कैसी होती थी 'अंग्रेजों के जमाने' की होली?

  • 2 मार्च 2018
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एक समय था जब अंग्रेज श्रोव मंगलवार को ईसाई होली खेला करते थे.

श्रोव मंगलवार, एश बुधवार से एक दिन पहले का मंगलवार होता है, जो अमूमन ईस्टर से 40 दिन पहले (सात सप्ताह पहले) आता है. श्रोव मंगलवार के बाद से ईस्टर तक अंग्रेज परिवारों में जश्न नहीं मनाए जाते थे, लिहाजा इसे देखते हुए दिल्ली और उसके आसपास के इलाक़ों में अंग्रेज परिवार श्रोव मंगलवार को होली का जश्न मनाते थे.

जनरल ऑक्टेलोनी और उनकी 13 बीवियां कश्मीरी गेट में उत्साह मनाते थे फिर विलियम फ़्रेजर और उनके देश के साथी (जिसमें उनके बच्चे भी होते थे) फ़ागुन के रंगों के साथ खेलते थे. उनके दोस्त कर्नल स्किनर भी ऐसा करते थे.

मुझे याद आता है कि इंडो-अर्मेनियाई अलबीना फ्रांसिस बुआ घाटगेट जयपुर से अपने करीबी लोगों और ख़ासकर अपनी बहू के साथ होली खेलने के लिए आती थीं. 1869 में अपने दादा के घर पर वह आया करती थीं.

स्टेशन से वह तांगा लेकर आती थीं और सीढ़ियां चढ़ते हुए उनका उद्देश्य साफ़ रहता था. वह चिल्लाते हुए अपनी बड़ी बहू से कहती थीं, "बहू मैं होली खेलने आई हूं." यह वह समय था जब परिवार के अधिकतर लोग जानते थे कि उपवास का समय करीब आ रहा है.

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गुलाल, चारकोल और पोटामिट्टी

होली से कई दिन पहले युवाओं के बीच लाल गुलाल इकट्ठा करने की एक होड़ सी लग जाती. लड़के 'घटिया बाज़ार' की गलियों में गुलाल के लिए दौड़-भाग करते रहते.

बाज़ार में बैठने वाला दुकानदार मोती अपने दिमाग का इस्तेमाल करता, उसे पता रहता कि होली से कई दिन पहले ही लोग गुलाल की खोज करने लगेंगे, इसलिए वह अपने बच्चों की मदद से पिछले साल के बचे रंगो को खोज लेता और उन्हें ही बेचने लगता.

अगर गुलाल कम पड़ जाता तो बड़ी ही चतुराई से घरों में चारकोल बनाया जाता. और अगर चारकोल से भी दिल न भरे तो 'पोटामिट्टी' यानि मिट्टी और पानी के कीचड़ का इस्तेमाल किया जाता.

फिर अचानक श्रोव मंगलवार की सुबह घर का कोई सदस्य गुलाल, चारकोल और पोटामिट्टी से रंगा हुआ आता तो घर आश्चर्य और हैरानी से भर जाता.

सुबह उठकर बच्चे घर का नज़ारा देखते तो रोने लगते, उन्हें समझ नहीं आता कि आख़िर घर के सभी बड़े एक दूसरे पर रंग क्यों पोत रहे हैं और जो छिपने की कोशिश कर रहे हैं उनके पीछे क्यों भाग रहे हैं.

बच्चों की उलझन उनकी मां दूर करती और उन्हें समझाती कि सभी लोग होली खेल रहे हैं. कई दफा पड़ोसी घरों में झांककर देखते कि आख़िर इतना हल्ला-गुल्ला क्यों हो रहा है.

इसाई नहीं होने की वजह से उन्हें इस उत्सव का मतलब ही समझ नहीं आता और वे अविश्वास के साथ अपना सिर हिलाते हुए वापस चले जाते.

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इलियास साहब की पत्नी 'होली बुआ'

गोल मटोल काया वाली और क्वीन विक्टोरिया जैसी दिखने वाली अलबीना बुआ अपने युवा साथियों के साथ होली के इस जश्न में मशगूल हो जातीं. उनकी बड़ी ननद सुसैन बुआ को होली की इस मस्ती में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं रहती लेकिन फिर भी वे अलबीना बुआ को अपने चेहरे पर रंग लगाने की इजाज़त दे देतीं.

लेकिन रूबी भाभी अपने देवरों की मदद से होली का पूरा जश्न मनातीं. इलियास साहब, हर होली पर अपने घर में होली मिलन समारोह रखते. ऐसे ही एक समारोह में उन्होंने अपनी होने वाली पत्नी को शादी का प्रस्ताव दिया था, उसके बाद से उनकी पत्नी को सभी 'होली बुआ' कहने लगे.

इसके बाद होली का होलियारों का पूरा हुजूम जैलर साहब सैमुएल जोसेफ के घर की तरफ निकल पड़ता. जेलर साहब अलबीना बुआ के बड़े भाई थे और उनके घर में जो मस्ती का माहौल रहता उस पर विश्वास करना ही मुश्किल होता.

बंगले के बाहर से गुजरने वाले लोग कनखयियों से भीतर देखते और कहते कि आखिर यहां चल क्या रहा है. कुछ लोग तो सोचते कि साहिब लोगों का दिमाग ही फ़िर गया है.

लेकिन होली के जश्न में मस्त इन मौजियों को किसी की फिक्र ने होती. यह मौज-मस्ती दोपहर तक चलती. एक दूसरे को रंग लगाने के लिए पकड़ना-पीछा करना इन तमाम कामों में शरीर पूरी तरह थक जाता.

परिवार के सभी लोग अब आराम की तलाश करते साथ ही शरीर पर लगे रंग को छुड़ाने के लिए नहाने का काम भी शुरू हो जाता. इसके बाद दोपहर का भोजन तो लाजवाब रहता.

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इसाई लाए होली का त्यौहार?

आज़ादी के बाद ये तमाम मौज-मस्तियां खत्म ही हो गईं. काफी अरसे पहले अलबीना बुआ गुज़र गईं. रूबी भाभी, उनके पति टिम, ननद नतालिया, देवर जेम्स और पीटर और आंटी सैबल कोई भी जीवित नहीं है. मरने वालों में जेलर साहब, उनकी पत्नी और बेटियां भी शामिल हैं.

उस वक्त जो लोग जवान थे वे अब बूढ़े हो चुके हैं और वे श्रोव मंगलवार के दिन होली नहीं खेलते, जबकि उनके बच्चों को तो मालूम तक नहीं कि कभी उनके घरों में इस दिन किस तरह का उत्सव मनाया जाता था.

हालांकि कुछ दूरदर्शियों का कहना है कि होली का त्यौहार कई साल पहले इसाईयों के साथ पश्चिम से ही आया था. ईसाई इंग्लैंड, पुर्तगाल, फ्रांस और हॉलैंड से भारत आए थे.

होली का जश्न 'मर्दीग्रास' के उत्सव जैसा ही लगता है, मर्दीग्रास का उत्सव गोवा में आज भी मनाया जाता है, वहीं ब्राज़ील में भी यह मनाया जाता है. अगर कुछ अफ़वाहों पर यकीन करें तो विलियम हॉकिंग्स और सर थॉमस रो जो जहांगीर के दरबार में ब्रिटिश दूत बनकर आए थे, उन्होंने भी इसाइयों की होली में हिस्सा लिया था.

17वीं सदी की शुरुआत में होली के दौरान हुए दंगों में आगरा के कुछ डच व्यापारियों की गांववालों ने आकस्मिक हत्या कर दी थी और उन्हें सेंट पॉल कब्रिस्तान में दफ़नाया गया. मरने वालों में व्यापारियों के प्रमुख जस्टिन ओफ्फ़ली भी थे. जस्टिन ने दंगों को रोकने की काफ़ी कोशिश की थी और उसी दौरान हुई गोलीबारी में वे मारे गए.

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Image caption 1917 में होलिका दहन में शामिल होने के लिए जाते लोग

पुतला जलाने वाली प्रथा

कहा जाता है कि बीबी जुलियाना और उनकी बहन मारिया अकबर के दरबार में होली का कार्यक्रम आयोजित करती थीं. ये दोनों ही पुर्तगाल से थीं.

इसाइयों में एक और प्रथा जो पहले देखने को मिलती थी वह थी जूडा इस्कारियोट के पुतले को जलाना. जूडा इस्कारियोट ईसा मसीह को धोखा देने वाले शिष्य थे.

यह प्रथा शाहजहां के शासनकाल में रोक दी गई क्योंकि पुर्तगालियों के साथ उनका झगड़ा हो गया था, पुर्तगालियों ने उनकी पत्नी मुमताज महल की दो नौकरानियों का अपहरण कर लिया था.

यह पुतला आगरा में अकबर के चर्च के सामने गुड फ्राइडे के दिन जलाया जाता था. हालांकि यह प्रथा तो कई साल पहले बंद हो गई लेकिन आज भी इस ऐतिहासिक चर्च के बाहर शाम के वक्त जलसा निकाला जाता है.

जलसे में शामिल लोग सूली पर लटके जीसस की बड़ी सी प्रतिमा लिए चर्च के पास घूमते हैं और फिर उस प्रतिमा को इटली से मंगवाए गए तहखाने में दफ़ना दिया जाता है.

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यह देखना भी दिलचस्प था कि बीटल्स की टीम जब ऋषिकेश में महर्षि महेश योगी के बुलाए पर उनके आश्रम गई तो उन्होंने श्रोव मंगलवार के दिन होली खेली. उस मौके पर जॉन लीनन ने यादगार के तौर पर रंग में सराबोर अपनी तस्वीर भी खींची थी.

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