'कश्मीर में सेना की भूमिका को कम करने की सख़्त ज़रूरत'

  • 10 मार्च 2018
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भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि भारत प्रशासित कश्मीर के शोपियां में सेना की गोलीबारी में आम लोगों के मारे जाने के संबंध में दर्ज की गई एफ़आईआर रद्द की जानी चाहिए.

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने जनवरी में शोपियां में हुई गोलीबारी के संबंध में सेना के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की थी.

इस एफ़आईआर में मेजर आदित्य कुमार का नाम लिया गया था जो सेना की 10 गढ़वाल राइफ़ल्स की टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक शोपियां के एक गांव में सैनिकों ने एक छत पर काला झंडा लगा देखा था जिस पर इस्लामिक संदेश लिखा था.

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सैनिकों ने गांववालों से झंडा उतारने के लिए कहा था जिसे उन्होंने मना कर दिया था. इसी बात को लेकर सैनिकों और आम लोगों में झड़प हो गई थी. सेना की गोलीबारी में तीन लोग मारे गए थे.

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सेना की यूनिट के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की थी जबकि सेना की ओर से भी एक एफ़आईआर दर्ज करवाई गई थी.

पांच मार्च को मेजर आदित्य कुमार के पिता की ओर से दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने जम्मू-कश्मीर पुलिस से कहा था कि वो इस मेजर आदित्य कुमार के ख़िलाफ़ जांच आगे न बढ़ाए.

वहीं, केंद्र सरकार के एफ़आईआर रद्द करने के लिए कहने के बाद जम्मू-कश्मीर सरकार इस मामले पर क़ानूनी राय ले रही है. पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रवक्ता रफ़ी अहमद मीर ने बीबीसी से कहा, "अदालत के ऑर्डर पर सरकार क़ानून विशेषज्ञों से सलाह ले रही है और ज़रूरत पड़ने पर सरकार रिव्यू के लिए जा सकती है."

अब केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में एफ़आईआर रद्द किए जाने की सिफ़ारिश करने से कश्मीर में मानवाधिकारों का सवाल एक बार फिर खड़ा हो गया है.

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह कहती हैं, "ऐसे किसी भी मामले में जिसमें आम नागरिक की मौत हुई हो उसमें एफ़आईआर दर्ज करना अनिवार्य है. क़ानून कहता है कि यदि गोली चलाने से किसी की मौत हुई है तो एफ़आईआर दर्ज होनी चाहिए भले ही गोली किसी पुलिस या सेना के अधिकारी ने चलाई है. अगर गोली आत्मरक्षा में चलाई गई है तो ये जांच में स्थापित हो जाएगा और इसके लिए भी क़ानून है, लेकिन एफ़आईआर तो दर्ज होनी ही चाहिए."

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इंदिरा जयसिंह आगे कहती है, "चाहे कश्मीर हो या कोई और जगह हो किसी अधिकारी के पास आम लोगों पर गोली चलाने का विशेषाधिकार नहीं है. यदि गोली चलाना ज़रूरी है तो उसमें भी बहुत सी बातों का अहतियात रखना होता है. मैनुअल में लिखा है कि पहले चेतावनी दी जानी चाहिए और फिर गोली पैरों की ओर चलाई जानी चाहिए. यदि सीधी गोली चलाई जाएगी तो हालात ख़राब होंगे और लोगों का प्रशासन से विश्वास उठ जाएगा जिसका मानवाधिकारों पर नकारात्मक असर पड़ेगा."

वहीं, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण का मानना है कि सेना की इस तरह की कारर्वाइयों से आम लोगों का विश्वास उठ रहा है.

भूषण कहते हैं, "कश्मीर के लोगों को ये लगता है कि सेना और अर्धसैनिक बलों ने कई तरह से मानवाधिकारों का हनन किया. बलात्कार, गोलीबारी में आम नागरिकों की मौत और कई तरह के उत्पीड़न के मामले सामने आए लेकिन सेना के दोषी अधिकारियों पर कभी क़ानूनी कार्रवाई नहीं की गई. सरकार का तर्क है कि यदि सेना को छूट नहीं दी गई तो क़ानून व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती. लेकिन इसके लिए सेना के पास पहले से ही सेल्फ़ डिफ़ेंस का तर्क है. आत्मरक्षा में चलाई गई गोली या उत्तेजक भीड़ पर चलाई गई गोली के मामले में सेना को पहले से ही सुरक्षा प्राप्त है. एफ़आईआर तो ऐसे ही मामले में दर्ज की जाती है जिसका कोई क़ानूनी बचाव नहीं है. "

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भूषण कहते हैं, "कश्मीर में कम से कम चालीस ऐसे मामले सामने आए हैं जब राज्य पुलिस ने सेना के आत्मरक्षा के तर्क को नकारते हुए अधिकारियों को दोषी पाया लेकिन फिर भी केंद्र सरकार की ओर से मुक़दमा चलाने की अनुमति नहीं मिली. इसकी वजह से सेना में ये भावना प्रबल हो रही है कि हम कुछ भी कर सकते हैं और दूसरी ओर आम लोगों में ये ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है कि यहां पर सेना भेजकर हर तरह से मानवाधिकारों का हनन करवाया जा रहा है और किसी की कोई जवाबदेही नहीं है. "

वहीं, अपने सैन्य करियर का बड़ा हिस्सा कश्मीर में बिताने वाले रिटायर्ड मेजर जनरल अफ़सिर करीम का मानना है कि कश्मीर में सरकार को सेना की भूमिका कम कर पुलिस की भूमिका को बढ़ाना होगा, हालांकि ये बहुत मुश्किल काम है.

अफ़सिर करीम कहते हैं, "सेना को अंधाधुंध गोलीबारी का कोई आदेश नहीं है. सेना जितना ज़रूरी होता है उतनी ही गोलियां चलाती है और सिर्फ़ उन्हीं लोगों पर चलाती है जो उन पर हमला कर रहे होते हैं. यदि कोई सैनिक व्यक्तिगत ग़लती करता है या किसी से उलझ जाता है या झगड़े में पड़ जाता है तो ये अलग बात है. सेना को जब नागरिक क्षेत्रों में लगाया जाता है तो कुछ न कुछ ज़्यादती ज़रूर हो जाती है. लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सेना की ओर से जानबूझकर किया गया है?"

अफ़सिर करीम कहते हैं, "कश्मीर में इस समय हमारी सेना के लिए हालात बेहद मुश्किल हैं. इस समय आम लोगों में सेना के लिए अलगाव की भावना बहुत ज़्यादा है. आम लोग सेना पर हमला करने के लिए या सेना को नीचा दिखाने के लिए तैयार हैं. "

सरकार को सलाह देते हुए करीम कहते हैं, "बेहतर होगा सरकार अगर सेना की उपस्थिति कम कर दे और ये काम पुलिस को दे दे. लेकिन ये बहुत मुश्किल काम है और इसमें समय लगेगा."

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करीम ये भी मानते हैं कि सेना के प्रति बढ़ रहे अलगाव की भावना के पीछे पाकिस्तान भी है. वो कहते हैं, "पाकिस्तान इन हालातों का फ़ायदा ले रहा है. वो चाहता है कि सेना की जितनी गोलीबारी होगी और जितने लोग मरेंगे उतने लोग भारतीय सेना और भारत के ख़िलाफ़ हो जाएंगे और अलगाववाद और बढ़ेगा. पाकिस्तान के इस दांव से भारत को कोई नई और ठोस नीति बनाकर निपटना होगा."

करीम कहते हैं, "भारतीय सेना को जितना मैं जानता हूं उसके आधार पर कह सकता हूं कि फ्रंट पर तैनात सैनिकों को किसी नागरिक को मारने में कोई दिलचस्पी नहीं है. लेकिन जब सेना शहरों में आती है तो कई बार घटनाएं हो जाती हैं. ऐसा न हो इसके लिए सरकार को नीति बनानी होगी. कश्मीर को लेकर नीति राजनीतिक स्तर पर बननी चाहिए और सेना का इस्तेमाल कम से कम होना चाहिए. किसी की सलाह से सरकार को फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि वो अपनी नीति कुछ और देख कर बनाते हैं. लेकिन भारतीय सेना के एक सैनिक के तौर पर मैं ये ही कहूंगा कि कश्मीर में सेना की मौजूदगी कम कर दें और राजनीतिक स्तर पर प्रयास तेज़ कर दें."

श्रीनगर से स्थानीय पत्रकार माजिद जहांगीर का कहना है कि इस तरह की घटनाओं के बाद कश्मीर में आम जनता में ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है.

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जहांगीर कहते हैं, "जब भी कश्मीर में ऐसे मामले पेश आते हैं तब कश्मीर के आम लोगों में गुस्सा भड़कता है. लेकिन जब सरकार घटनाओं में आरोपी सुरक्षाबलों को बचाने की कोशिश करती है या क़ानूनी कार्रवाई में रुकावटें पैदा करने की कोशिश करती है तो आम लोगों को महसूस होता है कि उनके ज़ख़्मों पर नमक छिड़का जा रहा है. शोपियां की घटना में सेना के ख़िलाफ़ एफ़आईआर के बाद लोग उम्मीद कर रहे थे कि सेना के जवानों पर कार्रवाई होगी."

जहांगीर कहते हैं, "लेकिन केंद्र सरकार के मेजर आदित्य के ख़िलाफ़ दर्ज एफ़आईआर को रद्द करने की मांग करने के बाद स्थानीय लोगों का मानना है कि कश्मीर में सरकार ने सेना को आम लोगों को मारने की खुली छूट दे रखी है. हैरानी की बात ये है कि बीते 20 सालों में जब भी सेना की गोलीबारी में आम लोगों के मारे जाने के मामले सामने आए हैं, सरकार ने सुरक्षाबलों पर मामला चलाने की अनुमति नहीं दी है. इससे भी अलगाववाद बढ़ रहा है."

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