किम और ट्रंप मिलेंगे तो इन चुनौतियों का क्या होगा?

  • 11 मार्च 2018
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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन के बीच होने वाली ऐतिहासिक मुलाक़ात के बारे में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं.

इस मुलाक़ात को दोनों देशों की कूटनीति में एक अहम पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि कई दशकों के प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरिया के शक्तिशाली परमाणु कार्यक्रम पर किसी तरह की रोक नहीं लग पाई है.

उत्तर कोरिया और अमरीका के राष्ट्राध्यक्षों के बीच होने वाली इस ऐतिहासिक मुलाक़ात में परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा तो सबसे ऊपर रहने की उम्मीद है ही लेकिन इसके साथ और भी कई चुनौतियां इस मुलाक़ात में दोनों नेताओं के सामने खड़ी रहेंगी.

एक नज़र उन चुनौतियों परः

उत्तर कोरिया एक 'सामान्य राष्ट्र'

दोनों देशो के नेता जब आमने-सामने बैठेंगे तो उनका आपस में एक-दूसरे के देशों के प्रति क्या नज़रिया है, यह एक बड़ा मुद्दा रहेगा.

आज तक एक भी अमरीकी राष्ट्रपति ने उत्तर कोरिया का दौरा नहीं किया है और ना ही उत्तर कोरियाई नेता से कभी सीधी मुलाक़ात की है. हालांकि पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर और बिल क्लिंटन विशेष प्रतिनिधि के तौर पर प्योंगयांग का दौरा ज़रूर कर चुके हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति का आज तक उत्तर कोरिया का दौरा ना करने के पीछे एक बड़ी वजह है कि अमरीका उत्तर कोरिया को मानव अधिकारों का उल्लंघन करने वाला, तानाशाही वाला और चरमपंथियों का समर्थन करने वाला राष्ट्र मानता आया है.

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जबकि उत्तर कोरिया लंबे वक्त से ये मांग करता रहा है कि उसे एक सामान्य राष्ट्र की तरह पहचाना जाए. यही बात उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन ने दक्षिण कोरिया के विशेष दल से भी कही, उन्होंने कहा, ''मैं चाहता हूं कि मेरे साथ एक संजीदा वार्ताकर साथी के तौर पर व्यवहार किया जाए.''

किम जोंग उन इस मुलाक़ात के ज़रिए दुनियाभर में अपनी पहचान एक स्थापित नेता के तौर पर बनाना चाहते हैं. ऐसी पहचान ना तो राष्ट्रपति किम इल सुंग को प्राप्त हुई और ना ही किम जोंग इल को.

अमरीकी कूटनीति का नेतृत्व किसके हाथ?

दोनों देशों के नेताओं के बीच होने वाली इस मुलाक़ात की एक खूबसूरत तस्वीर तो उभरती हुई नज़र आ रही है लेकिन मूल समस्या का समाधान निकलता नज़र नहीं आ रहा.

अगर मुलाक़ात और बातचीत के दौर के बाद भी इस बैठक का कोई ठोस परिणाम सामने निकलकर नहीं आता है तो यह सिर्फ एक तरह से हल्की-फुल्की मुलाक़ात बनकर रह जाएगी.

अभी तक अमरीका की तरफ से ऐसा कोई चेहरा नज़र नहीं आया है जो उत्तर कोरिया के सामने ठोस तरीके से अपनी कूटनीति का नेतृत्व कर सके.

कोरिया में अमरीका के राजदूत का पद पछले एक साल से भी लंबे समय से खाली पड़ा है. वहीं जोसेफ यून जिन्हें उत्तर कोरियाई नीतियों के लिए विशेष तौर पर नियुक्त किया गया, उन्होंने पिछले महीने ही अपनी रिटायरमेंट की घोषणा कर दी है.

'परमाणु-निशस्त्रीकरण' को कैसे परिभाषित किया जाएगा?

'परमाणु निशस्त्रीकरण' को परिभाषित करने के वैसे तो कई तरीके हैं. रोह ते वू की सरकार ने 1992 में 'कोरियाई प्रायद्वीप के लिए परमाणु निशस्त्रीकरण की संयुक्त घोषणा' के वक़्त कहा था कि कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु निशस्त्रीकरण का मतलब होगा उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया दोनों में परमाणु हथियारों को नष्ट करना.

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1991 तक अमरीका ने यूएसएफ़के (कोरिया में अमरीकी सेना) के तौर पर कोरिया में सामरिक परमाणु हथियारों को तैनात किया. उसके बाद अमरीका ने कोरिया से सामरिक परमाणु हथियार हटा लिए.

हालांकि दक्षिण कोरिया के पास अपने कोई परमाणु हथियार नहीं है, और उत्तर कोरिया हमेशा परमाणु निशस्त्रीकरण का विरोध करता रहा है. उसका कहना है कि इसकी वजह से एयरक्राफ्ट बॉम्बर और बी-52 और बी2 जैसे बमों को ले जाने वाली पंडुबब्बियां आदि एकजुट हो जाएंगी.

वहीं इस मुलाक़ात में उत्तर कोरिया अपनी सीमा के पास अमरीका सेना की टुकड़ी और परमाणु हथियारों की मौजूदगी का मुद्दा भी उठाना चाहेगा.

उत्तर कोरिया की लेबर पार्ट के एक अखबार ने भी लिखा है कि दुनिया से परमाणु निशस्त्रीकरण का मसला बहुत ही आसानी से निपटाया जा सकता है अगर अमरीका अपने परमाणु हथियारों को नष्ट कर दे.

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ट्रंप और किम जॉन्ग की तू तू-मैं मैं

परमाणु निशस्त्रीकरण की पहचान कैसे होगी?

उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों को नष्ट करने के लिए पहले भी कई प्रयास किए जा चुके हैं. साल 1994 में जेनेवा समझौते में तो यह काफी हद तक कामयाब होने के करीब पहुंच गया था.

उस समय उत्तर कोरिया को उसके परमाणु रिएक्टर को बंद करने की बजाय उसके ज़रिए बिजली सप्लाई और हैवी फ्यूल तेल का निर्माण करने की बात कही गई थी. लेकिन इस समझौते के बाद भी समस्या जस की तस बनी रही क्योंकि उत्तर कोरिया ने परमाणु निरिक्षण में सहयोग नहीं दिया.

आम सहमति बन जाने के बावजूद भी इस समझौता का कोई मतलब नहीं रह गया, क्योंकि इसे लागू करने पर कई तरह के विवाद पैदा होते रहे और अंत में इस समझौते का विनाशकारी अंत हो गया.

आम सहमति तक पहुंचने की प्रक्रिया बहुत ही लंबी है लेकिन उसे लागू करना उससे भी बड़ी चुनौती है.

क्या कोरिया से अमरीकी सेना वापस जाएगी?

उत्तर कोरिया कोरियाई प्रायद्वीप में अमरीकी सेना की मौजूदगी का मुद्दा भी उठाना चाहेगा. उत्तर कोरिया पिछले लंबे समय से इसका विरोध करता रहा है.

लेकिन दक्षिण कोरिया से अमरीकी सेना का हटना बहुत आसान नहीं है और यह इस बैठक में हो जाए इतनी सरल बात भी नहीं.

वहीं दक्षिण कोरिया चाहेगा कि अमरीकी सेना उनके क्षेत्र में मौजूद रहे जिससे कोरिया और अमरीका के बीच बेहतर रिश्ते बरकरार रहें.

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अगर दूसरी तरफ चीन की बात की जाए तो वह एशिया- प्रशांत क्षेत्र से अमरीका की मौजूदगी को दूर करना ही चाहेगा.

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