कांशीराम के जैसा कोई कद्दावर दलित नेता आज नहीं?

  • 15 मार्च 2018
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भारत में सबसे पहले बाबासाहेब भीम राव आंबेडकर ने दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की वकालत की. लेकिन जिस एक दलित नेता ने उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए भारतीय राजनीति और समाज में एक बड़ा परिवर्तन लाने वाले की भूमिका निभाई वो हैं कांशीराम.

लेकिन दलितों की सामाजिक स्थिति और उनके उत्थान को लेकर कांशीराम की जो सोच थी क्या आज के नेता उनके जैसा नज़रिया नहीं रखते?

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कांशीराम का आधा काम ही कर रही हैं मायावती

कांशीराम की जीवनी लिख चुके बद्री नारायण कहते हैं, "कांशीराम की विचारधारा आंबेडकर की विचारधारा का ही एक नया संस्करण है."

वो कहते हैं, "हिंदी क्षेत्र में जो सियासी व्यवस्था और उसका संचालन है उन्होंने उसे बहुत गहराई से महसूस किया था और इसमें बदलाव का रास्ता निकाला था कि राज्य की सत्ता पर काबिज होकर जनता का विकास करना और इसके ज़रिए सामाजिक बदलाव लाना."

बद्री नारायण कहते हैं कि कांशीराम की मौत के बाद उनकी विचारधारा के मुताबिक मायावती सत्ता पर काबिज होने की लड़ाई तो लड़ रही हैं लेकिन सामाजिक बदलाव का काम उनसे छूटता जा रहा है. यानी आधा काम वो कर रही हैं बाकी का आधा काम दलित आंदोलन में लगे अन्य संगठनों को करना है.

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दलितों की स्थिति क्या है?

भारत की आबादी के करीब 16.6 फ़ीसदी दलित हैं और इनमें से करीब आधे, चार राज्यों उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और तमिलनाडु में रहते हैं. पूरे देश के कुल दलितों का पांचवा हिस्सा यानी 20 फ़ीसदी के करीब उत्तर प्रदेश में रहते हैं. लेकिन उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में बहुत बदलाव नहीं आया है.

बद्री नारायण कहते हैं, "दलितों की स्थिति में इतना परिवर्तन जरूर आया है कि एक मध्यमवर्ग विकसित हो गया है. सत्ता, प्रजातंत्र के जो फ़ायदे हैं वो दलितों के एक वर्ग तक पहुंचा है और वो शक्तिमान हुआ है. लेकिन ज़्यादातर दलितों का एक बड़ा भाग अभी भी पिछड़ा और दमित है. उनका सशक्तिकरण होने की जरूरत है."

इसके उलट कुछ जानकार यह कहते हैं कि आज कांशीराम की विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम अगर कोई कर रहा है तो वो सिर्फ और सिर्फ मायावती हैं, कोई दूसरा दलित नेता उनका नाम लेने से भी कतराता है.

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बहुजनवाद की संरचना

कांशीराम ने बहुजनवाद की संरचना की. उन्होंने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग को मिलाकर जो युग्म बनाया वो भारतीय राजनीति के लिए एक नवीन प्रयोग था.

विवेक कुमार कहते हैं, "उन्होंने दूसरे वंचित समाज को बताया कि आपका वोट प्रतिशत 85 फ़ीसदी है और 15 फ़ीसदी वाले राज कर रहे हैं. तो यह एक नवीन प्रयोग था. नवीन नारे थे. और लोगों को आंदोलित करने की एक नवीन प्रक्रिया थी. एक कैडर था."

वो कहते हैं, "आरएसएस और लेफ्ट पार्टी की तरह उन्होंने बहुजन, दलित आंदोलन में कैडर परम्परा की शुरुआत की. वो कैडर, वो बामसेफ़ अभी मरा नहीं है. लगातार वो अंबेडकरवाद की लकीर खींचे हुए है. और यूपी उपचुनाव में जीत एक बड़ा संदेश है कि अगर आज कोई भाजपा या संघ से लड़ सकता है तो वो यही कैडर है. यह कांशीराम का बहुत बड़ा योगदान है."

बहुजन विचारधारा

कांशीराम के समय बहुजन समाज को लेकर जो विचारधारा थी उसमें कितना बदलाव आया है?

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर विवेक कुमार कहते हैं, "बहुजन विचारधारा वही है, आंदोलन वही है. लेकिन अगर आप राजनीति को देखेंगे तो कांशीराम कहा करते थे कि 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी', एक प्रजातांत्रिक राजनीति के तहत सभी समाजों के वर्गों का उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व होना चाहिए और वही मायावती कर रही हैं."

वो कहते हैं, "जब वो पिछड़े वर्ग या मुस्लिमों को टिकट देती हैं तो कोई नहीं बोलता लेकिन ब्राह्मणों को टिकट दे दें तो सब को यह ब्राह्मणवाद लगता है. जबकि यह 'जितनी संख्या, उतनी हिस्सेदारी' की अवधारणा के अनुसार है."

वो कहते हैं, "बाहर बैठे कुछ राजनीतिक पंडितों की भाषाशैली कहीं न कहीं बहुजन समाज के पक्ष की नहीं विपक्ष के जैसी होती है. किस प्रकार वो खोट निकालें, उसे कैसे खंडित करें, उसे नकारात्मक कैसे दिखाएं यह उनकी भाषाशैली में दिखता है. यही कारण है कि मायावती आज कांशीराम की दिखाये रस्ते पर नहीं चल रही हैं ऐसा दिखाई पड़ता है."

वो मायावती की दूरदर्शिता की तारीफ में कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में राजनैतिक दूरदर्शिता के अंतर्गत बहनजी ने अपने मतदाताओं को केवल यह कहा है कि आप पार्टी को वोट ट्रांसफर कर दीजिए. यह अपने आप में भारतीय राजनीति की पराकाष्ठा कही जाएगी जिसमें केवल इशारों के साथ साथ 100 फ़ीसदी वोट ट्रांसफर होते हैं. क्या भारत में कोई राजनीतिक दल ऐसा दावा कर सकता है?"

वहीं बद्री नारायण कहते हैं कि आज कुछ दलित हिंसा की राजनीति में भी शामिल हो रहे हैं. वो कहते हैं, "कांशीराम अतिवाद का विरोध करते थे. वो कभी भी उग्रवादी चेतना से लैस नहीं थे. दलितों से कहते थे कि हिंसा के रस्ते पर मत जाओ. लेकिन आज कुछ दलित हिंसा के रस्ते पर भी जाते हैं जो कांशीराम की विचारधारा नहीं थी."

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कांशीराम को भारतरत्न क्यों नहीं?

कांशीराम की विचारधारा को क्या आज का कोई दलित नेता आगे बढ़ाने का काम कर रहा है.

विवेक कुमार कहते हैं, "मायावती के सिवा आज का कोई भी दलित नेता लेकर नहीं चल रहा है. यहां तक आज के दलित नेता उनका नाम लेने से भी परहेज करते हैं."

वो कहते हैं, "अगर कांशीराम को सचमुच मान कर चल रहे होते तो उन्हें भारत रत्न दिलवाने की मांग कर रहे होते. जिन्होंने भारतीय राजनीति को बदला उन्हें क्या भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया जाना चाहिए था. अगर किसी ने इसकी मांग की है तो वो बहुजन समाज पार्टी की नेता ने की. दूसरे लोग कांशीराम की विचारधारा या उनके बताए मार्ग पर बिल्कुल नहीं चल रहे हैं."

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कांशीराम के गठबंधन फॉर्मूले को दोहराना होगा

कांशीराम ने पार्टी के गठन के साथ 'बहुजन समाज' का एक पुख़्ता आधार तैयार किया. वे देश के विभिन्न हिस्सों में घूम घूमकर 1984 से लगातार केवल पिछड़े, दलितों, आदिवासियों व अल्पसंख्यकों के बीच अभियान चलाते रहे.

1991 में इटावा से उपचुनाव जीतने के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनावी राजनीति में नया समीकरण आरम्भ हो गया है. इसके बाद उन्होंने दिल्ली की गद्दी तक पहुंचने के इरादे से मुलायम सिंह यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया.

बद्री नारायण कहते हैं, "बहुजन के हित को देखने के लिए मुलायम सिंह और कांशीराम के बीच जिस तरह का सुलह हुआ था उसे दोहराने की जरूरत है. तब कांशीराम ने दलितों के हितों से कोई समझौता नहीं किया था. गठबंधन भी इसी को लेकर टूटा था. उसमें एक गहरा सामाजिक कारण था. अभी मायावती को उसी फॉर्मूले के तहत गठबंधन करना होगा. सामाजिक स्तर पर जो विरोधाभास है उसे सुलझाना होगा. यह एक कठिन काम है."

दलितों के उत्थान को लेकर कांशीराम की सोच थी कि उनमें आत्मविश्वास होना चाहिए. वो इन्हें 'लेने वाले' समाज से 'देने वाले' समाज में तब्दील करना चाहते थे और उन्होंने एक सोई हुई कौम को जगाने में बहुत हद तक कामयाबी हासिल भी की.

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जीत से बसपा में हुआ ऊर्जा का संचार

उधर विवेक कुमार कहते हैं, "भारतीय राजनीति में जीत और हार व्यक्ति की प्रसिद्धि की निशानी हो सकती हैं. लेकिन कुछ राजनीतिक दल ऐसे भी हैं जिनको जीत और हार से डिगाया नहीं जा सकता क्योंकि वो अभी भी आंदोलन के मूड में हैं. उनका लगातार वोट प्रतिशत बना रहता है."

उन्होंने कहा, "लेकिन कुछ सवारी करने वाले लोग आ जाते हैं, इसलिए ये कभी कभी बढ़ा हुआ दिखता है. जो पार्टी के नहीं होते हैं वो दिखावे में विश्वास करते हैं. जो दल के भीतर हैं उनको अपने दल का ठहराव पता होता है."

वो कहते हैं, "हर चुनाव के बाद मायावती और उनकी पार्टी को खत्म बता दिया जाता है लेकिन अगले चुनाव में वो उसी सिद्दत के साथ एक बार फिर सामने दिखाई देती हैं. जो लोग डर और थकने की वजह से बैठ गए थे उनमें गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव में मिली जीत से ऊर्जा का संचार हुआ है."

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