त्रिपुरा में बीजेपी को सत्ता तक पहुँचाने वाले नेता देबबर्मा कौन हैं?

  • 6 मार्च 2018
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क्यूबा के आदमकद नेता फिदेल कास्त्रो की बात हो या फिर असम जैसे छोटे राज्य में प्रफुल्ल कुमार महंत के छात्र आंदोलन की, अपने जमाने में इन युवा नेताओं ने बदलाव का इतिहास रचा.

लेकिन त्रिपुरा में इनके बिल्कुल उलट 80 साल का एक शांत बुजुर्ग, जो एक अलग स्वतंत्र राज्य की मांग पर अड़े है, आदिवासियों के बीच ऊर्जा का स्रोत बने हुए है.

त्रिपुरा से अलग राज्य यानी टिपरालैंड के लिए संघर्ष कर रहे इस शख्स का नाम नरेंद्र चंद्र देबबर्मा है. जिन्हें अधिकतर लोग रेडियो मैन के नाम से जानते हैं.

दरअसल, देबबर्मा ने 27 साल तक राज्य के ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) में काम किया. कुछ लोगों का कहना है कि टिपरालैंड आंदोलन की ओर आदिवासी युवाओं को आकर्षित करने का कौशल देबबर्मा ने संचार केंद्र में काम करने के दौरान हासिल किया था.

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ऐसे हु राजनीतिक सफर की शुरुआत

बीजेपी के साथ गठबंधन कर राज्य में 25 साल के वाम शासन का अंत करने वाले देबबर्मा इस समय काफी चर्चा में है. दरअसल बीजेपी के रणनीतिकारों के समक्ष देबबर्मा ने आदिवासी मुख्यमंत्री बनाने की ऐसी चाल चली है कि पार्टी को अपने वरिष्ठ मंत्रियों को त्रिपुरा के लिए रवाना करना पड़ गया.

आखिर आदिवासियों को अपने इस नेता पर कितना भरोसा है? साल 2009 में ऑल इंडिया रेडियो त्रिपुरा केंद्र से बतौर निदेशक रिटायर होने के बाद देबबर्मा ने इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) को पुनर्जीवित किया.

इससे पहले, कुछ ट्राइबल नेताओं के एक अलग समूह ने आईपीएफटी का गठन किया था लेकिन वे 2001 तक ही इस संगठन को चला पाएं.

राज्य के वरिष्ठ पत्रकार जयंत भट्टाचार्य ने बीबीसी से कहा, "संगठन चलाने वाले ट्राइबल नेता तो काफी सामने आए, लेकिन जनजातीय लोगों ने एनसी देबबर्मा पर भरोसा जताया और उन्हें नेता मान कर अलग राज्य की मांग पर शुरू हुए आंदोलन को मजबूत किया."

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युवाओं के बीच कैसे लोकप्रिय हुए देबबर्मा?

हालांकि माणिक सरकार अलग राज्य की मांग के खिलाफ थे. इसलिए आईपीएफटी का सीपीएम सरकार के साथ हमेशा टकराव रहा.

अगर त्रिपुरा का इतिहास देखें तो ये शुरू से एक आदिवासी बहुल राज्य रहा है और इस समय यहां करीब 37 लाख आबादी में से 28 फ़ीसदी जनजातीय लोग है. जबकि 72 फ़ीसदी आबादी बंगालियों की है.

ऐसे में साल 1978 से आदिवासियों के लिए एक अलग राज्य की मांग जोर पकड़ने लगी थी और इस दौरान त्रिपुरा में काफी जातीय हिंसा हुई. ये ऐसा समय था जब मातृभूमि की मांग को लेकर युवाओं ने हथियार उठाए थे.

आईपीएफटी प्रमुख देबबर्मा ने एक बार कहा था, "जब हमने संगठन को चलाना शुरू किया था, उस समय हमारे पास केवल 200 लोग थे. साल 2012 में यहां के जनजातीय युवा हमारे संगठन में शामिल होने लगे और इस तरह हजारों युवा टिपरालैंड के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार हो गएं.'

ये देबबर्मा वो शख्स है जिनके नेतृत्व में आईपीएफटी ने पिछले कुछ सालों के दौरान अलग राज्य की मांग के लिए त्रिपुरा और नई दिल्ली में लगातार विरोध प्रदर्शन किए.

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देबबर्मा की रणनीति पर बीजेपी का भरोसा

राजनीति को समझने वाले लोगों का कहना है कि माणिक सरकार के ख़िलाफ़ आईपीएफटी के इस जोरदार आंदोलन को देखते हुए बीजेपी ने ट्राइबल इलाकों में संगठन की ताकत को न केवल समझा बल्कि समय रहते इनके साथ गठबंधन कर जनजातीय लोगों को अपनी तरफ कर लिया.

नतीजतन ट्राइबल इलाकों की जिन अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 20 सीटों पर 2013 में सीपीएम की 19 सीटें थी वो इस बार के चुनाव में साफ हो गई और बाज़ी बीजेपी ने मार ली.

ये सारी रणनीति एनसी देबबर्मी के नेतृत्व में बनी और बीजेपी ने भी इस जनजातीय नेता पर अपना भरोसा रखा.

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देबबर्मा और बीजेपी के बीच मतभेद

खोवाई जिले के महारानीपुर गांव के एक गरीब और किसान परिवार से आने वाले देबबर्मा ने यूं तो 2009 में अलग राज्य के लिए आंदोलन छेड़ दिया था पर उन्हें पता था कि बिना किसी मुख्य राजनीतिक पार्टी का हाथ पकड़े वो वाम किले को ध्वस्त नहीं कर सकते.

बीजेपी जहां अलग राज्य बनाने की मांग का समर्थन नहीं करती है, वहीं देबबर्मा साफ कहते है, "अलग राज्य गठन करना आईपीएफटी का मुख्य एजेंडा है और जब तक हम टिपरालैंड नहीं बना लेते चैन से नहीं बैठेंगे. हमारा आंदोलन जारी रहेगा."

पत्रकार जयंत भट्टाचार्य के अनुसार त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य से एक और अलग राज्य बनाना भौगोलिक तरीके से भी संभव नहीं है.

वो कहते है, "अलग राज्य की मांग करने वाले लोग चाहते हैं कि जो ट्राइबल चुनावी क्षेत्र हैं, उनको राज्य से काटकर एक अलग राज्य बनाया जाए. ऐसा किसी भी तरह संभव नहीं है. इससे त्रिपुरा के नौ टुकड़े हो जाएंगे और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने के लिए अलग राज्य से गुजरना पड़ेगा."

त्रिपुरा में मानिक्य वंश का शासन था. साल 1946 में राजा की मौत के बाद भारतीय क्षेत्र में इस इलाके का विलय हो गया. भारत के विभाजन के बाद राजा का शासन खत्म हो गया और पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से काफी तादाद में ग़ैरआदिवासी इधर आ गए थे.

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