मेघालय: कांग्रेस सबसे आगे, फिर मुक़ाबला कैसे हारी?

  • 5 मार्च 2018
राहुल गांधी इमेज कॉपीरइट Getty Images

शनिवार को पूर्वोत्तर से जब चुनावी नतीजे आए तो सबसे ज़्यादा चर्चा त्रिपुरा की हुई. लाल क़िला ढहने और भगवा लहराने की सुर्खियां मीडिया में छाई रहीं.

पिछले विधानसभा चुनावों में खाता तक नहीं खोल सकी भाजपा, माणिक सरकार की अगुवाई में चुनाव लड़ रही माकपा को चौंकाते हुए दो-तिहाई आंकड़े तक जा पहुंची.

इस हार से जहां वाम दल निराश और भाजपा काफ़ी उत्साहित है, वहीं कांग्रेस की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं और ऐसा कहा जा रहा है कि उसने मुक़ाबला शुरू होने से पहले ही हार मान ली थी.

त्रिपुरा और नगालैंड में वो एक भी सीट नहीं जीती, ऐसे में मन मसोसकर बैठ सकती थी. लेकिन इसके बावजूद मेघालय में कांग्रेस को ज़्यादा बड़ा झटका लगा है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, "सिर्फ़ दो सीटें, बीजेपी ने प्रॉक्सी के ज़रिये मेघालय में सत्ता हासिल की, मणिपुर और गोवा की तरह बीजेपी ने जनादेश के प्रति असम्मान दिखाया है. सत्ता हासिल करने के लिए पैसे का इस्तेमाल कर अवसरवादी गठबंधन बनाया."

यहां वो 21 सीटें जीतने में कामयाब रही, लेकिन इसके बावजूद सत्ता का सुख दूसरे खेमे में जाता दिख रहा है. ज़ख़्मों पर नमक ये कि राज्य में महज़ दो सीटें जीतने वाली भाजपा के नेता हेमंत विश्व सरमा ने इस बात का ऐलान किया कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा.

राज्य में कांग्रेस की 21, भाजपा की 2 के अलावा नेशनल पीपल्स पार्टी को 19, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी को 6 और पीपल्स डेमोक्रेटिक फ़्रंट को 4 सीटें मिली हैं.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक कांग्रेसी नेता मुकुल संगमा यूडीपी चीफ़ डॉनकुपर रॉय के बंगले पर गए और ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री काल का फ़ॉर्मूला दिया.

जब संगमा रॉय से मिलने पहुंचे थे, तभी भाजपा नेता सरमा की गाड़ी भी भीतर दाख़िल हुई थी. उनके साथ कार में नेशनल पीपल्स पार्टी चीफ़ कॉनराड संगमा भी बैठे थे.

रॉय गैर-कांग्रेसी सरकार को समर्थन देने का फ़ैसला कर चुके थे. रॉय के मुकुल का प्रस्ताव ठुकराने के कुछ देर बाद सरमा बाहर आए और 29 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए कहा कि और लोगों का साथ मिलने वाला है. जल्द ही ये संख्याबल 34 पर पहुंच गया. और कांग्रेस के लिए सब ख़त्म हो गया.

गोवा जैसे हालात क्यों हुए?

कांग्रेस ने मेघालय में चुनावों से पहले और बाद में अपनी ताक़त झोंकी थी. नतीजों के बाद अहमद पटेल, कमलनाथ, सीपी जोशी और मुकुल वासनिक जैसे दिग्गज वहां रवाना भी किए गए ताकि गोवा जैसा खेल दोबारा न हो जाए, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

इसकी वजह? रिपोर्ट के मुताबिक अतीत में कांग्रेस के साथ क्षेत्रीय दलों के रिश्ते अच्छे नहीं रहे हैं और यही वजह है कि उन्होंने केंद्र में बैठी भाजपा के साथ जाने का फ़ैसला किया. कांग्रेस ने उम्मीद लगाई थी की यूडीपी जैसा दल खासी हिल्स के नेता को सीएम के रूप में देखना चाहेगा.

लेकिन उस वक़्त सारी आस जाती रही जब रॉय ने कहा कि यूडीपी कॉनराड को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है और वो गारो हिल्स से हैं.

कांग्रेस और यूडीपी ने साल 2008 से 2013 के बीच साथ मिलकर सत्ता का सुख भोगा था, लेकिन 2013 के चुनावों से पहले दोनों की दोस्ती बुरी तरह टूटी.

लेकिन यूडीपी ने कांग्रेस के बजाय भाजपा की दोस्ती क्यों स्वीकार की, यूडीपी चीफ़ डॉनकुपर रॉय, ''जब तक मेरे पास पर्याप्त संख्या में विधायक नहीं हैं, मैं सीएम के पद पर दांव नहीं लगाने जा रहा.'' वो शायद 2009 नहीं भूले जब उन्हें सीएम का पद छोड़ना पड़ा था.

उन्होंने कहा, ''मैं सरकार की स्थिरता को लेकर ज़्यादा चिंतित हूं.''

दूसरी ओर कांग्रेस ने आरोप लगाना शुरू कर दिया है. उसका कहना है कि सरकार बनाने का दावा पेश करने को लेकर उनकी पार्टी के नेताओं ने राज्यपाल से पहले मुलाक़ात की थी.

मुकुल ने कहा, ''भाजपा के पास केवल दो विधायक हैं. वो लोग सरकार कैसे बना सकते हैं? वो दूसरे के कांधों पर बंदूक रखकर चलाना चाहते हैं. भाजपा हमेशा से यही करती आई है. यही वक़्त है कि सभी राजनीतिक दल इस दिशा में सोचें...उन्हें काफ़ी सतर्क रहने की ज़रूरत है.''

कॉनराड का कहना है कि 21 विधायकों का पत्र सौंपने से कुछ नहीं होता क्योंकि राज्यपाल सरकार की स्थिरता को भी पर्याप्त तरजीह देते हैं.

दूसरी ओर सरमा का कहना है कि ये भाजपा और एनडीए के लिए गौरव का क्षण है क्योंकि गठबंधन के पास अब पूर्वोत्तर के आठ में से सात राज्यों में सत्ता होगी.

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