जीडीपी के आंकड़े से मोदी सरकार खुश, लेकिन...

नरेंद्र मोदी

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भारत सरकार के मुताबिक साल 2017-18 की तीसरी तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था 7.2 प्रतिशत की दर से बड़ी है. ये आंकड़ा भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक संकेत है.

नोटबंदी, जीएसटी जैसे क़दमों के बाद भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर कई तरह की आशंकाएं थीं. ऐसे में 7 प्रतिशत से अधिक की विकास दर का ये आंकड़ा क्या अर्थव्यवस्था के लिए राहत की बात है?

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर आलोक पुराणिक कहते हैं, "ये एक सकारात्मक आंकड़ा है. अर्थव्यवस्था को लेकर जो मंदी या नकारात्मक माहौल होने की आशंकाएं थी वो सच साबित नहीं हो रही हैं. लेकिन सिर्फ़ एक तिमाही के आंकड़ें को पूरे साल का आंकड़ा नहीं माना जा सकता. जनवरी, फ़रवरी और मार्च का आंकड़ा आने के बाद साल 2017-18 के लिए पूरे साल का आंकड़ा आ सकेगा जिसके बाद हम ये कहने की स्थिति में होंगी की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है. लेकिन फ़िलहाल ये तो कहा ही जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी नहीं है."

चुनौतियां मौजूद

अर्थव्यवस्था को लेकर अनिश्चितता के माहौल में क्या ये आंकड़ा भारत को राहत देगा? इस सवाल पर आलोक पुराणिक कहते हैं, "अमरीका को छोड़कर दुनिया की बाकी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेज़ी नहीं हैं. ऐसे में भारत के निर्यात पर असर पड़ सकता है. इसके अलावा इसी आंकड़ें में एक आंकड़ा ये भी है कि भारतीय कृषि क्षेत्र सिर्फ़ दो प्रतिशत से ही बढ़ा है. वहीं रोज़गार के क्षेत्र में भी तेज़ी दिखाई नहीं दे रही है. ऐसे में 7.2 प्रतिशत की जीडीपी विकास दर के बावजूद कई चुनौतियां अभी बाक़ी हैं."

सार्वजनिक बैंकिंग के क्षेत्र में कई बड़े घोटाले सामने आने के समय में सवालों का सामना कर रही भारत सरकार इन आंकड़ों को अपनी उपलब्धि बताकर भुनाने की कोशिश कर सकती है.

पुराणिक कहते हैं, "बहुत ताज्जुब की बात नहीं होगी यदि सरकार इन आंकड़ों को अख़बारों में विज्ञापन देकर प्रकाशित करवाए. वहीं विपक्ष को कृषि क्षेत्र के सिर्फ़ दो प्रतिशत से बढ़ने और जीएसटी के कारण परेशानी में आए उद्योग धंधों के सवाल को उठाना चाहिए."

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बीती तिमाही में कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में खासी तेज़ी दर्ज की गई है

वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था साल 2005 से 2008 के बीच 9 प्रतिशत तक की दर से बड़ी थी. क्या भारतीय अर्थव्यवस्था फिर से इस आंकड़ें को छू पायएगी?

आलोक पुराणिक का मानना है कि ये सवाल ही बेमानी है. वो कहते हैं, "जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था विकसित होती जाती है वैसे-वैसे उसकी विकास दर कम होती जाती है. अमरीका जैसी विकसित अर्थव्यवस्था में दो प्रतिशत की विकास दर भी बहुत बड़ी मानी जाती है. अर्थव्यवस्था का साइज़ बढ़ने से विकास दर कम होती जाती है. ये सरल सिद्धांत है."

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नोटबंदी के फ़ैसले के बाद मोदी सरकार को आर्थिक मोर्चे पर आलोचना का सामना करना पड़ा था.

पुराणिक कहते हैं, "ऐसे में अगले पांच सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था 9-10 प्रतिशत का आंकड़ा नहीं छू पाएगी. यदि हम 6 या 7 प्रतिशत की विकास दर भी नियमित रख पाए तो ये भी भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी. हम अपने जीवनकाल में ही देख लेंगे कि पांच प्रतिशत की विकास दर भी बहुत बड़ी मानी जाएगी."

बीती तिमाही (अक्तूबर से दिसंबर 2017 ) में 7.2 की विकास दर के इस आंकड़े के साथ भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में चीन को पीछे छोड़ते हुए सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भी बन गया है. बीते साल भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट देखी गई थी.

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कृषि क्षेत्र की विकास दर बीती तिमाही में सिर्फ़ दो प्रतिशत ही रही है

अमीर और ग़रीब के बीच बढ़ती खाई

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बीती तिमाही में 7.2 की विकास दर का एक दूसरा पहलू ये भी है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सिर्फ़ 2 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई है. हाल के दिनों में भारत में ग़रीबों के और ग़रीब होने और अमीरों के और अमीर होते जाने का सवाल भी उठा है.

पुराणिक कहते हैं, "भारत में ग़रीब अमीरी की ओर कछुए की चाल से बढ़ रहा है, लेकिन अमीर और अमीर होने की ओर चीते की चाल से चल रहे हैं. ऐसे में आर्थिक विषमता बहुत अधिक है जिसे इस आंकड़े से कोई राहत मिलती नहीं दिख रही है."

अगले ही साल भारत में चुनाव भी होने हैं. अर्थव्यवस्था में सुधार के वादे के साथ सत्ता में आए नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े हुए थे. ऐसे में यदि भारतीय अर्थव्यवस्था विकास की दर बरक़रार रखती है तो इससे मोदी सरकार का आत्मविश्वास ज़रूर बढ़ेगा.

पुराणिक कहते हैं, "अर्थव्यवस्था में जो चीज़ें नकारात्मक हुईं उनकी ज़िम्मेदारी सरकार की थी. ऐसे में सकारात्मक संकेतों का श्रेय भी सरकार का ही बनता है और लोकतंत्र में तो हर चीज़ का राजनीतिक फ़ायदा उठाया जाता है. मोदी सरकार इस आंकड़ें का भी फ़ायदा उठाने की कोशिश करेगी."

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