दूसरों के भरोसे कब तक रहेगी भारतीय सेना?

  • 15 मार्च 2018
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पिछले साल ही भारत के सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि भारत एक साथ ढाई मोर्चों पर युद्ध के लिए सक्षम है. बिपिन रावत की इस टिप्पणी को चीन और पाकिस्तान के मीडिया में काफ़ी तवज्जो मिली थी.

इतने आत्मविश्वास भरे बयान के बाद अब बिपिन रावत ने चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति को रेखांकित किया है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार बुधवार को बिपिन रावत ने कहा कि पड़ोसी देश चीन अपनी बढ़ती आर्थित ताक़त के साथ सेना का भी आधुनिकीकरण कर रहा है.

विवेकाकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में आयोजित एक कार्यक्रम में जनरल रावत ने कहा, ''वो हमारे सोचने से पहले ही आ गए हैं.''

उन्होंने कहा कि चीन आर्थिक तरक्की तो कर ही रहा है, लेकिन वो साथ में ही सैन्य शक्ति का भी विस्तार कर रहा है.

उन्होंने कहा, ''उसने इस बात को सुनिश्चित किया है कि आर्थिक प्रगति के साथ सैन्य ताक़त भी बढ़े. इसलिए विश्व में वो एक ताक़त के तौर पर उभरा है. अब वो अमरीका को चुनौती दे रहा है जो अब तक दुनिया भर में एकलौता सुरक्षा प्रदान करने वाला देश रहा है.''

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सेना प्रमुख के बयान में विरोधाभास

जनरल बिपिन रावत कल तक ढाई मोर्चों पर एक साथ युद्ध की बात कर रहे थे क्या अब उनका बयान भारत की सैन्य शक्ति पर चिंतित करने वाला है? क्या वक़्त के साथ सेना प्रमुख के अपने ही बयानों में विरोधाभास दिखने लगा है?

विवेकानंद फाउंडेशन के साथ काम कर चुके और वर्तमान में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सुशांत सरीन कहते हैं, ''आर्मी प्रमुख के बयान में काफ़ी विरोधाभास है. एक और बयान नज़र से नहीं उतर रहा है, जिसमें सेना के उपप्रमुख ने संसद के सामने कहा है कि सेना के 68 फ़ीसदी साजो-सामान पुराने पड़ गए हैं. उन्होंने आर्मी की तैयारी और संसाधनों की किल्लत की बात रखी है. इसके साथ ही उन्होंने सेना के आधुनिकीकरण में आने वाली समस्याओं की भी व्याख्या की है. अगर सेना के उपप्रमुख का बयान देखें और सेना प्रमुख का देखें तो ये कितने अटपटे से लगते हैं.''

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तैयार नहीं सेना?

सुशांत सरीन ने कहा, ''ये बात तो ठीक है कि भारत के लिए दो मोर्चों से चुनौती है. जिस तरह से पाकिस्तान और चीन की दोस्ती बढ़ रही है उसमें इससे कोई इनकार नहीं कर सकता. पर सवाल यह उठता है कि क्या हमारी तैयारी उस स्तर की है? अगर आपकी तैयारी है भी तो क्या दो मोर्चों से चुनौती का सामना करना चाहिए या कूटनीति का सहारा लेना चाहिए. दुनिया के इतिहास में जब भी किसी देश ने दो मोर्चों से लड़ाई की है तो उसके लिए दिक़्क़ते बढ़ी हैं और आसान नहीं रहा है. हमें इनसे सबक लेना चाहिए और आर्मी प्रमुख को ऐसे बयानों से परहेज करने की ज़रूरत है.''

सुशांत सरीन का मानना है कि अब तक भारत के सेना प्रमुख बयानबाजियों से परहेज करते थे. सरीन कहते हैं, ''सेना प्रमुख की तरफ़ से ऐसा बयान शायद ही कभी आया हो जिसका राजनीतिक या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहमियत रही हो. रावत साहब शायद कुछ ज़्यादा बयान देते हैं. अब वो ख़ुद से देते हैं या सरकार दिलवा रही है यह नहीं पता, लेकिन जो भी है इससे भारत सरकार के हित नहीं सध रहे. फ़ौज को ऐसे बयानों से दूर ही रहना चाहिए.''

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आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पा रही भारतीय सेना?

पिछले हफ़्ते ही ग्लोबल इंडेक्स 2017 की रिपोर्ट आई थी और उसमें बताया गया कि कुल 133 देशों की सूची में भारत सैन्य ताक़त के मामले में चौथे नंबर पर है. इस लिस्ट में भारत से ऊपर केवल अमरीका, चीन और रूस हैं. इस रिपोर्ट के ठीक बाद सोमवार को स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट आई और इसमें भारत को दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बताया गया है.

पिछले पांच सालों में भारत का हथियार आयात 24 फ़ीसदी बढ़ा है. इस स्टडी में बताया गया है कि भारत का दुनिया भर के कुल आयातित हथियारों में 13 फ़ीसदी हिस्सा है. भारत हथियार आयात के मामले में सऊदी और मिस्र के साथ खड़ा है. इस रिपोर्ट के अनुसार का भारत रूस से सबसे ज़्यादा 62 फ़ीसदी हथियार आयात करता है. रूस के बाद भारत अमरीका से सबसे ज़्यादा हथियार ख़रीदता है.

मतलब भारत के पास जो भी सैन्य शक्ति है वो दूसरे देशों के हथियारों पर निर्भर है. आख़िर भारत सैन्य शक्ति के मामले में आत्मनिर्भर बने बिना ख़ुद को ताक़तवर कैसे बता सकता है? बीजेपी नेता शेषाद्री चारी भी इसे चिंताजनक मानते हैं. उनका मानना है कि भारत इस मामले जो रिसर्च और आधुनिकीकरण करना चाहिए था वो इतने सालों में नहीं किया.

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आयात पर निर्भर सेना

सुशांत सरीन भी भारत की यह सबसे बड़ी विफलता मानते हैं. उन्होंने कहा, ''भारत में सैन्य साजो सामान की इतनी ज़रूरत है कि इसकी इंडस्ट्री फल-फूल सकती थी. इसके बावजूद कुछ नहीं हुआ. इसे राजनीतिक बेवकूफी कहिए या नौकरशाही जड़ता इसी वजह से डिफेंस प्रोडक्शन में कुछ नहीं हो पाया. इस क्षेत्र में जो सरकारी उपक्रम हैं वे बिना काम के हैं और इनकी कोई उपलब्धि नहीं है. हम लाइसेंस प्रोडक्शन के सिवा कुछ कर नहीं पा रहे हैं. हमारी क्षमता इतनी कमज़ोर है कि कई बार डर सा भी लगता है.''

सुशांत सरीन का कहना है कि जब दुनिया करवट लेती है तो विश्व संबंधों में सहयोगी बदलते और बिदकते देरी नहीं लगती है. उन्होंने कहा कि अगर 60 से 70 फ़ीसदी सैन्य साजो सामान की ज़रूरतें हमारी रूस से पूरी हो रही हैं और रूस की प्रामिकता बदलती है तो हम कहां जाएंगे? सरीन ने कहा, ''आज हमारी अमरीका से क़रीबी बढ़ रही है लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि अमरीका हमेशा दोस्त ही रहेगा. अगर संबंध ख़राब हुए तो हम क्या करेंगे?''

2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने रक्षा के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मेक इन इंडिया प्रोग्राम शुरू किया था. इसी के तहत रक्षा के क्षेत्र में एफडीआई की सीमा ख़त्म कर 100 फ़ीसदी कर दी गई थी. क्या मोदी सरकार की यह पहल कारगर रही?

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मेक इन इंडिया कारगर क्यों नहीं?

मोदी सरकार में रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने संसद में जो डेटा दिया है वो काफ़ी निराशाजनक है. उन्होंने संसद में कहा कि पिछले चार सालों में डिफेंस प्रोडक्शन सेक्टर में महज 1.17 करोड़ रुपए ही एफडीआई के तौर पर आए. रक्षा क्षेत्र पर बनी संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी भारत की सैन्य स्थिति पर चिंता जताई गई है. बीजेपी सांसद मेजर जनरल बीसी खंडूरी की अध्यक्षता वाली समिति मंगलवार को संसद में रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सेना में आधुनिकीकरण के लिए 21,338 करोड़ रुपए की राशि पर्याप्त नहीं है. इस रिपोर्ट में नेवी और एयर फोर्स के आधुनिकीकरण की धीमी रफ़्तार पर भी चिंता जताई गई है. समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सेना के हथियार पुराने पड़ गए हैं और साथ ही गोलाबारूद का संग्रह भी पर्याप्त नहीं है.

आख़िर भारतीय सेना की स्थिति ऐसी क्यों है? इंस्टिट्यूट फोर डिफेंस स्टडीज एंड एनलिसिस के निदेशक लक्ष्मण कुमार बेहरा कहते हैं, ''भारतीय सेना से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि हमारी डिफेंस इंडस्ट्री किस हद तक पिछड़ी हुई है. दिलचस्प की हमारी डिफेंस इंडस्ट्री का आकार काफ़ी बड़ा है पर इनोवेशन के मामले में फिसड्डी है. इसी वजह से भारत आत्मनिर्भर नहीं हो पा रहा है. मोदी सरकार की मेक इन इंडिया अच्छी पहल है पर इसमें भी लागू करने को लेकर कई समस्याएं हैं.''

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रक्षा के क्षेत्र में एफ़डीआई पर लक्ष्मण कुमार बेहरा कहते हैं, ''डिफेंस में एफडीआई बिल्कुल अलग है. यहां ख़रीदार एक ही होता है लेकिन अन्य सेक्टर में ख़रीदार कई होते हैं. ऐसे में जब तक ख़रीदार की प्रतिबद्धता माकूल नहीं होगी तो कोई पैसा लगाना नहीं चाहता है. भारत सरकार की प्रतिबद्धता उस स्तर पर नहीं आ पाई है. हम 60 फ़ीसदी हथियारों का आयात करते हैं जबकि लक्ष्य 30 फ़ीसदी करने का है. हमारे यहां डीआरडीओ जैसी संस्थाएं भी हैं लेकिन यहां भारी कमियां हैं जिन्हें जितनी जल्दी हो सके दूर करने की ज़रूरत है.

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत रक्षा बजट पर जितनी रक़म आवंटित करता है उसका 80 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा रक्षा कर्मियों के वेतन और अन्य भत्तों पर खर्च हो जाता है. ऐसे में आधुनिकीकरण के लिए बहुत कम फंड बचता है. इसके बावजूद पिछले साल रक्षा बजट की 6,886 करोड़ रक़म आर्मी इस्तेमाल नहीं कर पाई थी.

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द स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में सैन्य खर्चों में हर साल 1.2 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हो रही है. इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर के सैन्य खर्चों में अमरीका अकेले 43 फ़ीसदी हिस्से के साथ सबसे आगे है.

इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चार स्थाई सदस्य आते हैं. हालांकि बाक़ी के सदस्य अमरीका के आसपास भी नहीं फटकते हैं. चीन सात फ़ीसदी के साथ दूसरे नंबर पर है. इसके बाद ब्रिटेन, फ़्रांस और रूस क़रीब चार फ़ीसदी के आसपास हैं.

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