्रीदेवी राष्ट्रवादी कलाकार थीं और वह ख़तरा मोल लेते हुए लुधियाना आईं थीं. "

इंडिया टुडे के पत्रकार रमेश विनायक ने 31 मई, 1993 के अपने लेख में बंदूकों की जगह तुंबी बजने का ज़िक्र इस तरह से किया है, "राज्य सरकार ने समझ लिया है कि सरकारी कार्यक्रमों में लोगों को बुलाने के लिए लोक कलाएं ख़ासा आकर्षण रखती हैं. कुछ महीने पहले सरकार की ओर से लगाए गए प्रसिद्ध गायकों के अखाड़े यह संदेश देने में कामयाब रहे थे कि अब हालात बदल गए हैं."

इस लेख में सांस्कृतिक मामलों के तत्कालीन निदेशक जे.एस. बीर का बयान दर्ज है, "इन अखाड़ों से लोगों के रवैये और खाड़कू लहर के हालात का अंदाज़ा होता है."

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सरकार और बाग़ियों के बीच श्रीदेवी

सुरेंद्र सिंह कृष्णपुरा श्रीदेवी को लेकर अपने साथियों और केपीएस गिल के झुकाव को अलग बताते हुए कहते हैं, "सिंहों को श्रीदेवी की कलाकारी पसंद थी पर केपीएस गिल का स्वभाव कुछ और तरह का था..."

कृष्णपुरा इसके बाद कयासों को जगह देते हुए चुप्पी धारण कर लेते हैं.

फिर वह अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहते हैं,"वह हमारी बुलंदी का समय था और अब माहौल बदल गया है."

सत्ता और बाग़ियों के बीच श्रीदेवी का होना पंजाब तक सीमित नहीं रहा.

जब पाकिस्तान में फ़ौजी तानाशाह ज़िया-उल-हक़ ने भारतीय फ़िल्मों को देखना ग़ैर-कानूनी घोषित किया तब कराची के छात्र होस्टलों में बग़ावत की निशानी के तौर पर श्रीदेवी की तस्वीरें लगाते थे और खिड़कियां खोलकर उनकी फिल्में देखते थे.

शायद इसीलिए श्रीदेवी की मौत का शोक सरहदों से छलक पड़ा है. वुसअतुल्लाह ख़ान की रचना शायद यही बताती है कि श्रीदेवी के 'रूप की रानी...' होने के बारे में कोई बहस नहीं है पर 'चोरों के राजा' के अर्थ, समय और स्थान के साथ बदलते रहेंगे.

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