जब मोरारजी देसाई कनाडा के नाइट क्लब गए

  • 1 मार्च 2018
मोरारजी देसाई
Image caption मोरारजी देसाई पहले ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे

कई साल पहले नेहरू के सचिव एम.ओ. मथाई अपने एक मित्र के साथ कुतुब मीनार घूमने गए.

मित्र ने उत्सुकतावश उनसे पूछा कि मोरारजी देसाई किस तरह के शख़्स हैं? मथाई का जवाब था, "ये जो आप सामने लोहे का खंबा देख रहे हैं. उसे बस गांधी टोपी पहना दीजिए, मोरारजी देसाई आप के सामने होंगे... शरीर और दिमाग़... दोनों से बिल्कुल सीधे, खरे और कड़े."

नेहरू ने एक बार मथाई से कहा था कि भारतीय राजनीति में जिन दो सबसे खरे लोगों से उनका वास्ता पड़ा था, वो थे पुरुषोत्तमदास टंडन और मोरारजी देसाई.

1977 से 1979 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे मोरारजी देसाई के बारे में मशहूर था कि वो सख़्त किस्म के गांधीवादी और दीवानगी की हद तक ईमानदार थे.

एक बार जब उन पर दक्षिणपंथी यानि राइटिस्ट होने का आरोप लगा तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा था, "हां मैं राइटिस्ट हूं क्योंकि आई बिलीव इन डुइंग थिंग्स राइट."

'कसम ली थी कि सदन में मुख्यमंत्री बनकर ही लौटूंगी'

बुरी तरह जल जाने के बावजूद कराहे नहीं थे नेताजी

भारत में राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी होना बहुत अच्छा नहीं माना जाता है, कम से कम सार्वजनिक रूप से तो हरगिज़ नहीं. लेकिन मोरारजी भाई ने प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को कभी नहीं छिपाया.

नेहरू के निधन के बाद मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर लाल बहादुर शास्त्री का संदेश लेकर मोरारजी देसाई के पास गए कि 'अगर वो जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी में से किसी एक नाम पर सहमत हो जाते हैं, तो मैं प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं लड़ूंगा.'

जब नैयर ने शास्त्री का संदेश मोरारजी देसाई को दिया, तो उन्होंने छूटते ही कहा, "जयप्रकाश नारायण? वो तो संभ्रमित व्यक्ति हैं...और इंदिरा गांधी? दैट चिट ऑफ़ ए गर्ल."

मोरारजी के बेटे कांति देसाई ने नैयर से कहा, "अपने शास्त्री जी से कहिए कि बैठ जाएं. मोरारजी देसाई को वो हरा नहीं पाएंगे."

Image caption कुलदीप नैयर के साथ बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल

कुलदीप नैयर ने आते ही यूएनआई टिकर पर कहानी की जिसका शीर्षक था, "मोरारजी ने सबसे पहले अपनी टोपी रिंग में फेंकी."

इस कहानी का असर ये हुआ कि अगले दिन संसद भवन में कामराज ने कुलदीप नैयर के कान में फुसफुसा कर कहा, "थैंक यू."

शास्त्री ने भी उन्हें फ़ौरन बुलाकर कहा, "अब कोई कहानी लिखने की ज़रूरत नहीं. मुकाबला ख़त्म हो चुका है."

मोरारजी देसाई ने इसके लिए कुलदीप नैयर को कभी माफ़ नहीं किया.

उन्होंने समझाने की कोशिश की कि इसके लिए उन्हें अपने समर्थकों को दोष देना चाहिए जो नेहरू की अंत्येष्टि के दिन ही लोगों से कहते फिर रहे थे कि प्रधानमंत्री पद उनकी जेब में है.

मोरारजी देसाई की प्रधानमंत्री बनने की इस खुलेआम चाहत ने माहौल उनके ख़िलाफ़ कर दिया और लालबहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री बनाए गए.

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Image caption एक सवाल पर इंदिरा ने मोरारजी का भविष्य तय कर दिया था.

इंदिरा ने वित्त मंत्री पद से बर्ख़ास्त किया

शास्त्री के देहांत के बाद भी उन्होंने प्रधानमंत्री बनने की कोशिश की, लेकिन उन्हें पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाया. इंदिरा गांधी ने उन्हें उप-प्रधानमत्री और वित्त मंत्री की ज़िम्मेदारी सौंपी.

लेकिन जल्द ही दोनों के बीच मतभेद शुरू हो गए. इंदर मल्होत्रा बताते थे कि इसकी शुरुआत तब हुई, जब राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में एक मुख्यमंत्री ने इंदिरा गांधी से एक सवाल पूछा.

इंदिरा गांधी उस सवाल का जवाब दे ही रही थीं कि मोरारजी देसाई ने उन्हें टोकते हुए कहा कि, "मैं इस सवाल का जवाब बेहतर ढंग से दे सकता हूं. पीएन हक्सर ने बाद में मुझे बताया कि उसी दिन इंदिरा गांधी ने तय कर लिया था कि मोरारजी उनके मंत्रिमंडल में नहीं रहेंगे."

बाद में कांग्रेस के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार, बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स के मुद्दे पर इंदिरा गांधी से उनका टकराव इस हद तक बढ़ा कि इंदिरा ने उनसे वित्त मंत्रालय ले लेने का फ़ैसला किया.

मोरारजी देसाई ने इंदिरा गांधी को पत्र लिख कर कहा कि वो उप-प्रधानमंत्री के पद पर भी नहीं रहना चाहेंगे.

Image caption जयप्रकाश नारायण

प्रधानमंत्री बनाने में जेपी की भूमिका

1977 में जब इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं और जनता पार्टी सत्ता में आई तो मोरारजी देसाई को भारत का चौथा प्रधानमंत्री बनाया गया और उसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई आचार्य कृपलानी और जयप्रकाश नारायण ने.

कुलदीप नैयर कहते हैं कि, "जनता पार्टी में जगजीवन राम का समर्थन अधिक था, लेकिन जेपी ने मुझसे खुद बताया कि चूंकि जगजीवन राम ने संसद में आपातकाल का प्रस्ताव पेश किया था, इसलिए उनके प्रधानमंत्री बनने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था."

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अपना मूत्र पीने की आदत

मोरारजी देसाई ने दीवानगी की हद तक शराबबंदी का समर्थन किया. उनकी अपना मूत्र पीने की वकालत भी अधिकतर भारतीयों के गले नहीं उतरी.

1978 में जब मोरारजी देसाई फ़्रांस की सरकारी यात्री पर गए तो वो वहां भारतीय राजदूत आर.डी. साठे के घर ठहरे.

भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के पूर्व अधिकारी बी. रमन अपनी किताब 'काऊ ब्वॉएज़ ऑफ़ रॉ' में लिखते हैं कि जब प्रधानमंत्री देसाई वापस दिल्ली चले गए तो वो साठे साहब के घर गए.

जब उनका नौकर ड्रिंक्स सर्व कर रहा था तो राजदूत की पत्नी ने उससे कहा, "तुम नए गिलास इस्तेमाल कर रहे हो न."

फिर वो मेरी तरफ मुड़कर बोलीं कि, "मुझे पता नहीं कि मोरारजी अपना मूत्र पीने के लिए कौन-सा गिलास इस्तेमाल कर रहे थे. इसलिए मैंने सभी पुराने गिलासों को फिंकवा दिया है."

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Image caption उप-प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान मोरारजी देसाई अपने कार्यालय में.

जब मोरारजी देसाई नाइट क्लब गए

इसी तरह का एक मज़ेदार किस्सा 1968 में हुआ जब मोरारजी देसाई वित्त मंत्री के रूप में एक सम्मेलन में भाग लेने कनाडा गए.

उनके साथ मशहूर अर्थशास्त्री लक्ष्मीकांत झा भी थे, जिन्हें वो काफ़ी पसंद करते थे. उस समय आईसीएस अधिकारी वैंकटाचार कनाडा में भारत के उच्चायुक्त थे.

जॉर्ज वर्गीज़ अपनी आत्मकथा 'फ़र्स्ट ड्राफ़्ट' में लिखते हैं, "एक दिन काम जल्दी ख़त्म हो जाने के बाद झा और वैंकटाचार ने मोरारजी देसाई को मनाया कि वो एक नाइट क्लब चलें."

देसाई ने पहले तो मुंह बनाया, लेकिन इन दोनों ने तर्क दिया कि जिन चीज़ों का आप विरोध करते रहे हैं, उनको अपनी आंखों से देख लेने और उनका अनुभव कर लेने के बाद आप बेहतर ढंग से उनका विरोध कर पाएंगे.

आख़िरकार तीनों लोग एक नाइट क्लब में पहुंचे. बैठते ही एक बारटेंडर लड़की ने मोरारजी से पूछा, "आप क्या पीना पसंद करेंगे ?"

मोरारजी ने बेरुख़ी से जवाब दिया, "मैं शराब नहीं पीता." लड़की ने मोरारजी भाई की गोद में बैठने की कोशिश करते हुए चुहल की, "सो यू वॉन्ट योर डेम टू बी सोबर." (तो आप चाहते हैं कि आपकी साथी आपके सामने सोबर रहे.)

स्तब्ध मोरारजी देसाई ने लड़की को रफ़ा-दफ़ा करते हुए कहा, "मुझे लड़कियां पसंद नहीं हैं." इस पर वो लड़की बोली, "आप सज्जन पुरुष कतई नहीं हैं."

मोरारजी देसाई ने बिना कुछ पिए नाइट क्लब से उठने का फ़ैसला किया. झा और वैंकटाचार को भी बेमन से वहां से उठना पड़ा.

Image caption नटवर सिंह के साथ रेहान फ़ज़ल

नटवर सिंह से झड़प

प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भारतीय विदेश सेवा के नटवर सिंह का तबादला ब्रिटेन से ज़ांबिया कर दिया क्योंकि किसी ने उनके कान भर दिए थे कि जिस दिन आपातकाल लगाया गया था, नटवर सिंह ने अपने घर शैम्पेन पार्टी दी थी.

1978 में ज़ांबिया के प्रधानमंत्री सरकारी यात्रा पर भारत आए. अभी तक ये परंपरा रही है कि जब भी कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भारत के दौरे पर आता है तो उस देश में भारत का राजदूत या उच्चायुक्त भी उसके साथ भारत आता है.

जब नटवर सिंह ने भारत आने की योजना बनाई तो उन्हें मना कर दिया गया. इसके बावजूद वो भारत आए. उनके इस काम को बहुत बड़ी नाफ़रमानी माना गया.

मोरारजी देसाई ने उन्हें आदेश दिया कि वो अगले दिन सुबह आठ बजे उनसे मिलने उनके निवास पर हाज़िर हों.

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Image caption मुंबई में अपने निवास पर पूरे परिवार के साथ मोरारजी देसाई

नटवर सिंह याद करते हैं, "प्रधानमंत्री ने छूटते ही कहा, आप बग़ैर बुलाए आ गए. मैंने जवाब दिया, आप ही ने तो मुझे मिलने बुलाया है. मोरारजी बोले मैं आपके भारत आने की बात कर रहा हूं. आप बग़ैर इजाज़त यहां आ गए. मैंने उन्हें पुरानी परंपरा का वास्ता दिया. थोड़ी देर देसाई चुप रहे. फिर बोले तुम उस आतंकवादी न्कोमा को क्यों इतना बढ़ावा दे रहे हो. मैंने कहा वो आतंकवादी नहीं हैं बल्कि बहुत सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी हैं. जब मैं उठने लगा तो उन्होंने मुझसे पूछा तुम कहां ठहरे हुए हो?"

"अपनी सास के यहां."

"तुम्हारी पत्नी कहां हैं?"

"नीचे कार में बैठी हुई हैं."

"उसे अंदर बुला लो."

"सर, मैं ऐसा नहीं करूंगा. मैं यहां किसी सोशल कॉल पर नहीं आया हूं."

"तुम बहस क्यों कर रहे हो. बुलाओ उसे."

मैंने अत्यंत आदर के साथ कहा कि आप मुझे सरकारी मामले में आदेश दे सकते हैं, लेकिन निजी मामलों में आपको मुझे आदेश देने का कोई हक़ नहीं है.

मोरारजी देसाई ने मुझसे निहायत ही रूख़े लहज़े में कहा, "तुम जा सकते हो."

बाद में उन्होंने मेरी सास से शिकायत की, "तुम्हारा दामाद बहुत बदतमीज़ है."

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Image caption मोरारजी देसाई, जनरल ज़ियाउल हक़ के साथ

एक पाकिस्तानी लेखक ग्रुप कैप्टन एस.एम. हाली ने 'पाकिस्तान डिफ़ेंस जर्नल' में लिखा है कि, "1977 में रॉ के एक एजेंट ने कहूता परमाणु परियोजना का ब्लू प्रिंट दस हज़ार डॉलर में भारत को बेचने की पेशकश की. जब मोरारजी देसाई को इसके बारे में बताया गया, तो उन्होंने तुरंत जनरल ज़ियाउल हक को फ़ोन कर बताया कि हमें पता है कि आप कहूता में परमाणु बम बना रहे हैं. नतीजा ये हुआ कि रॉ का वो जासूस पकड़ा गया और भारत को वो टॉप सीक्रेट ब्लू प्रिंट नहीं मिल पाया."

जनता पार्टी में टूट

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Image caption पूर्व लोकसभा अध्यक्ष रबि राय के साथ चौधरी चरण सिंह

मोरारजी देसाई का दुर्भाग्य था कि जनता पार्टी में शुरुआत से ही टूट शुरू हो गई थी. मोरारजी भाई, जगजीवन राम और चरण सिंह में पहले दिन से ही नहीं बनी.

कुलदीप नैयर कहते हैं कि, जब उन्होंने मोरारजी को सलाह दी कि वो चरण सिंह को मनाने के लिए खुद पहल करें, तो उनका जवाब था, "मैं चरण सिंह को चूरन सिंह बना दूंगा."

और तो और जब जयप्रकाश नारायण पटना में बीमार थे तो कुलदीप नैयर ने उन्हें सलाह दी कि वो उन्हें देखने वहां जाएं तो उनका जवाब था, "मैं महात्मा गांधी को कभी देखने नहीं गया तो जेपी क्या चीज़ हैं."

मोरारजी देसाई का पुत्र मोह

मोरारजी वैसे तो सार्वजनिक जीवन में उच्चतम मापदंड के पक्षधर थे, लेकिन पुत्र मोह से वो भी अछूते नहीं थे.

इंदर मल्होत्रा ने बीबीसी को बताया था कि 1977 में जीतने के बाद जब मोरारजी देसाई ने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस की तो उसमें वह भी मौजूद थे.

उन्होंने कहा कि, "मैं भारत सोवियत संधि को दोबारा देखूंगा और अगर वो भारत के हित में नहीं हुई तो उसे समाप्त कर दूंगा."

दूसरी चीज़ उन्होंने कही कि भारत की मध्यपूर्व नीति पर दोबारा नज़र दौड़ाएंगे. उसके बाद मोरारजी मॉस्को गए थे. उनके साथ उनका बेटा कांति देसाई भी गया था. वापसी में उनका जहाज़ कुछ देर के लिए तेहरान में रुका.

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Image caption इसराइली विदेश मंत्री मोशे दयान आए थे भारत

कांति देसाई हिंदुजा बंधुओं से मिलने वहीं रुक गए. इससे उस समय बहुत हंगामा हुआ.

उसके कुछ दिन बात अटल बिहारी वाजपेयी अपने घर में बैठे हुए थे. तभी मोरारजी के प्रधान सचिव का फ़ोन आया कि मोरारजी उनको अपने घर पर बुला रहे हैं. वाजपेयी जब वहां पहुंचे तो वो क्या देखते हैं कि इसराइल के विदेश मंत्री मोशे दायान वहाँ बैठे हुए हैं.

वाजपेयी ने बाद में उनसे कहा कि, "उन्हें आमंत्रित करने से पहले मुझसे तो बात कर ली होती."

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Image caption मोरारजी देसाई (बीच में लेटे हुए) और उनके बेटे कांति देसाई (सबसे दाहिने) अपने पूरे परिवार के साथ.

दिक्कत ये थी कि उनको स्वयं उनके बेटे कांति भाई आमंत्रित कर आए थे.

अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में देसाई जितने विवादास्पद रहे हों, लेकिन उन्हें भारत और पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न और निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया.

उनकी ईमानदारी और संयम को कुछ हल्कों में पसंद किया गया, लेकिन अधिकतर लोगों की नज़र में वो एक रूढ़िवादी शख़्स थे, जिनके जीवन में राजनीतिक लचीलेपन के लिए बहुत कम जगह थी.

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