क्या त्रिपुरा की तरह केरल में भी भाजपा ढहा देगी वाम क़िला?

  • 10 मार्च 2018
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कुछ लोग इस बात पर हंस सकते हैं तो कुछ इसे कभी नहीं मानेंगे. लेकिन हर कोई इस बात पर ज़रूर सोच विचार रहा है कि क्या त्रिपुरा वाली स्थिति केरल में संभव है.

केरल, अब भारत का इकलौता ऐसा राज्य रह गया है जहां वाम दलों की सरकार है.

भारतीय जनता पार्टी ने त्रिपुरा में जितनी ज़ोरदार जीत हासिल की है, उस पर तो भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों को भी सहसा यक़ीन नहीं हुआ होगा.

वामदलों के गढ़ के रूप में मशहूर त्रिपुरा में बीजेपी ने शून्य से शुरुआत करते हुए 35 सीटें जीत लीं.

बीजेपी ने राजनीतिक इतिहास बनाते हुए देश के ईमानदार और सादगी से रहने वाले मुख्यमंत्री माणिक सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

''त्रिपुरा से काफ़ी अलग है केरल''

त्रिपुरा के चुनाव परिणाम के चलते ही केरल में लोग इस बात पर सोचने को मज़बूर हो गए हैं कि क्या केरल का हाल भी त्रिपुरा जैसा संभव हो सकता है?

इस चिंता की एक पुख्ता वजह भी है, इस चुनाव से पहले त्रिपुरा में पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को महज 1.5 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि केरल के 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 15.20 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि 2011 के चुनाव में भी पार्टी को करीब नौ फ़ीसदी वोट मिले थे.

हालांकि केरल के बारे में हर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल में आबादी का सामाजिक गठजोड़ एकदम अलग तरह का है. यहां मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यक मिलकर आबादी का 48 फ़ीसदी हिस्सा बनाते हैं.

अल्पसंख्यक विरोधी छवि के बावजूद भारतीय जनता पार्टी का केरल के हिंदुओं पर भी बहुत असर नहीं दिखता क्योंकि ये आबादी धर्मनिरपेक्ष प्रकृति की है.

केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस विधायक रमेश चिनीताला ने बीबीसी हिंदी से बताया, ''मूलरूप में केरल त्रिपुरा से काफ़ी अलग है, यहां के लोग काफ़ी शिक्षित और राजनीतिक तौर पर जागरूक हैं."

कांग्रेस के धुर प्रतिद्वंद्वी और केरल के मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के सचिव कोडियेरी बालाकृष्णन कहते हैं, "केवल एलडीएफ़ ही मज़बूत नहीं है बल्कि राज्य यूडीएफ़ गठबंधन भी बेहद मज़बूत हैं."

चिनीताला के मुताबिक अगर लोग सीपीएम से ऊब जाएंगे तो कांग्रेस की तरफ़ देखेंगे, बीजेपी की ओर नहीं.

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''तीन तरफ़ा मुक़ाबला होगा''

दरअसल, केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और सीपीएम के नेतृत्व वाले (एलडीएफ़) गठबंधन का ही बीते चार दशक से शासन रहा है.

राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन बीबीसी हिंदी से कहते हैं, ''मलयाली लोगों में एंटी इनकंबैंसी इतनी ज़्यादा होती है कि लोग किसी को भी सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं.

लेकिन पांच साल बाद फिर से सत्ता में लौट सकते हैं इसलिए राजनीतिक दल भी मुस्तैद रहते हैं, इसी वजह से राज्य में बीजेपी तीसरी मज़बूत ताक़त के तौर पर भी उभर नहीं पाई है.''

लेकिन केरल बीजेपी में उत्साह की लहर देखने को मिल रही है. राज्य के वरिष्ठ बीजेपी नेता वी मुरलीधरन का दावा है, ''जब तक चुनाव आएंगे तब तक कांग्रेस और भी कमज़ोर हो जाएगी, कम से कम तीन तरफ़ा मुक़ाबला तो होगा.''

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मुरलीधरन कहते हैं, ''पिछले चुनाव में बीजेपी को सीपीएम के मतदाताओं में से अत्यंत पिछड़ा वर्ग और दलितों के वोट मिले थे, लेकिन सीपीएम की सरकार इसलिए बन पाई थी क्योंकि उन्हें कांग्रेस के मुस्लिमों के वोट मिले थे. पिछले कुछ सालों में राज्य के सवर्णों ने कांग्रेस की जगह हमें वोट देना शुरू किया है.''

वहीं भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के सहायक सचिव प्रकाश बाबू कहते हैं, ''अगर केरल में कांग्रेस कमजोर होती है तो हिंदू मतदाताओं के रूझान में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन इस वक्त राज्य में कांग्रेस उतनी कमजोर नहीं है जितनी पूर्वोत्तर में हो गई थी, लोगों को भी इस बात का एहसास है कि बीजेपी की नीतियों की बदौलत किस तरह से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चोट पहुंच रही है.''

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि राज्य में बीजेपी तीसरी सबसे मज़बूत ताक़त के तौर पर उभर क्यों नहीं पा रही है?

राधाकृष्णन कहते हैं, - राज्य के लोग तो दो गठबंधन की राजनीति से ऊब चुके हैं, राज्य का तेज़ी से बढ़ता मध्यवर्ग मतदाता चाहता है कि राज्य विकास की नई ऊंचाईयों तक पहुंचे लेकिन बीजेपी के पास भी अलग नज़रिए का अभाव है, ना तो केरल के लिए उनके पास कोई एजेंडा है और ना ही कोई नेतृत्व. लोगों के लिए बीजेपी, कांग्रेस और सीपीएम की तरह ही है.

कोडियरी बालाकृष्णन का दावा है, "पिछले चुनाव में 15 फ़ीसदी वोट के साथ बीजेपी तीसरी ताक़त ज़रूर थी, लेकिन आने वाले चुनाव में उन्हें इतना वोट भी नहीं मिलेगा."

कांग्रेस के मुरलीधरन को कर्नाटक में भी पार्टी की जीत की उम्मीद है, "आने वाले मई में जब हम कर्नाटक विधानसभा के अलावा राज्य चेनगन्नूर उपचुनाव में जीत हासिल करेंगे तो उसका असर देखने को मिलेगा."

वहीं बालाकृष्णन कहते हैं, "पहले भी, कर्नाटक में बीजेपी की सत्ता थी, तब यहां उनका कोई असर नहीं था. यहां कोई मोदी लहर नहीं है. अगले चुनाव में भी ऐसा ही रहेगा."

केरल यूनिवर्सिटी में इस्लामिक स्टडीज में अस्सिटेंट प्रोफ़ेसर अशरफ़ कडाक्कल कहते हैं, "सीपीएम और कांग्रेस अपनी अपनी विरासत में जी रहे हैं, वे सपना देख रहे हैं कि लोग या तो एलडीएफ़ को वोट करेंगे या यूडीएफ़ को. लेकिन आने वाले दशक में कुछ भी संभव है."

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अशरफ़ के मुताबिक बीजेपी ज़मीनी स्तर पर तेजी से कार्यकर्ताओं को तैयार कर रही है, गठबंधन राजनीति के दौर पर समुदायों को आकर्षित करना आसान हो गया है. बीजेपी के बड़े बड़े नेता अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं से मिल रहे हैं.

तिरुअनंतपुरम में टैक्सी चलाने वाले शामीर भी अशरफ़ की बातों से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. उन्होंने बताया, "क्या बताऊं, अगर हमारे गांव में किसी मुद्दे पर युवाओं के बीच झगड़ा हो जाए तो उसमें भी बीजेपी के लोग दख़ल देकर समस्या सुलझाने की कोशिश करते हैं, इसलिए युवाओं का कहना है कि वे लोग बीजेपी को वोट देंगे."

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