नज़रियाः जुमलों से 2019 का चुनाव नहीं जीता जा सकता!

  • 15 मार्च 2018
उत्तर प्रदेश उपचुनाव में भाजपा की हार इमेज कॉपीरइट Getty Images

देश के दो राज्यों-यूपी और बिहार की तीन बेहद महत्वपूर्ण संसदीय सीटों के उप चुनाव में भाजपा की ऐसी बुरी पराजय का अनुमान शायद ही किसी ने लगाया हो!

स्वयं विपक्षी खेमा भी अपनी इतनी शानदार जीत को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं था. त्रिपुरा की शानदार जीत के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा काफ़ी उत्साहित थी और यूपी में मोदी-योगी की जोड़ी अब तक अपराजेय दिख रही थी.

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पाला बदल कर भाजपा के साथ सरकार बनाने और लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद सत्ताधारी गठबंधन और विपक्षी-राजद के बीच यह पहली चुनावी टक्कर थी. दो राज्यों की तीन संसदीय सीटों के उप चुनाव में भाजपा की करारी हार हुई और विपक्षी प्रत्याशी भारी मतों के अंतर से जीते.

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विपक्ष को एकता की नई ज़मीन मिली

भले ही ये उप चुनाव थे पर जिस सियासी समीकरण और पृष्ठभूमि के बीच ये संपन्न हुए, इन्हें सामान्य उप चुनाव नहीं समझा जाना चाहिए. अतीत के कुछ अहम् उप-चुनावों की तरह ये राष्ट्रीय राजनीति के नये समीकरण के प्रस्थान-बिन्दु साबित हो सकते हैं.

विपक्षी राजनीति के संदर्भ में इन चुनावों ने एकता की नई ज़मीन तलाशी है, जिसमें नेता या दल से ज्यादा उनके सामाजिक-आधार सक्रिय दिखे. फूलपुर और गोरखपुर में जैसे-जैसे सपा प्रत्याशी की जीत तयशुदा नज़र आने लगी, मतगणना केंद्र के बाहर सपा और बसपा के झंडे साथ-साथ लहराते नजर आए.

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बुआ-भतीजा (मायावती-अखिलेश) ज़िंदाबाद जैसे नारे गूंजने लगे. यूपी की दोनों सीटों पर विपक्ष की जीत अगर भाजपा नेतृत्व और खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य को गहरी मायूसी देती है तो मायावती और अखिलेश को भावी एकता का ठोस आधार मुहैय्या कराती है.

इस जीत-हार को सिर्फ़ कुछ व्यक्तियों, नेताओं और दलों के मत्थे मढ़ना भी ठीक नहीं होगा. इसमें समाज, समुदाय और सियासत बराबर के हिस्सेदार हैं.

उम्मीदवार, नेता और दल के साथ इस चुनाव में सत्ता-संरचना में विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व, क़ानून-व्यवस्था से जुड़े कई अहम सवाल, रोज़गार-कारोबार, मंदिर-मस्जिद के मसले, आईएसआई, गोरक्षा, लव-जेहाद और जीएसटी समेत बहुत सारे सवाल उभर कर सामने आए.

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मुठभेड़ की राजनीति को नकारा गया

यूपी में अगर क़ानून-व्यवस्था को दुरूस्त करने के नाम पर मुठभेड़ और हत्याओं का अंतहीन सिलसिला शुरू किया गया तो बिहार के सीमांचल में भाजपा के बड़े नेता खुलेआम सार्वजनिक मंचों से ऐलान कर रहे थे कि विपक्ष के जीतने का मतलब होगा इस इलाके को पाकिस्तानी एजेंसी-आईएसआई का गढ़ बनाना.

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यूपी में मुठभेड़ के नाम पर मारे जा रहे लोगों में नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग थे. इनमें कुछ पूरी तरह निर्दोष तो कुछ आपराधिक पृष्ठभूमि के भी थे. पर न्यायालय से फ़ैसला होने के पहले ही पुलिस के साथ मुठभेड़ दिखाकर अभियुक्तों को मार डालने की ऐसी ख़तरनाक मुहिम से यूपी के लोग पहले से वाकिफ थे.

इसी तरह सरकार की अर्थनीति के चलते रोज़गार के लगातार सिमटने से ऐसे समुदायों में ज़्यादा बेचैऩी थी. बहुत सारे सरकारी संस्थानों में दलित-पिछड़ों के आरक्षण में खुलेआम धांधली के बड़े-बड़े पर्दाफ़ाश हुए. ठेका और तमाम तरह के कामों में कुछ खास लोगों को ही लाभ पहुंचाने का संदेश दूर-दूर तक जा चुका था. यहां तक कि सवर्ण समुदाय की कुछ जातियां भी इससे क्षुब्ध थीं.

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नेताओं से अधिक आक्रोश जनमानस में

पूर्वांचल में खासकर सबल्टर्न समुदायों में ऐसे तमाम सवालों को लेकर मौजूदा सरकार और भाजपा के प्रति गहरा आक्रोश था. दरअसल, विपक्षी नेताओं से ज़्यादा आक्रोश आम लोगों में था.

उप चुनाव ने ऐसे तमाम लोगों को मौका दे दिया. नेताओं से ज़्यादा सक्रिय और उग्र होकर लोगों ने भाजपा को हराने की मुहिम में अपने को झोंक दिया.

बसपा सुप्रीमो मायावती ने जिस दिन 'भाजपा को हराने वाले सबसे मज़बूत विपक्षी उम्मीदवार को जिताने' का अपने समर्थकों का आह्वान किया, उसी वक्त दोनों सीटों के चुनावी समीकरण तय हो गए और यह बात लगभग तय हो गई कि भाजपा के लिए यह दोनों सीटें बेहद मुश्किल हो जाएंगी.

मीडिया के ज़्यादा टिप्पणीकार 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों की रोशनी में साबित करने में जुटे रहे कि सपा और बसपा को मिले वोटों का जोड़ भाजपा के वोट से बहुत कम है. ऐसे में भाजपा अपराजेय बनी रहेगी.

लेकिन ऐसे टिप्पणीकारों ने न तो इन दोनों क्षेत्रों के तहत आने वाली विधानसभाई सीटों के 2017 के आकड़ें देखे और न ही इस तथ्य पर गौर किया कि चार साल की मोदी सरकार और एक साल की योगी सरकार से लोगों में इकट्ठा हो रही नाराज़गी का इस चुनाव पर क्या असर हो सकता है!

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यह जीत मजबूत विपक्षी लामबंदी का सबूत

गोरखपुर में भाजपा की हार को जो लोग सत्ताधारी पार्टी की अंदरूनी खेमेबाजी का नतीजा बताने में लगे हैं, वे विपक्ष की मज़बूत लामबंदी और पिछड़ों-दलितों-अल्पसंख्यकों की नई उभरती एकता के ठोस तथ्य को नज़रंदाज करने की ग़लती कर रहे हैं.

निश्चय ही भाजपा में कुछ अंतर्कलह दिखी पर चुनावी हार की वह मुख्य वजह नहीं. असल वजह है विपक्षी जनधारों का बड़ा जुटान.

अगर यह जुटान और लामबंदी बड़ा और स्थायी आधार ले लेती है तो 2019 में मोदी-शाह के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है.

यूपी में लोकसभा की 80 सीटें हैं. इसलिए सपा-बसपा की एकता बहुत मायने रखेगी.

दोनों सीटों के उप चुनाव में समाज और जनाधार के बीच जो लामंबदी हुई है, उसने सपा और बसपा के बीच एकता के लिए ठोस तर्क और आधार दे दिया है.

जहां तक बिहार के अररिया में राजद की जीत का सवाल है, यह उसकी अपनी सीट थी. लेकिन नीतीश-भाजपा गठबंधन के नये सत्ता-माहौल और लालू की गैरमौजूदगी में भी फिर से राजद का कामयाब होना बड़ी घटना है.

भाजपा ने यहां मंदिर-मस्जिद, पाकिस्तान-आईएसआई जैसे न जाने कैसे-कैसे जुमले उछाले पर संभवतः लोगों पर इन जुमलों का ज़्यादा असर नहीं पड़ा. यूपी की तरह यहां भी मतों के बड़े अंतर से विपक्ष को कामयाबी मिली.

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