फ़्रांस से इस तरह जुड़े हैं टीपू सुल्तान

  • 13 मार्च 2018
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फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत आए हुए हैं और दोनों देश बार-बार अपने संबंधों की गहराई को ज़ाहिर कर रहे हैं.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक संबोधन में कहा था कि भारत और फ़्रांस ज़मीन, जल, वायु और अंतरिक्ष के ज़रिए जुड़े हुए हैं.

कोई भी इस पर पलट कर पूछ सकता है कि इसमें नया क्या है?

लेकिन, इतिहास में जाकर देखें तो भारत और फ़्रांस के बीच संबंधों की एक और कड़ी दिखती है.

ये कड़ी 251 साल पहले जब भारत रियासतों में बंटा हुआ था तब की मैसूर की रियासत और उसके शासक टीपू सुल्तान से जुड़ी हुई है.

असल में, मैसूर के साथ फ़्रांस के रिश्ते टीपू सुल्तान के समय शुरू नहीं हुये थे बल्कि इसका प्रारंभ टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली से हुआ था.

हैदर अली ने फ़्रांस में क़ैद आरकोट के नवाब मोहम्मद अली को छुड़ाने के लिए 1767 में इन संबंधों की शुरुआत की थी.

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कैसे आए फ़्रांस के क़रीब

मोहम्मद अली से मिले एक संदेश के बाद हैदर अली को वहां भेजा गया था.

मोहम्मद अली ने हैदर अली से वादा किया था कि उन्हें छुड़ाने पर वह तिरुचिरापल्ली का क़िला हैदर अली को दे देंगे.

लेकिन, हैदर अली को जब पता चला कि मोहम्मद अली क़िला देने वाली अपनी बात पर क़ायम नहीं रहेंगे तो वह फ़्रांसीसियों के क़रीब आ गये.

कर्नाटक और गोवा के दो विश्वविद्यालयों और टीपू सुल्तान पर एक प्राधिकरण के पूर्व उपाध्यक्ष प्रोफ़ेसर बी शेख अली ने कहा, ''इस तरह संबंधों की शुरुआत हुई थी. उनके बीच दोस्ती गहरी हो गई थी. इसका सीधा सा कारण एक सिद्धांत था कि दुश्मन का दुश्मन, दोस्त होता है.''

प्रोफ़ेसर अली बताते हैं, ''उन्होंने बहुत घनिष्ठ राजनीतिक, सैन्य और बौद्धिक संबंध बनाए. उनका एक जैकोबिन क्लब भी था और टीपू सुल्तान उसके विपक्ष थे. उन्होंने इस फ़्रांसीसी क्रांतिकारी विचार की घोषणा की कि समान रूप से पैदा हुए पुरुषों की समान पत्नियां होनी चाहिए. उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की बात कही.''

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टीपू चेयर, मैसूर विश्वविद्याल में विजिटिंग प्रोफ़ेसर सेबेस्टीयन जोसेफ़ ने कहा, ''टीपू सुल्तान ने फ़्रांसीसी भाषा सीखी थी और फ़्रांसीसी अधिकारियों से उन्हीं की भाषा में बात करते थे. वह लोकतांत्रित सिद्धांतों की बात भी करते थे.''

इतिहासकार टी सी गौड़ा कहते हैं, ''उन्होंने करनल बैली को पकड़ा जो उस समय ज़िंदा पकड़े जाने वाले ब्रिटेन के पहले अधिकारी थे. लेकिन, वो 1782 का दौर था जिसे टीपू सुल्तान का सुनहरा काल माना जाता है.''

टी सी गौड़ा आगे बताते हैं, ''टीपू ने पांच नगर बसाये, श्रीरंगपटना, मैसूर, बेंगलुरु, चित्रादुर्ग और बिदनूर. यह उसके औद्योगिक क्षेत्र थे.''

फ़्रांस से तकनीकी सहयोग

''टीपू सुल्तान फ़्रांस में एक दूतावास बनाना चाहते थे और उनसे तकनीकी सहयोग चाहते थे. उन्होंने तीन सदस्यों का एक प्रतिनिधिमंडल फ़्रांस भेजा था जिसमें दरवेस ख़ान, अब्बास ख़ान और गुलाम अली शामिल थे. टीपू सुल्तान के साफ़-साफ़ निर्देश थे कि तकनीकी जानकारी वाले लोगों को उनके मांगी गई क़ीमत से दोगुनी क़ीमत पर लाओ.''

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गौड़ा कहते हैं कि यह तकनीकी कुशलता ही थी जिसके कारण कावेरी नदी पर 1789 में झूलता हुआ पुल बन पाया.

फ़्रांसीसियों ने उस समय लौहा और इस्पात मिलाने की तकनीक विकसित कर ली थी.

तब पुल से काफ़ी प्रभावित होने के बाद टीपू सुल्तान ने कावेरी पर बांध बनाने की नींव डाली थी.

जोसेफ़ ने बताया, ''फ़्रांसीसी सेना के कई लोग टीपू सुल्तान की सेना को प्रशिक्षण भी देते थे. उन्होंने फ्रेंच रॉक्स नाम से एक कॉलोनी भी बनाई थी जिसे अब पांडवपुरा कहते हैं.''

अली कहते हैं, ''फ़्रांसीसियों की ही मदद से उस समय चीनी का रंग सफेद किया गया था. ​श्रीरंगपटना से तीन किमी. दूर पलाहल्ली में एक चीनी मिल लगाई गई थी.''

इतिहासकार यह भी कहते हैं कि टीपू सुल्तान की ताक़त बढ़ाने वाली तोपें भी फ़्रांसीसियों के सहयोग से बनाई गई थीं. बी शेख अली के मुताबिक़, उन्होंने उस समय किसी जल स्रोत से बोरिंग के जरिए धातु निकालने की कला सीख ली थी.

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अली का कहना है कि हैदर अली राजनीतिक रूप से कुशल और सैन्य रूप से मजबूत थे.

टीपू ने सिर्फ़ अपने पिता की राजनीतिक रणनीति का पालन किया. वह राजनीतिक रूप से कुशल नहीं थे. वह बहुत भावुक थे.

हैदर अली की राजनीतिक चतुराई इसमें देखी जा सकती है कि उन्होंने 'फूट डालो और शासन करो' की ब्रिटिश नीति का कितनी कुशलता से इस्तेमाल किया था.

उन्होंने एक-दूसरे को लड़ाकर यूरोपीय लोगों पर इसे इस्तेमाल किया था.

जोसेफ़ के मुताबिक़, नेपोलियन ने टिपू सुल्तान को लिखा था कि उनकी अजेय सेना अंग्रेजों से लड़ने के लिए भारत आएगी. लेकिन, फ़्रांसीसियों की भारत में दिलचस्पी ख़त्म हो चुकी थे क्योंकि यह सब फ़्रांसीसी क्रांति की पूर्व संध्या पर हुआ था.''

गौड़ा ने फ़्रांस के गैजेट से बताया कि फ़्रांस के राजा लुई सोलहवें की पत्नी लेडी एन्टोएनेट हैदर अली से मिलने के लिए काफ़ी उत्साहित थीं. वह हैदर अली की एक पेंटिंग भी चाहती थी जिसे बाद में उन्होंने अपने बेडरूम में लगाया.

यह 1798 में हुआ था जिसके छह साल बाद अली की मौत हो गई.

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