ग्राउंड रिपोर्ट: किस फ़ॉर्मूला से बीजेपी ने माणिक सरकार को दी मात?

  • 3 मार्च 2018
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पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में 25 साल लगातार शासन में रहे वाममोर्चे की सत्ता का अंत हो गया है और बीजेपी ने सहयोगी इंडिजीनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफ़टी) के साथ मिलकर भारी बहुमत हासिल कर लिया है.

60 सीटों वाली त्रिपुरा विधानसभा में बीजेपी गठबंधन 40 सीटों से अधिक सीटें जीतने जा रहा है. वहीं, वामपंथी पार्टियां केवल 15 सीटों पर सिमटकर रह जाएंगी.

राजधानी अगरतला में बीजेपी कार्यक्रताओं ने जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया है. वैसे तो यहां के लोगों ने शुक्रवार को होली खेली थी लेकिन आज पूरा शहर भगवा रंग में रंगा हुआ दिखाई दिया.

9 सीटों पर आगे चल रही आईटीएफटी को 'गेम चेंजर' कहा जा रहा हैं.

वामपंथी दलों को इस चुनाव में भारी हार का सामना करना पड़ा है. माणिक सरकार की अगुवाई वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम जो भारी बहुमत मिलने का दावा कर रही थी उसकी बुरी तरह हार हुई है. वहीं, उसकी सहयोगी पार्टी सीपीआई पूरी तरह पिछड़ गई है.

वामपंथी दलों ने अपनी हार स्वीकार करते हुए विपक्ष की सकारात्मक भूमिका निभाने की बात कही है. वहीं, बीजेपी में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार बिप्लब कुमार देब ने इसे लोकतंत्र और त्रिपुरा की जनता की जीत बताया है.

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पत्रकारों से बात करते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव तथा पूर्वोत्तर मामलों के प्रभारी राम माधव ने कहा, "यह क्रांतिकारी परिणाम है जो त्रिपुरा की सुंदरी माता और राज्य के लोगों के आशीर्वाद से मिले हैं. चुनावी नतीजों के अभी तक जो रुझान है वो बीजेपी को सरकार बनाने की दिशा में ले जाने वाले रुझान हैं. हम इन नतीजों से काफी संतुष्ट हैं. इसमें पीएम मोदी और पार्टी के कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत भी शामिल है."

उन्होंने कहा, "हमें पूरा विश्वास है कि 40 से अधिक सीट लेकर हम इस राज्य में एक परिवर्तनकारी और स्थाई सरकार बनाने में कामयाब होंगे. त्रिपुरा की जनता की बदौलत यहां 'चलो पलटाए' साकार हुआ है."

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त्रिपुरा में वामपंथियों की हार ने उनके लिए एक युग का अंत कर दिया है, जिसकी शुरुआत साल 1993 में दशरथ देब के मुख्यमंत्री बनने के साथ हुई थी और बाद में 20 साल तक बतौर मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने सत्ता की बागडोर अपने हाथ में रखी.

पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु के बाद माणिक सरकार सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले वाम नेता हैं. मानिक सरकार 11 मार्च 1998 को पहली बार त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बने थे.

वाम मोर्चे को त्रिपुरा में 1993 के बाद पहली बार विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ रहा है. अगर त्रिपुरा में 1963 से कांग्रेस के तीन बार के शासन को छोड़ दें तो राज्य में 1988 से लेकर अब तक वाम मोर्चा की सरकार रही है.

त्रिपुरा में इस तरह के नतीजों पर वरिष्ठ पत्रकार जयंत भट्टाचार्य ने बीबीसी से कहा, "माणिक सरकार ने निचले स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार को गंभीरता से नहीं लिया. न ही वो राज्य में युवाओं के लिए रोजगार सृजन कर पाए. सरकारी नौकरी करने वाले लोग भी वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं कर पाने से ख़फ़ा थे. बीजेपी को इन मुद्दों से फ़ायदा मिला."

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"प्रधानमंत्री से लेकर पार्टी प्रमुख अमित शाह और तमाम वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव के दौरान जमकर कैंपेन चलाया. जो लोग कांग्रेस से नाराज़ थे वो भी बीजेपी में सरक गए जबकि जनजातीय इलाकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग पहले से काम कर रहे थे. इसके अलावा राज्य में वाम मोर्चे की सरकार को 25 साल हो गए थे लिहाज़ा एंटी इन्कम्बेंसी फ़ैक्टर तो था ही."

"त्रिपुरा में जनजातीय लोगों लिए अलग राज्य की मांग करने वाले आईपीएफ़टी के साथ गठबंधन करने के बाद बीजेपी ने इस संगठन को काफी नियंत्रण में रखा क्योंकि वाम दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को काफी उछाला था कि बीजेपी अगर सत्ता में आई तो त्रिपुरा का विभाजन कर देगी. दरअसल बंगालियों का वोट केवल इसी एक फ़ैक्टर पर ही वाम मोर्चे के साथ जा सकता था लेकिन बावजूद इसके जनजातीय इलाकों में बीजेपी गठबंधन को ही फायदा मिला."

त्रिपुरा विधानसभा की कुल 60 सीटों में 20 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. इन 20 सीटों पर बीजेपी गठबंधन ने बढ़त बनाई हुई है जो सीपीएएम की हार का एक बड़ा कारण माना जा रहा है. यह वही सीपीएम है जिसने 2013 के विधानसभा चुनाव में यहां 18 सीटों पर जीत हासिल की थी. इस बार इन 20 सीटों में आईपीएफ़टी ने 9 सीटों पर और बीजेपी ने 11 सीटों पर चुनाव लड़ा था.

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त्रिपुरा मुख्य रूप से एक बंगाली बहुल राज्य है. यहां 72 फ़ीसदी आबादी बंगालियों की है और 28 फ़ीसदी जनजातीय है. यहां की राजनीति को समझने वाले लोगों का कहना है कि माणिक सरकार ने शुरुआत में जनजातीय लोगों की समस्या पर गंभीरता से ग़ौर किया था और उनके विकास के लिए कांउसिल बनाने से लेकर कई काम किए.

एक समय लोगों की ऐसी सोच बन गई थी कि कांग्रेस बंगालियों की पार्टी है और सीपीएम जनजातीय लोगों की. ऐसे में बीजेपी ने आईपीएफ़टी के साथ गठबंधन कर माणिक सरकार के जीत के फॉर्मूले को छीन लिया.

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