बीजेपी को त्रिपुरा जिताने वाली 'अलगाववादी' आईपीएफ़टी

  • 9 मार्च 2018
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Image caption एन सी देबबर्मा

नरेंद्र चंद्र देबबर्मा आकाशवाणी के निदेशक रह चुके हैं. इंडीजिनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा यानी आईपीएफ़टी के वो सर्वमान्य नेता हैं. आईपीएफ़टी अलग त्रिपुरालैंड की मांग करता आ रहा है.

इस बार त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने आईपीएफ़टी के साथ चुनाव पूर्व समझौता किया क्योंकि सीपीएम की सरकार त्रिपुरा के बंटवारे का विरोध करती आ रही थी.

मगर आईपीएफ़टी ने भाजपा को भी बड़ा झटका तब दिया जब चुनावी नतीजों के आने के फ़ौरन बाद एन सी देबबर्मा ने उनके सामने दो शर्तें रख दीं. पहली शर्त - अलग त्रिपुरालैंड का गठन और दूसरी शर्त - जनजातीय मुख्यमंत्री.

जीत के खुमार पर सवार भाजपा को दोनों ही शर्तें मंज़ूर नहीं थीं.

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बीजेपी ने निकाला बीच का रास्ता

गठबंधन से पहले ही जानकार कह रहे थे की आईपीएफ़टी और भाजपा का मेल अस्वाभाविक है. मगर अमित शाह की टीम ने ये जुआ खेला ताकि वाम दलों के दो दशकों से ज़्यादा के शासन को ध्वस्त किया जा सके.

अब भाजपा अपने घटक दल को नाराज़ तो नहीं कर सकती थी इसलिए उसने बीच का रास्ता निकालकर एक जनजातीय उपमुख्यमंत्री की भी घोषणा कर दी जिसने चुनाव ही नहीं जीता है.

उप मुख्यमंत्री के रूप में जिष्णु देबबर्मा के नाम की घोषणा की गयी जो चारिलाम विधानसभा क्षेत्र से 12 मार्च को चुनाव लड़ेंगे.

ये सब कुछ आईपीएफ़टी को खुश करने के लिए किया गया क्योंकि एक बार तो ऐसा लगने लगा था कि आईपीएफ़टी भाजपा के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है.

मगर आईपीएफ़टी के समर्थन के सहारे भाजपा ने अपने जनजातीय उम्मीदवारों को जितवाने का काम ज़रूर किया.

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कैसे बनी आईपीएफ़टी?

आईपीएफ़टी का उदय तब हुआ था जब संगठन ने अवैध रूप से त्रिपुरा में आकर बसने वाले बांग्लादेशी प्रवासियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था. वो बांग्लादेशी घुसपैठियों को बांग्लादेश वापस भेजने की मांग करते रहे थे.

आईपीएफ़टी पहले से ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए का हिस्सा रहा है. पहले इस पार्टी को इंडिजिनस नेशनलिस्ट पार्टी ऑफ़ त्रिपुरा यानी आईएनपीटी के नाम से जाना जाता था.

आईपीएफ़टी का उदय वर्ष 2000 में तब हुआ जब उसने त्रिपुरा आदिवासी स्वायतशासी जिला परिषद के चुनाव लड़े. उस समय अलगाववादी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ त्रिपुरा यानी एनएलएफ़टी ने आदिवासी इलाकों में सिर्फ वाम दलों और आईपीएफ़टी को ही चुनाव लड़ने की इजाज़त दी.

आईपीएफ़टी ने 28 में से 17 सीटों पर अपनी जीत दर्ज की और स्वायतशासी परिषद में बहुमत स्थापित भी कर लिया.

इसी दौरान चरमपंथी संगठन- त्रिपुरा नेशनल वालंटियर्स (टीएनवी) ने भी आईपीएफटी का समर्थन किया था. वर्ष 2001 में टीएनवी का आईपीएफ़टी में विलय हो गया. जानकार कहते हैं कि ऐसा एनएलएफ़टी के दबाव के कारण हुआ था.

मगर 2009 के आम चुनावों में आईपीएफ़टी का पुनर्गठन हुआ और एनसी देबबर्मा ने पार्टी की कमान संभाल ली.

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हालांकि इन आम चुनावों में आईपीएफ़टी को उतने वोट नहीं मिले जितना उसने सोचा था मगर संगठन की बुनियाद मज़बूत हो गयी.

वर्ष 2015 में हुए स्वायतशासी परिषद के चुनावों में भी आईपीफटी को कामियाबी नहीं मिली.

इसके बाद से आईपीएफ़टी टूटती चली गयी. कई नेता अलग हो गए और उन्होंने अपने अलग-अलग संगठन बना लिए.

मगर इस बार विधानसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन कर आईपीएफ़टी ने खुद को चुनावी दंगल में वापस पाया और वो भी काफी मजबूती के साथ.

पार्टी ने 6 सीटें जीतीं और एनसी देबबर्मा को लगता है कि भाजपा की जीत के पीछे आईपीएफ़टी के साथ गठबंधन की बड़ी भूमिका रही है.

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