कैसे बचा रहा हिंसा की आंच से गुजरात का राम-रहीम टेकरा

  • 2 मार्च 2018
राम-रहीम टेकरा

65 साल के गंदलाल सोलंकी के लिए बेहरामपुर के राम-रहीम टेकरा में हिंदू और मुस्लिमों के बीच सद्भावना सबसे अहम चीज़ है.

2002 के गोधरा दंगों की सांप्रदायिक नफ़रत की आंच कभी इस इलाके तक नहीं पहुंच पाई. 2002 में जब पूरा अहमदाबाद सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था तब राम-रहीम टेकरा में हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के साथ खड़े डट कर थे.

इस भाईचारे का श्रेय समुदाय के नेताओं को जाता है जिन्होंने दशकों से एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्ण तरीके से रहकर सांप्रदायिक सद्भावना की मिसाल पेश की है.

छोटे-छोटे घर, संकरी गलियां और साथ-साथ खड़े मंदिर-मस्जिद- अहमदाबाद का राम रहीम टेकरा करीब 9000 हिंदू और मुसलमान परिवारों का ठिकाना है.

यहां सड़कों पर दिखता है भाईचारा

अहमदाबाद में टेक्सटाइल बूम के दौरान मिल में काम करने वाले लोग यहां आकर बस गए थे. 70 के दशक की शुरुआत में साबरमती नदी के किनारे बसे इस इलाके का नाम समुदाय के नेताओं ने संगमनगर से बदलकर राम-रहीम टेकरा कर दिया था.

आलजी वड़ियारी उन लोगों में से एक थे जो सबसे पहले इस जगह पर आकर बसे थे. वो इस समुदाय के नेता थे. साल 2011 में उनका निधन हो गया था.

आलजी वड़ियारी के पोते हितेश ने बीबीसी को बताया, "राम-रहीम टेकरा को दंगा मुक्त रखने के लिए उन्हें 2008 में इंदिरा गांधी अवार्ड से नवाज़ा गया."

राम-रहीम टेकरा की मुख्य सड़क पर दखिल होते ही कोई भी यहां सांप्रदायिक सौहार्द का अनुभव कर सकता है. इन नज़ारों को आसानी से नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

दोनों समुदाय के लोग चाय की टपरियों पर साथ बैठे नज़र आते हैं, महिलाएं कतारों में राशन की दुकानों पर दिखती हैं. ऐसे ही कई दृश्य उस अहमदाबाद से अलग एक जगह का अनुभव कराते हैं जो साल 2002 के बाद से मुसलमानों के अलग इलाकों सीमित हो जाने का गवाह रहा है.

1972 से इस इलाके में रह रहे समुदाय के नेता गंदलाल सोलंकी साल 2002 में हुए दंगों को याद करते हुए बीबीसी को बताते हैं, "शहर में एक तरह का पागलपन पसरा था, लेकिन राम-रहीम टेकरा उस पागलपन का हिस्सा नहीं था. सांप्रदायिकता की आग यहां के लोगों तक नहीं पहुंच सकी."

दंगों की आग से कैसे बचा इलाका?

दो दशकों से राम-रहीम में रह रहे एक अन्य समुदायिक नेता अब्दुल रज़्ज़ाक बादामी ने बीबीसी से कहा, "हमने सबसे पहले जो काम किया वो था दोनों समुदाय के लोगों से बात करना."

सोलंकी, बादामी और समुदाय के दूसरे कई नेता इलाके में हर घर में गए और लोगों से सांप्रदायिक उन्माद के जाल में ना फंसने की अपील की.

सोलंकी बताते हैं, "अल्लाह और ईश्वर के आशीर्वाद से हमने इलाके में गश्त लगाना शुरू किया. कई प्वाइंट बनाए गए और हमने सुनिश्चित किया कि किसी भी समुदाय का कोई सदस्य गोधरा दंगों के बाद दल ना बनाए.."

हर समुदाय के पांच सदस्यों को गश्त प्वाइंट पर बैठने की जिम्मेदारी दिया गया. सोलंकी बताते हैं, "हमने सुनिश्चित किया कि बाहरी इलाके का कोई व्यक्ति हमारे यहां ना आ पाए. हमने दंगाइयों को हमारे इलाके में घुसने ही नहीं दिया."

2002 के दंगों के दौरान प्रदेश में हिंदू-मुसलमान की मिश्रित आबादी वाले लगभग सारे इलाकों में सांप्रदायिकता की आग फैल चुकी थी.

सामाजिक कार्यकर्ता मनीषी जानी बताते हैं, "कई इलाकों से हिंसा की घटनाएं होने की खबरें आ रही थी. लेकिन ये इलाका शांत था."

जानी अपने छात्रों को कई बार सांप्रदायिक सद्भावना की झलक दिखाने के लिए राम-रहीम टेकरा में लेकर गए हैं.

यहां रहने वाले ज़्यादातर मुसलमान ऑटो रिक्शा चालक हैं. जबकि कई हिंदू पास की फैक्ट्रियों में काम करते हैं. मुख्य सड़क पर बसे ज्यादातर घरों में सड़क से सटे कमरे को दुकान बना दिया गया है. मुख्य सड़क किसी रिहायशी इलाके की बजाए बाज़ार अधिक नज़र आता है.

पान की दुकान चलाने वाले मोहम्मद हुसैन हयात कहते हैं, "यहां व्यापार करने में भी किसी तरह का भेदभाव नहीं होता. मैं मुस्लिम हूं लेकिन मेरे ज्यादातर ग्राहक हिंदू ही होते हैं."

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साथ मनाते हैं त्यौहार

राम-रहीम टेकरा की पतली गलियों में घर आपस में सटे हुए हैं और हिंदू-मुसमान एक दूसरे के पड़ोसी हैं. ये लोग साथ मिलकर एक-दूसरे के त्यौहार भी मनाते हैं.

एक मुस्लिम लड़की शबनम शेख़ से हमने पूछा कि हिंदू त्यौहारों के कारण उन्हें कुछ परेशानी नहीं होती. उन्होंने कहा, "कतई नहीं, बल्कि मैं भी उनके साथ उनके त्यौहार मनाती हूं और वो हमारे साथ ईद मनाते हैं."

इलाके में राम मंदिर और मस्ज़िद एक साथ खड़े हैं. एक मुस्लिम घर के नज़दीक ही एक हनुमान मंदिर है. हनुमान मंदिर की देख-रेख एक मुसलमान महिला शबनम धोबी करती हैं. वो कहती हैं, "मैं दिन में दो बार मंदिर को साफ करती हूं. मैं अपने अल्लाह और भगवान हनुमान दोनों की इबादत करती हूं."

मोहल्ले में ज्यादातर दिहाड़ी करने वाले लोग रहते हैं. 25 साल से यहां रहने वाली सायरा शेख़ ने कहा, "धर्म के नाम पर तनाव पैदा करने का काम या तो राजनेताओं का होता है या पैसे वालों का या उन लोगों का जो पैसा बनाना चाहते हैं. जो हमारे पास है हम उससे ही खुश हैं और हम एक-दूसरे के साथ मिलकर ऐसे रहना चाहते हैं. "

वो कहती हैं कि हम पड़ोसी हैं और कई बार कचरा फेंकने जैसे छोटे-छोटे मुद्दों पर लड़ भी पड़ते हैं लेकिन ये झगड़ा ज़्यादा समय तक नहीं रहता. वो कहती हैं, "हम उसी वक्त झगड़ा सुलझा लेते हैं."

राम-रहीम टेकरा जमालपुर-खाड़िया विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है. 2017 तक इस क्षेत्र पर बीजेपी की मज़बूत पकड़ थी. लेकिन बाद में कांग्रेस के इमरान खेड़ावाला ने बीजेपी के भूषण भट्ट को हरा कर इस सीट पर जीत दर्ज की.

जनसंघ के समय से जमालपुर पर बीजेपी का दबदबा रहा है. जनसंघ आंदोलन से ही बीजेपी का जन्म हुआ है.

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कांग्रेस के मौजूदा विधायक इमरान खेड़ावाला कहते हैं कि राम-रहीम टेकरा अहमदाबाद के बाकी इलाकों से अलग है. वो कहते हैं, "मैं इसका पूरा श्रेय लिए यहां के समुदायिक नेताओं को जाता है. ये लोग सौहार्द बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं."

खेड़ावाला स्वीकार करते हैं कि यहां अलग-अलग राजनीतिक विचारों वाले लोग हैं, लेकिन वो ये भी मानते हैं इसका असर कभी इन लोगों के आपसी संबंधों पर नहीं पड़ा.

मनीषी जानी कहते हैं, "समय के साथ कई मुसलमान परिवार जुहापुर में जाकर बस गए, जिसने वो मुसलमानों की सबसे बड़ी बस्तियों में से एक बन गई है."

हालांकि वो कहते हैं कि राम-रहीम टेकरा वैसा का वैसा है. जानी कहते हैं कि मिली जुली आबादी वाले बापूनगर और राइखड़ इलाके सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आकर बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, लेकिन राम-रहीम टेकरा पर इसका असर इसलिए नहीं हुआ क्योंकि यहां के लोग हमेशा से मिल-जुलकर रहना चाहते हैं."

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