पूर्वोत्तर में बीजेपी किन कारणों से मज़बूत हो रही है

  • 1 मार्च 2018
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पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा (18 फ़रवरी), नागालैंड और मेघालय (27 फ़रवरी) में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हुए हैं. नतीजे 3 मार्च को आने वाले हैं.

इन राज्यों में मतदान के बाद हुए सर्वेक्षणों के मुताबिक जहां त्रिपुरा की 25 साल पुरानी वामदल की सरकार को गिराने में भाजपा के सफल होने का अनुमान लगाया गया है, वहीं नगालैंड में नेफ्यू रियो की अगुवाई वाले एनडीपीपी के साथ भाजपा के गठबंधन को आगे बताया जा रहा है. जबकि तीसरे राज्य मेघालय में भी भाजपा को फ़ायदे की स्थिति में दिखाया गया है.

भाजपा पूर्वोत्तर में कमल खिलाने में जुटी है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान यहां के लोगों के बीच गए और उन्हें संबोधित किया. असम के अलावा पूर्वोत्तर के दो और राज्यों अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में भाजपा पहले से ही सत्ता में है. अभी इसी साल नवंबर में मिज़ोरम में भी विधानसभा चुनाव होंगे.

देश के 19 राज्यों में सत्ता पर काबिज भाजपा की निगाहें फिलहाल पूर्वोत्तर की 'सात-बहनों' या 'सेवन-सिस्टर्स' पर हैं. लेकिन क्या कारण है कि असम, अरुणाचल और मणिपुर के बाद अब त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में भाजपा के परचम लहराने के आसार बनते दिख रहे हैं?

बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी ने इस विषय पर पूर्वोत्तर मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक से बात की.

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Image caption त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार

पढ़ें सुबीर भौमिक का नज़रिया

आज कांग्रेस का पूरे देश में जो हाल है उससे और राहुल गांधी से हतोत्साहित होकर लोग बीजेपी की तरफ चले गए हैं. बंगाल की तरह ही त्रिपुरा में भी राजनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की नीति रही है कि कांग्रेस से भागे हुए लोगों को अपनी पार्टी में शामिल करें.

भाजपा या संघ का एजेंडा आमतौर पर राष्ट्रवादी माना जाता रहा है. कहा जाता है कि पूर्वोत्तर के लोग राष्ट्रीय मुख्य धारा से अलग थलग रहे हैं. लेकिन अब वो भाजपा के साथ जुड़ते जा रहे हैं.

लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इसमें भाजपा का कोई श्रेय नहीं है. यह राष्ट्रीय आर्थिक विकास के लिए हो रहा है. पूर्वोत्तर में जो लोग बगावत करते रहे हैं. जिनके पिता-चाचा बंदूक लेकर भारत के ख़िलाफ़ खड़े होते रहे हैं, उसी घर के नगा, मिज़ो, मणिपुरी लड़के कहां आते हैं. आज दिल्ली, मुंबई, पुणे, बंगलुरू में पूर्वोत्तर के इतने लोग रहते हैं. इनकी आबादी इतनी क्यों बढ़ गई है?

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पूर्वोत्तर तक पहुंची है भारतीय इकोनॉमी

आज हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में पूर्वोत्तर के लोग हावी हैं. इन्हीं के पिता, चाचा, बुआ जंगल में जाकर बंदूक उठाकर गोली चलाते थे. ये विकास हुआ है कि भारतीय इकोनॉमी वहां पहुंची है. दूसरी ओर भारतीय प्रजातंत्र धीरे-धीरे वहां फैला है.

स्पेशल फ़ोर्सेज़ ऐक्ट है वहां पर, लेकिन मामला उससे आगे बढ़ा है. इसके चलते वहां के लोगों को आज लगा है कि 'हम भारतीय उस तरह से नहीं है जिस तरह से मिश्रा या शर्मा हैं, लेकिन हम भारतीय इकोनॉमी की मूल धारा में नहीं आते. तो हमारे लिए विकल्प क्या है?'

अगर ये लोग चीन की तरफ़ देखते हैं तो पाते हैं कि वहां चीन ने तिब्बत के साथ जो सलूक किया है वैसा ही सलूक वो इन लोगों के साथ करेगा.

अगर ये लोग म्यांमार के साथ मिलेंगे तो वहां अल्पसंख्यकों के साथ जो सलूक किया गया वही उनके साथ होगा.

अगर ये बांग्लादेश की तरफ़ देखना चाहेंगे तो तो पर्वतीय क्षेत्र चटगांव में जिस तरह से आदिवासियों की धुलाई हुई है, वहां वो जिस तरह से अलग-थलग हुए हैं, वही हाल उनका होगा.

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Image caption त्रिपुरा में भाजपा की एक रैली में उमड़ी भीड़

नगा, मिज़ो, मणिपुरियों के पास विकल्प

तो आज सवाल ये है कि नगा, मिज़ो, मणिपुरी लोगों के पास भारत के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है.

और फिर पहले के मुकाबले अब समय बदला है. पूर्वोत्तर के लोग अब राष्ट्रीय मुख्यधारा में ज़्यादा अच्छी भागीदारी कर रहे हैं.

मैरीकॉम, शिव थापा जैसे लोग भारतीय ड्रेस में ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये बदलाव राष्ट्रीय एकीकरण का प्रतीक है.

कांग्रेस जो कभी यहां हावी थी, उसके कमज़ोर होने से भाजपा को इसका फ़ायदा मिल रहा है.

यह सोचना कि यह हिंदी, हिंदू, हिन्दुस्तान की नीति की सफलता है तो ग़लत होगा. फिर भाजपा यहां नहीं टिकेगी.

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Image caption मेघालय के फुलबरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में उमड़ा जनसमूह

भाजपा को अपनानी होगी कांग्रेस नीति

भाजपा को वही करना होगा जो कांग्रेस किया करती थी.

मनोरंजन भक्त एक बंगाली राजनेता थे. मिज़ोरम में बंगाली कुर्ता-पायजामे में उतरे तो कांग्रेस ने तुरंत उनके लिए सूट सिलवाया. बीजेपी को अपने पांव और मज़बूत करने के लिए यहां की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को भी अपने आचरण में शामिल करना होगा.

कांग्रेस के हाशिये पर आने से भाजपा फ़ायदे में है. हिंदुत्व का ढोल बजाएंगे तो यह उनके ख़िलाफ़ जाएगा. संघ और भाजपा को हिंदुत्व का कीर्तन बंद करना होगा और लोगों के दिलों तक और प्रभावी ढंग से पहुंचने के लिए और बेहतर रणनीति बनानी होगी.

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