आदिवासी बहुल राज्यों में आदिवासियों को नेतृत्व क्यों नहीं देती पार्टियां?

  • 5 मार्च 2018
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Image caption बंगाली मूल के बिप्लब देब को त्रिपुरा में मुख्यमंत्री की दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा है.

त्रिपुरा समेत दूसरे राज्यों में भी भारतीय जनता पार्टी आदिवासियों के लिए सुरक्षित क्षेत्रों में खुद के ज़्यादा प्रभावशाली होने का दावा करती है.

लेकिन सच ये है कि बीजेपी इन राज्यों में आदिवासी नेतृत्व को सत्ता नहीं देती है.

राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर महत्वपूर्ण आदिवासी बहुल राज्यों में कांग्रेस, बीजेपी या वामपंथी समेत दूसरी पार्टियों का राजनैतिक चरित्र सवर्णवादी है? त्रिपुरा चुनावी नतीजों के बाद ये सवाल कहीं ज्यादा ध्यान खींच रहा है.

त्रिपुरा में अगर किसी एक समुदाय का सबसे ज्यादा सुरक्षित बीस सीटें हैं, तो वह आदिवासी है. आदिवासियों की आबादी भी दूसरी जातियों और समुदायों की तुलना में ज़्यादा है.

त्रिपुरा में आदिवासियों की आबादी 31.8 फ़ीसदी है. लेकिन क्या त्रिपुरा में राजनीतिक तौर पर संभव है कि वहां का मुख्यमंत्री कोई आदिवासी हो सकता है?

त्रिपुरा जैसी राजनीतिक ताक़त रखने वाले दूसरे राज्यों में सत्ता पर नेतृत्व का अध्ययन करें तो शायद इस सवाल का जवाब मिल सकता है.

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आदिवासी बहुल की परिभाषा

त्रिपुरा की तरह झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ को आदिवासी बहुल राज्य के रूप में जाना जाता है.

इन राज्यों के संदर्भ में आदिवासी बहुल की परिभाषा को यहां स्पष्ट कर देना ज़रूरी है. ये राज्य देश के उन छह राज्यों से अलग हैं, जहां आदिवासियों की आबादी पचास फ़ीसदी से भी ज्यादा है.

इनमें उत्तर पूर्व के अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम, मेघालय, दादर एवं नागर हवेली और लक्षद्वीप है. उत्तर पूर्व के सिक्किम में 33.8 फ़ीसदी और मणिपुर में 35.1 फ़ीसदी आदिवासी आबादी है.

जिन राज्यों में पचास फ़ीसदी से ज़्यादा की आबादी है, वहां पर राजनीतिक पार्टियों के सामने ये सवाल नहीं होता है कि सत्ता का नेतृत्व किसे सौंपा जाए.

राजनीतिक चुनौती उन राज्यों में होती है, जहां आदिवासी आबादी एक तिहाई है.

तो क्या वहां की राजनीतिक सत्ता किसी आदिवासी के हाथों में देने का फ़ैसला लेने की हिम्मत विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने वाली मुख्यधारा की कोई पार्टी कर सकती है?

त्रिपुरा में बीस सीटों पर जीत हासिल करने का श्रेय तो बीजेपी आईपीएफटी के साथ अपने गठबंधन को दे रही है लेकिन क्या वह आदिवासी नेतृत्व को वहां स्वीकार कर सकती है?

त्रिपुरा जैसे राज्यों में क्या केवल आदिवासी बहुल आबादी संसदीय पार्टियों के सवर्ण नेतृत्व के लिए हार और जीत के रूप में ही स्वीकार्य हैं?

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झारखंड और छत्तीसगढ़

अगर हम त्रिपुरा का जवाब झारखंड में तलाश करें तो भाजपा वहां पिछले विधानसभा चुनाव में पहली बार अकेले बहुमत में आई थी और उसने गैर आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया.

रघुवर दास को पहला गैर अदिवासी मुख्यमंत्री बनाया गया.

झारखंड को जब बिहार से अलग राज्य के रूप में गठित किया जा रहा था तो झारखंड के अलग राज्य होने की अहमियत इस रूप में दर्ज की गई थी कि वहां की आदिवासी आबादी के लिए यह ज़रुरी हैं.

आदिवासियों ने अलग राज्य की मांग के लिए स्वतंत्रता के बाद से आंदोलन जारी रखा. झारखंड़ में आदिवासी के मुख्यमंत्री बने रहने का नारा तभी तक जारी रहा जब तक कि अलग राज्य बनने के बाद किसी पार्टी को विधानसभा के चुनाव में बहुमत नहीं मिला.

छत्तीसगढ़ में भी भाजपा अपने बूते सत्ता में हैं और उसकी कमान गैर आदिवासी सवर्ण नेतृत्व के अधीन पिछले पन्द्रह वर्षों से है.

छत्तीसगढ़ को मध्यप्रदेश से अलग एक नये राज्य़ के रुप में बनाने की मांग के पीछे आदिवासियों की बहुल आबादी को पिछड़ेपन को दूर करना था.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने पहले मुख्यमंत्री के तौर पर आदिवासी नौकरशाह अजीत जोगी को नेतृत्व सौंपा था लेकिन ऐसा छत्तीसगढ़ के लिए हुए पहले विधानसभा चुनाव की पूर्व ही हुआ था.

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झारखंड में आदिवासियों की आबादी 26.2 प्रतिशत तो छत्तीसगढ़ में 30.6 प्रतिशत है.

इन राज्यों में आदिवासियों के लिए सुरक्षित क्षेत्रों की संख्या क्रमश 28 और 29 है. वे राजनीतिक तौर पर ज्यादा ताकतवर इस मायने में भी है कि उनकी आबादी पूरे राज्य में है.

उनके मतों पर गैर आदिवासियों की जीत हार निर्भर होती है.

ओडिशा में भी सुरक्षित क्षेत्रों की संख्या महज 33 हैं और 22.8 प्रतिशत आबादी के साथ राज्य के बहुत बड़ी संख्या में चुनाव क्षेत्रों को वे प्रभावित करने की क्षमता रखती है.

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लेकिन ओडीशा में भी गैर आदिवासी मुख्यमंत्री ही रहे हैं.

कांग्रेस ने 1999 में गिरिधर गोमांग को मुख्यमंत्री बनाया था.

लेकिन यह 1996 के विधानसभा चुनाव में बहुमत मिलने के बाद नहीं हुआ बल्कि जब 1999 में कांग्रेस पार्टी में राजनीतिक अस्थिरता आई तब उन्हें अंतरिम तौर पर मुख्यमंत्री बनाया था.

अस्थिरता की स्थिति में आदिवासी के मुख्यमंत्री बनाने का यह पहला उदाहरण है.

इन राज्यों में आदिवासियों के हाथों में संसदीय पार्टियां नेतृत्व नहीं देती हैं और वहां आदिवासियों को महज सर्वणों के नेतृत्व में सत्ता के लिए इस्तेमाल करना चाहती है.

मुख्य धारा की संसदीय पार्टियां आदिवासियों को माओवादी और अलगाववादी राजनीति से जोड़कर देखती है.

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