वो गेस्ट हाउस कांड, जिसने मायावती और मुलायम को दुश्मन बना दिया

  • 7 मार्च 2018
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''जिस तरह से तूफ़ान आने पर सांप और छछुंदर एक साथ आ जाते हैं, वैसे ही सपा और बसपा राजनीतिक रूप से साफ़ हो जाने के बाद एक-दूसरे के साथ आ गए हैं."

ये बयान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ का है. और उनके इस बयान की वजह है फूलपुर और गोरखपुर सीटों पर होने वाले लोकसभा के उपचुनाव.

बहुजन समाज पार्टी ने हाल तक इन दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े नहीं किए थे और रविवार को धुर-विरोधी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को समर्थन का एलान कर खेल दिलचस्प बना दिया.

बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा, "हमने पहले की तरह इन उपचुनावों में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हमारी पार्टी के लोग वोट डालने नहीं जाएंगे. वे भाजपा को हराने में सक्षम सबसे मज़बूत उम्मीदवार को वोट देंगे."

उनके बयान से समझा जा सकता है कि वो अपने समर्थकों के किस पर ठप्पा लगाने को कह रही थीं. उनका ये बयान दुश्मन को दोस्त में बदलने की झलक देता है.

इस कड़वाहट की क्या वजह थी?

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लेकिन अब तक ऐसा क्यों नहीं हुआ था. जब मोदी और योगी जैसी दो बड़ी चुनौतियां सामने खड़ी थीं, तब भी मायावती ने मुलायम या उनके बेटे अखिलेश से हाथ मिलाने का फ़ैसला क्यों नहीं किया?

बयानों में बुआ और बबुआ जैसे लफ़्ज़ ख़ूब उछले लेकिन सियासी ज़मीन पर कोई रिश्तेदारी क्यों नहीं बन सकी? मन में ऐसी क्या कड़वाहट है, जो मजबूरी पर भी भारी पड़ी?

इसे समझने के लिए क़रीब 28 बरस पहले झांकना होगा. उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 1995 और गेस्ट हाउस कांड, दोनों बेहद अहम हैं.

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उस दिन ऐसा कुछ हुआ था जिसने न केवल भारतीय राजनीति का बदरंग चेहरा दिखाया बल्कि मायावती और मुलायम के बीच वो खाई बनाई जिसे लंबा अरसा भी नहीं भर सका.

दरअसल, साल 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई और इसके अगले साल भाजपा का रास्ता रोकने के लिए रणनीतिक साझेदारी के तहत बहुजन समाज पार्टी से हाथ मिलाया.

गेस्ट हाउस कांड है क्या?

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सपा और बसपा ने 256 और 164 सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ा. सपा अपने खाते में से 109 सीटें जीतने में कामयाब रही जबकि 67 सीटों पर हाथी का दांव चला. लेकिन दोनों की ये रिश्तेदारी ज़्यादा दिन नहीं चली.

साल 1995 की गर्मियां दोनों दलों के रिश्ते ख़त्म करने का वक़्त लाईं. इसमें मुख्य किरदार गेस्ट हाउस है. इस दिन जो घटा उसकी वजह से बसपा ने सरकार से हाथ खींच लिए और वो अल्पमत में आ गई.

भाजपा, मायावती के लिए सहारा बनकर आई और कुछ ही दिनों में तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोहरा को वो चिट्ठी सौंप दी गई कि अगर बसपा सरकार बनाने का दावा पेश करती है तो भाजपा का साथ है.

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वरिष्ठ पत्रकार और उस रोज़ इस गेस्ट हाउस के बाहर मौजूद रहे शरत प्रधान ने बीबीसी को बताया कि वो दौर था जब मुलायम यादव की सरकार थी और बसपा ने समर्थन किया था लेकिन वो सरकार में शामिल नहीं हुई थी.

साल भर ये गठबंधन चला और बाद में मायावती की भाजपा के साथ तालमेल की ख़बरें आईं जिसका ख़ुलासा आगे चलकर हुआ. कुछ ही वक़्त बाद मायावती ने अपना फैसला सपा को सुना दिया.

गेस्ट हाउस में जारी थी बसपा की बैठक

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उन्होंने कहा, ''इस फैसले के बाद मायावती ने गेस्ट हाउस में अपने विधायकों की बैठक बुलाई थी. सपा के लोगों को किसी तरह इस बात की जानकारी मिल गई कि बसपा और भाजपा की सांठ-गांठ हो गई है और वो सपा का दामन छोड़ने वाली है.''

प्रधान ने कहा, ''जानकारी मिलने के बाद बड़ी संख्या में सपा के लोग गेस्ट हाउस के बाहर जुट गए. और कुछ ही देर में गेस्ट हाउस के भीतर के कमरे में जहां बैठक चल रही थी, वहां मौजूद बसपा के लोगों को मारना-पीटना शुरू कर दिया. ये सब हमने अपनी आंख़ों से देखा है.''

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''तभी मायावती जल्दी से जाकर एक कमरे में छिप गईं और अंदर से बंद कर लिया. उनके साथ दो लोग और भी थे. इनमें एक सिकंदर रिज़वी थे. वो ज़माना पेजर का हुआ करता था. रिज़वी ने मुझे बाद में बताया कि पेजर पर ये सूचना दी गई थी कि किसी भी हालत में दरवाज़ा मत खोलना.''

''दरवाज़ा पीटा जा रहा था और बसपा के कई लोगों की काफ़ी पिटाई. इनमें से कुछ लहूलुहान हुए और कुछ भागने में कामयाब रहे. ''

प्रधान के मुताबिक तब बसपा के नेता सूबे के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को फ़ोन कर बुलाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन तब किसी ने फ़ोन नहीं उठाया.

जब मायावती कमरे में छिपी थीं

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''इस बीच मायावती जिस कमरे में छिपी थीं, सपा के लोग उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और बचने के लिए भीतर मौजूद लोगों ने दरवाज़े के साथ सोफ़े और मेज़ लगा दिए थे ताकि चटकनी टूटने के बावजूद दरवाज़ा खुल न सके.''

वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी उत्तर प्रदेश में खेले गए इस सियासी ड्रामे के तार दिल्ली से जोड़ते हैं. उनका कहना है कि साल 1992 में जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गई, तो काफ़ी झटका लगा था. उसके बाद 1993 में सपा-बसपा ने भाजपा को रोकने के लिए हाथ मिलाने का फ़ैसला किया और अपनी पहली साझा सरकार बनाई. मुलायम मुख्यमंत्री बने.

उस वक़्त दिल्ली में नरसिम्हा सरकार थी और भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी थे. दिल्ली में इस बात की फ़िक्र होने लगी थी कि अगर लखनऊ में ये साझेदारी टिक गई तो आगे काफ़ी दिक्कतें हो सकती हैं.

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इसलिए भाजपा की तरफ़ से बसपा को पेशकश की गई कि वो सपा से रिश्ता तोड़ लें तो भाजपा के समर्थन से उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिल सकता है.

''मुलायम को इस बात का अनुमान हो गया था और वो चाहते थे कि उन्हें सदन में बहुमत साबित करने का मौक़ा दिया जाए. लेकिन राज्यपाल ने ऐसा नहीं किया.''

कौन बचाने पहुंचा था माया को?

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''इसी खींचतान के बीच अपनी पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने के लिए बसपा ने सभी को स्टेट गेस्ट हाउस में जुटाया था और मायावती भी वहीं पर थीं. तभी सपा के लोग नारेबाज़ी करते हुए वहीं पहुंच गए थे.''

बसपा का आरोप है कि सपा के लोगों ने तब मायावती को धक्का दिया और मुक़दमा ये लिखाया गया कि वो लोग उन्हें जान से मारना चाहते थे. इसी कांड को गेस्ट हाउस कांड कहा जाता है.

ऐसा भी कहा जाता है कि भाजपा के लोग मायावती को बचाने वहां पहुंचे थे लेकिन शरत प्रधान का कहना है कि इन दावों में दम नहीं है कि भाजपा के लोग मायावती और उनके साथियों को बचाने के लिए वहां पहुंचे थे.

उन्होंने कहा, ''मायवती के बचने की वजह मीडिया थी. उस वक़्त गेस्ट हाउस के बाहर बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी मौजूद थे. सपा के लोग वहां से मीडिया को हटाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन ऐसा हो न सका.''

''कुछ ऐसे लोग भी सपा की तरफ़ से भेजे गए थे जो समझाकर मायावती से दरवाज़ा खुलवा सके, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.''

मायावती का आरोप, हत्या करना चाहते थे

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इसके अगले रोज़ भाजपा के लोग राज्यपाल के पास पहुंच गए थे कि वो बसपा का साथ देंगे सरकार बनाने के लिए. और तब कांशीराम ने मायावती को मुख्यमंत्री पद पर बैठाया. और यहीं से मायावती ने सीढ़ियां चढ़ना शुरू कीं.

क्या मायावती ने कभी खुलकर इस दिन के बारे में बताया कि असल में उस दिन क्या हुआ था, प्रधान ने कहा, ''जी हां, कई बार. मुझे दिए इंटरव्यू में या फिर प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने ख़ुद कहा कि उनका ये स्पष्ट मानना है कि उन्हें उस दिन मरवाने की साज़िश थी जिससे बसपा को ख़त्म कर दिया जाए.''

''मायावती को सपा से इतनी नफ़रत इसलिए हो गई क्योंकि उनका मानना है कि गेस्ट हाउस में उस रोज़ जो कुछ हुआ, वो उनकी जान लेने की साज़िश थी. ''

तो क्या फूलपुर और गोरखपुर में जो हो रहा है, वो इस दुश्मनी को ख़त्म करने की कोशिश नहीं है, प्रधान ने कहा, ''मुझे नहीं लगता. ये शॉर्ट टर्म के लिए हो सकता है लेकिन लंबी मियाद के लिए नहीं.''

''मायावती काफ़ी चतुर नेता हैं और अपने फ़ायदे को सर्वोपरि रखती हैं. अखिलेश यादव को भी इस तरह के गुर सीखने में अभी वक़्त लगेगा.''

लेकिन रामदत्त त्रिपाठी साल 1993-95 और 2018 के हालात में काफ़ी फ़र्क देखते हैं.

हालात काफ़ी बदल चुके हैं

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उनका कहना है, ''साल 1993 में मायावती और बसपा, दोनों उभार पर थीं. उत्साह था कि आगे संभाल ले जाएंगे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अगर पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उनका प्रदर्शन देख लिया जाए तो कहानी साफ़ हो जाती है.''

''लोकसभा में उनका खाता भी नहीं खुला और विधानसभा में उनके इतने विधायक भी नहीं जीते कि मायावती राज्यसभा में पहुंच सकें. वो दयनीय स्थिति में हैं. उनके कई अहम साथी दूसरे दलों में जा चुके हैं. इसलिए फिलहाल उनके सामने अस्तित्व बचाने का सवाल है. और डूबते को तिनके का सहारा है.''

त्रिपाठी के मुताबिक इस समय जिस तरह हिंदुत्ववादी ताक़तों का प्रसार हो रहा है, समाज से दूसरे तबकों की तरफ़ से भी ये दबाव बन रहा है कि साथ मिलकर कुछ किया जाए.

''मुझे लगता है कि नेताओं को वो हुनर आता है कि पुरानी बातों को भुलाकर आगे बढ़ा जाए.''

अगर फूलपुर या गोरखपुर में ये प्रयोग कामयाब रहता है तो क्या आगे चलकर इस दोस्ती में सीमेंट लगता देखा जा सकता है, त्रिपाठी ने कहा, ''बिलकुल हो सकता है. इन दलों के वोटबैंक की तरफ़ से भी संदेश आ रहा है कि इस दिशा में सोचा जाना चाहिए.''

''दोनों दलों के सामने वजूद का सवाल भी है. अगर सपा, बसपा और कांग्रेस फिर अलग-अलग लड़ते हैं तो फिर वही होगा जो हाल में हुआ है.'' उनका इशारा वोट बंटने की वजह से भाजपा को मिले फ़ायदे की तरफ़ है.

सपा-बसपा मिले तो किसे फ़ायदा?

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अगर एक पल के लिए ये मान लिया जाए कि भाजपा को टक्कर देने के लिए सपा और बसपा आगे भी हाथ मिलाते हैं तो दोनों में से किसे ज़्यादा लाभ होगा, उन्होंने कहा, ''मेरे हिसाब से समाजवादी पार्टी को. क्योंकि उसका आधार बड़ा है. हाल में बसपा की शक्ति क्षीण हुई है. इस बारे में कुछ अभी कहना जल्दबाज़ी होगा.''

त्रिपाठी के मुताबिक ख़ास बात ये है कि दोनों दलों का वोट ट्रांसफरेबल है. इसका मतलब ये है कि जब दोनों में से कोई एक दल लड़ता है और दूसरा उसका साथ देता है तो एक का वोटबैंक दूसरे के वोटबैंक में मिल जाता है.

''कांग्रेस के साथ ऐसा नहीं है. उसके साथ दिक्कत ये है कि जब वो चुनाव नहीं लड़ती तो सपा-बसपा के वोटबैंक में जाने के बजाय उसका वोट आधार भाजपा के खाते में चला जाता है.''

लेकिन क्या अब तक एकला चलो या फिर कुर्सी मेरी की नीति पर चलने वाली बसपा और मायावती आने वाले वक़्त में अपनी पॉलिसी बदलेगी, उन्होंने कहा, ''अस्तित्व के लिए ऐसा करना पड़ सकता है. मायावती कभी देश का प्रधानमंत्री बनने का ख़्वाब देखा करती थीं और आज राज्यसभा में पहुंचने तक के लाले हैं.''

''जब हालात उलट होते हैं तो ऐसे फैसले करने पड़ते हैं. मायावती के साथ उम्र का फैक्टर भी है. अखिलेश अभी युवा हैं और आगे राह खुली है. लेकिन अगर एक बार फिर बसपा चुनावों में नाकाम साबित होती है, तो भविष्य अंधकारमय है.''

भविष्य बचाना है तो वर्तमान से ही कोशिश करनी होगी. बयार बदली है और मायावती का अंदाज़ भी. ऐसे में कल के दोस्त अगर आज दुश्मन बन सकते हैं तो कल के दुश्मन आज हाथ क्यों नहीं मिला सकते?

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