चंद्रबाबू नायडू, नरेंद्र मोदी से दोस्ती क्यों तोड़ रहे हैं?

  • 8 मार्च 2018
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तेलुगू देशम पार्टी और भाजपा के रिश्ते इन दिनों बेहद ख़राब चल रहे हैं. एक वक़्त था जब नरेंद्र मोदी और चंद्रबाबू नायडू की एकसाथ हाथ मिलाते, मुस्कुराते हुए तस्वीरें दिखा करती थीं लेकिन अब वो दिन पुरानी बात हो गई है.

और इसकी वजह है: विशेष राज्य का दर्जा. तेलुगू देशम पार्टी लंबे वक़्त से आंध्र प्रदेश के लिए इस दर्जे की मांग कर रही है और केंद्र सरकार की तरफ़ से अब ये लगभग साफ़ हो गया है कि आंध्र को ये विशेष दर्जा नहीं मिलने जा रहा.

नरेंद्र मोदी सरकार में टीडीपी के दो मंत्री हैं- अशोक गजपति राजू और वाई एस चौधरी. और यह ख़बरें आ रही हैं कि दोनों जल्द ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे सकते हैं. दूसरी तरफ़ आंध्र सरकार में शामिल भाजपा के मंत्री इस्तीफ़ा दे चुके हैं.

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Image caption अशोक गजपति राजू

भाजपा का कहना है कि वो आंध्र प्रदेश के विकास के लिए प्रतिबद्ध है और राज्य सरकार की हरसंभव मदद की जाएगी लेकिन असंभव मांगों को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

इससे पहले नायडू ने विधानसभा में कहा था कि कांग्रेस का वादा है कि वो अगर साल 2019 में सत्ता में आती है तो आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा देगी, फिर भाजपा सरकार ऐसा क्यों नहीं कर रही.

उन्होंने चेताया कि अगर ऐसा नहीं होता तो भाजपा नेतृत्व को आंध्र के लोगों का गुस्सा झेलना होगा.

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नायडू की शिकायत

नायडू की शिकायत है कि पहले भाजपा नेतृत्व ने प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने का वादा किया था लेकिन फिर उनका कहना था कि सभी राज्यों से ये दर्जा वापस ले लिया जाएगा.

उनका दावा है कि ये बात कहे जाने के बाद ही वो स्पेशल पैकेज पर राज़ी हुए थे. क्योंकि अभी विशेष दर्जा वजूद में है, ऐसे में आंध्र प्रदेश को ये तुरंत मिलना चाहिए.

इस बीच वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवाल को आंध्र के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की थी और ऐसा बताया गया कि उन्होंने ये साफ़ कर दिया कि स्पेशल पैकेज दिया जा सकता है लेकिन प्रदेश के विशेष राज्य का दर्जा मिलने का सवाल नहीं है.

भाजपा का कहना है कि पिछड़े होने के तर्क पर आंध्र प्रदेश को ये दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि इस हिसाब से बिहार को ये दर्जा मिलना चाहिए. टीडीपी टैक्स रियायतों की मांग कर रही है.

लेकिन आंध्र को ऐसा क्या चाहिए कि टीडीपी मोदी सरकार से सारे ताल्लुक़ ख़त्म करने के बारे में सोच रही है? ये विशेष राज्य का दर्जा है क्या, जिस पर इतना बवाल मचा है?

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Image caption प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान भी विशेष पैकेज देने का वादा किया था.

आंध्र क्या चाहता है?

पैसे को लेकर केंद्र और राज्य के बीच काफ़ी मतभेद हैं. आंध्र का कहना है कि उसका राजस्व घाटा 16 हज़ार करोड़ रुपए है जबकि केंद्र का कहना है कि असल राजस्व घाटा चार हज़ार करोड़ रुपए का है और 138 करोड़ रुपए दिए जाने बाक़ी है.

राज्य स्पेशल स्टेटस मांग रहा है तो केंद्र का कहना है कि इसे ख़त्म कर दिया गया है और केंद्र की तरफ़ से प्रायोजित सभी स्कीमों के लिए 90:10 फ़ंडिंग की पेशकश.

इसके अलावा आंध्र पोलवरम के लिए 33 हज़ार करोड़ और राजधानी अमरावती के लिए 33 हज़ार करोड़ रुपए मांग रहा है जबकि केंद्र ने पोलवरम के लिए 5 हज़ार करोड़ रुपए दिए हैं जबकि जबकि अमरावती के लिए ढाई हज़ार करोड़ दे चुका है, जिसमें गुंटूर-विजयवाड़ा के लिए 500-500 करोड़ रुपए शामिल है.

इसके अलावा इस पर भी विवाद है कि आंध्र हडको और नाबार्ड से फ़ंडिंग चाहता है जबकि केंद्र का प्रस्ताव है कि वर्ल्ड बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से पैसा लिया जाए.

क्या होता है विशेष राज्य का दर्जा?

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पीआरएस इंडिया के मुताबिक विशेष राज्य का दर्जा की अवधारणा पहली बार फ़ाइनेंस कमिशन ने साल 1969 में पेश की थी.

इस श्रेणी में राज्यों को डालने का उद्देश्य उन्हें केंद्र से सहायता और टैक्स रियायतें मुहैया कराना होता है. इस कैटेगरी में आने वाले राज्य आम तौर पर पिछड़े या गरीब हुआ करते थे.

शुरुआत में सिर्फ़ तीन राज्यों- असम, नगालैंड और जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों को विशेष दर्जा दिया गया था लेकिन बाद में अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड जैसे आठ और राज्यों को ये दर्जा दिया गया.

कुछ राज्यों को विशेष दर्जा देने के पीछे तर्क ये था कि उनका संसाधनों का आधार सीमित है और वो विकास के लिए ज़्यादा संसाधन नहीं जुटा सकते.

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विशेष राज्य के दर्जे के लिए क्या जरूरी होता है, ये जानेंः

  • पहाड़ी इलाके
  • आबादी का कम घनत्व या आदिवासी आबादी की बड़ी हिस्सेदारी
  • पड़ोसी मुल्क़ों के साथ सरहद से जुड़ी सामरिक लोकेशन
  • आर्थिक और इंफ़्रास्ट्रक्चर आधार पर पिछड़ा होना
  • प्रदेश के वित्त का व्यावहारिक न होना

आम तौर पर स्पेशल कैटेगरी देने से जुड़ा फ़ैसला नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल करती है, जिसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री के अलावा योजना आयोग के सदस्य हुआ करते थे.

भारत में केंद्र से राज्यों को पैसा ट्रांसफर करने के कई आधार और तरीके होते हैं.

जब योजना आयोग होता था तो वित्त आयोग और वो मिलकर केंद्र-राज्य के वित्तीय रिश्तों की ज़िम्मेदारी संभालते थे.

यहां नॉर्मल सेंट्रल असिस्टेंस (NCA) का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है, जो राज्यों को मिलने वाली मदद का अहम हिस्सा है. इसे स्पेशल कैटेगरी प्राप्त राज्यों के हिसाब से बांटा जाता है.

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क्या होता है वित्तीय गणित?

इस श्रेणी में आने वाले राज्यों को कुल सहायता का 30% हिस्सा मिलता है, जबकि बाकी राज्यों के हिस्से 70% अंश.

विशेष दर्जा वाले राज्यों को मिलने वाली सहायता की प्रकृति भी अलग-अलग होती है. इन राज्यों के लिए NCA के तहत 90% अनुदान और 10% लोन दिया जाता है और दूसरे राज्यों के मामले में अनुदान और लोन का अनुपात 30:70 होता है.

इस श्रेणी के तहत आने वाले राज्यों को आवंटन की बात करें तो फ़ंड और उसके वितरण का कोई एक पैमाना नहीं होता. और ये राज्य को मिलने वाले प्लान के आकार और पिछले योजनागत खर्च पर निर्भर करता है.

गैर-स्पेशल कैटेगरी राज्यों के बीच आवंटन गाडगिल मुखर्ची फ़ॉर्मूला से तय होता है, जिसके तहत आबादी, प्रति व्यक्ति आय, वित्तीय प्रदर्शन और विशेष समस्याओं पर निर्भर करता है.

अतिरिक्त योजनागत संसाधनों के अलावा स्पेशल कैटेगरी में आने वाले राज्यों को एक्साइज़ और कस्टम ड्यूटी, इनकम टैक्स रेट और कॉरपोरेट टैक्स में भी रियायत मिलती है.

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