त्रिपुरा में चुनाव नतीजों के बाद हिंसा, CPM और BJP के अपने-अपने दावे

  • 6 मार्च 2018
त्रिपुरा हिंसा
Image caption आग लगने के बाद पड़ा मलबा

वैसे तो त्रिपुरा को चुनावी हिंसा के लिए नहीं जाना जाता रहा है. अलबत्ता यहाँ चरमपंथ का अंत भी अहिंसक ही रहा क्योंकि चरमपंथियों ने हथियार डालने के बाद रबड़ के पेड़ उगाकर रोज़गार शुरू किया. इस तरह बिना हिंसा के ही चरमपंथ ख़त्म हो गया.

त्रिपुरा ही एकमात्र राज्य है जहाँ 'आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट' को भी ख़त्म कर दिया गया था लेकिन विधानसभा के चुनावों के परिणामों के बाद प्रदेश के विभिन्न इलाकों से हिंसा की खबरें मिल रही हैं. खासतौर पर राजधानी अगरतला के पास बांग्लादेश की सीमा से लगे इलाकों से.

पश्चिम त्रिपुरा प्रशासन ने हिंसा को देखते हुए सीआरपीसी की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी है. पश्चिम त्रिपुरा के जिलाधिकारी मिलिंद रामटेक के मुताबिक निषेधाज्ञा 13 पुलिस स्टेशन इलाकों में लागू की गई है जो अगले दो दिन तक प्रभावी रहेगी.

वामपंथी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि परिणामों के बाद दल विशेष ने उनके कार्यालयों को ही सिर्फ़ निशाना नहीं बनाया, बल्कि उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं के घरों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है.

अगरतला से सीपीएम के पूर्व विधायक झुमु सरकार जो इस बार चुनाव हार गए. अपने गाँव में सहमे हुए हैं.

त्रिपुरा: बीजेपी के जश्न में गठबंधन के 'काले बादल'

त्रिपुरा की जीत पर पीएम मोदी का दो मिनट का मौन किनके लिए था

दुकान में लगाई आग

झुमु सरकार ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अपने कई रिश्तेदारों को अपने घर बुलवा लिया है. उनका आरोप है कि उन्हें हर रोज़ हमले की धमकियां मिल रही हैं.

झुमु सरकार का आरोप है कि उन्हें जो सुरक्षा मिली थी उसे भी हटा लिया गया है. झुमु सरकार के घर से कुछ ही दूरी पर लंगा पाड़ा है, जहाँ सीपीएम समर्थक की दुकान में आग लगा दी गयी.

हालांकि बातचीत के दौरान वहां भाजपा के कार्यकर्ता आ गए और उस आगज़नी का कारण 'शॉर्ट सर्किट' बताया.

पास में ही लंकमूरा पंचायत पाड़ा के सुकुमार आचार्जी और उनकी पत्नी शोभिता उस घर के मलबे से अपना सामान निकलने का काम कर रहे हैं जो बिल्कुल राख हो चुका है.

त्रिपुरा में बीजेपी ने कैसे ढहा दिया वाम क़िला?

त्रिपुरा में माणिक सरकार को चित करने वाला 'प्रचारक'

''हथियारबंद लोगों ने किया हमला''

सुकुमार आचार्जी बताते हैं कि वो सीपीएम के कार्यकर्ता हैं और चुनावी परिणामों के अगले दिन उनके घर हथियारबंद लोगों ने हमला किया.

वो कहते हैं, ''हमारे घर में तोड़फोड़ की और सबकुछ जलाकर राख कर दिया है. अब हमें यहाँ से भाग जाने की धमकियां मिल रही हैं.''

उनका परिवार डरा हुआ है और उनकी पत्नी शोभिता यहाँ से सुरक्षित जगह पर चली जाना चाहती हैं.

मैं गाँव का दौरा कर ही रहा था तब तक अपने आपको भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में पहचान कराने वाले संजीब देब अपने दलबल के साथ पहुंचे.

उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि जो भी तोड़फोड़ की वारदातें हुई हैं वो सीपीएम ने खुद कराई हैं. इसमें भाजपा के लोगों का कोई हाथ नहीं है.

Image caption खुद को भाजपा कार्यकर्ता बताने वाले संजीब देब

संजीब देब कहते हैं, "अब हार जाने के बाद सीपीएम वालों के पास कोई और मुद्दा नहीं रह गया है. वो हमें बदनाम करना चाहते हैं. आस-पास भी जो सीपीएम के कार्यालयों को तोड़ा गया उसमें भी सीपीएम का ही हाथ था."

मगर सुकुमार आचार्य कहते हैं कि सड़कों पर भी सीपीएम के लोगों को रोक-रोक कर पीटा जा रहा है. वो कहते हैं कि त्रिपुरा का माहौल खराब किया जा रहा है, जिस बात का डर उनकी पार्टी को पहले से ही था.

फिलहाल इलाके के पूर्व विधायक झुमु सरकार भी अपना घर छोड़कर जाने का मन बना रहे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए