त्रिपुरा में बीजेपी ने कैसे ढहा दिया वाम क़िला?

  • 3 मार्च 2018
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साल 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने त्रिपुरा में 50 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 49 की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी. तब बीजेपी को यहां केवल 1.87 फ़ीसदी वोट मिले थे और वो एक भी सीट नहीं जीत सकी थी.

मजह पांच साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है और 2018 के विधासनभा चुनाव में बीजेपी ने बहुतम के साथ 25 सालों से चली आ रहे वाम क़िले को ढहाया दिया है. इस लिहाज से यह ऐतिहासिक भी है.

2014 में केंद्र की सत्ता में काबिज होने के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्वोत्तर के विकास की बात करते रहे हैं. उन्हें प्रधानमंत्री बने हुए अभी चार साल भी नहीं पूरे हुए हैं और पूर्वोत्तर की 'सात-बहनों' या 'सेवन-सिस्टर्स' में से असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में बीजेपी सत्ता में है जबकि त्रिपुरा में वो सरकार बनाने की स्थिति में आ गई है.

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Image caption प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में उमड़ा जनसमूह

'चोलो पलटई' का नारा

समूचे पूर्वोत्तर में कमल खिलाने में जुटी बीजेपी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान का हिस्सा बने और इस दौरान उन्होंने 'चोलो पलटई' (आओ बदलें) का नारा दिया.

इस दौरान उन्होंने बेरोजगारी के साथ ही भ्रष्टाचार (रोज वैली स्कैम जैसे मुद्दे) को भी चुनावी मुद्दा बनाया.

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माणिक नहीं हीरा चाहिए

इसके अलावा उनके जुमले 'माणिक नहीं हीरा चाहिए' लोगों के जेहन में उतर गए लगते हैं. जिसके उन्होंने मायने बताये H हाईवे, I का मतलब आईवे (डिजिटल कनेक्टिविटी), R से रोडवेज़ और A यानी एयरवेज़.

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त्रिपुरा के लिए बीजेपी ने थ्री-टी का एजेंडा पेश किया जिसका मतलब है ट्रेड, टूरिज्म और ट्रेनिंग (युवाओं के लिए) और यही त्रिपुरा का सबसे बड़ा मुद्दा भी है.

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बेरोजगारी की समस्या

यहां के लोगों को माणिक सरकार से कोई बहुत ज़्यादा समस्या नहीं थी लेकिन वो रोजगार की समस्या को लेकर बदलाव चाहते हैं. वो बदलाव चाहते हैं ताकि विकास की गति तेज़ हो.

पूर्वोत्तर के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार संदीप फुकन ने बीबीसी को बताया, "ऐसा नहीं है कि माणिक सरकार ने प्रदर्शन नहीं किया. 25 साल लंबा समय होता है. सरकार प्रदर्शन कर रही हो तो भी लोगों के जेहन में यह होता है कि इसे बदलने से विकास की गति तेज़ होगी."

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Image caption त्रिपुरा में जश्न मनाते बीजेपी समर्थक

ट्रेड, टूरिज्म, ट्रेनिंग

फुकन कहते हैं, "उनके प्रदर्शन स्वास्थ्य, शिक्षा विशेषकर प्राथमिक शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान था. लेकिन छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना पड़ता है. रोजगार के अवसरों का नहीं होना भी इसमें बेहद अहम है. इंडस्ट्री वहां बिल्कुल नहीं है."

"कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वहां समुचित मात्रा में नहीं है. युवाओं की बड़ी संख्या है जिसे बीजेपी ने इसी को ध्यान में रखते हुए अपने थ्री टी स्लोगन का जोरशोर से प्रचार किया."

सोनमुरा की रैली में खुद प्रधानमंत्री मोदी ने बेरोजगारी की समस्या पर युवाओं से कहा था कि ये चुनाव बीजेपी नहीं बल्कि 8 लाख बेरोजगार युवा और 7वें वेतन आयोग के लाभ से दूर रहे कर्मचारी लड़ रहे हैं.

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Image caption त्रिपुरा में भाजपा की एक रैली में उमड़ी भीड़

चौथे वेतन आयोग की ही सैलरी

प्रधानमंत्री ने कहा था, "लेफ्ट के 25 वर्षों के राज में राज्य पिछड़ गया है. त्रिपुरा के लोग आज भी चौथे वेतन आयोग के अनुसार सैलरी पाते हैं जबकि पूरे देश में 7वां वेतन आयोग लागू हो चुका है."

अपने विधानसभा चुनाव अभियान की शुरुआत से पहले बीजेपी ने कांग्रेस के कई स्थानीय नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया.

वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक ने बीबीसी से कहा, "बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की नीति रही है कि कांग्रेस से भागे हुए लोगों को अपनी पार्टी में शामिल करें. बंगाल की तरह ही त्रिपुरा में भी राजनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति है."

वो कहते हैं कि मुख्य धारा से कटे लोग अब भाजपा के साथ जुड़ रहे हैं. भौमिक ने कहा, "पूर्वोत्तर के लोग राष्ट्रीय मुख्य धारा से अलग थलग रहे हैं. लेकिन अब वो भाजपा के साथ जुड़ते जा रहे हैं."

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कांग्रेस के हाशि पर आने का लाभ

देश के साथ ही राज्य में कांग्रेस के अस्तित्व का नहीं होना बीजेपी के लिए फ़ायदेमंद रहा.

सुबीर भौमिक कहते हैं, "कांग्रेस जो कभी यहां हावी थी, उसके कमज़ोर होने का भी भाजपा को सीधा फ़ायदा मिला है."

लेकिन साथ ही वो कहते हैं कि बीजेपी को राज्य में वही करना होगा जो कांग्रेस किया करती थी.

भौमिक कहते हैं, "संघ और भाजपा को हिंदुत्व का कीर्तन बंद करना होगा और लोगों के दिलों तक और प्रभावी ढंग से पहुंचने के लिए और बेहतर रणनीति बनानी होगी."

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