योगी की हार पर क्या बोले गोरखपुर के लोग?

  • 15 मार्च 2018
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साल 1989 में हिंदू महासभा, साल 1991 और 1996 में भाजपा के टिकट पर महंत अवैद्यनाथ. इसके बाद साल 1996 से लेकर 2014 तक. बार-बार, लगातार, सिर्फ़ महंत योगी आदित्यनाथ.

ये गोरखपुर सीट और उस पर जीतने वाले उम्मीदवारों के नाम हैं. लेकिन 29 साल बाद कहानी बदल गई. योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री पद संभालने लखनऊ क्या गए, गोरखपुर सीट पर कहानी उलट गई.

साल 2018 का चुनाव गोरखपुर कभी नहीं भूल पाएगा. 14 मार्च को जब ईवीएम खुली तो शुरुआती खुशी के बाद भाजपा के हाथ कुछ न आया और जीत समाजवादी पार्टी के प्रवीण निषाद ले उड़े.

लेकिन ऐसा हुआ कैसे? योगी आदित्यनाथ अब तक ये सीट लाखों वोट से जीतते थे लेकिन इस बार भाजपा ये सीट कैसे हार गई?

क्या समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का हाथ मिलाना भारी पड़ा या फिर मठ के व्यक्ति को टिकट न मिलना भाजपा के लिए हार का कारण बना?

क्या बोले गोरखपुर के लोग?

इस बारे में बीबीसी हिन्दी ने गोरखपुर के लोगों से बात की और जानना चाहा कि इस बार की क्या वजह हो सकती है.

मंदिर के पीछे रसूलपुर में रहने वाले इरफ़ान अहमद ने कहा, ''जनता और कार्यकर्ता सर्वोपरि होता है. जब कुछ नेताओं का सरोकार उनसे नहीं रहेगा तो तय मानिए कि सीट जानी ही थी.''

''जब तक पूज्य महाराज सांसद रहे, कार्यकर्ताओं को सम्मान मिला करता था. वो भी इतना कि कोई छोटा-बड़ा नेता नहीं करते. लेकिन इस बार मतदाताओं से कटने का नुकसान हुआ है.''

गोरखनाथ मठ के बाहर मौजूद एक व्यक्ति ने कहा, ''योगी आदित्यनाथ के पास इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी है, तो बिज़ी तो होना ही था.''

''ये देश का सबसे बड़ा प्रदेश है तो मसरूफ़ हो जाना स्वाभाविक है लेकिन ये भी सच है कि इस बार भाजपा के वोटर तक पर्चियां नहीं पहुंची.''

जातीय समीकरण में चूकी भाजपा

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लेकिन दूसरे व्यक्ति ने इससे सहमति नहीं जताई. उन्होंने कहा, ''लेकिन ये एक कारण है. दूसरे कारण ये है कि आख़िर वक़्त में बसपा ने सपा को समर्थन दे दिया. निषाद पार्टी, पीस पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल जैसे भी उनके साथ हो गए.''

''हम असल में जातिगत समीकरण समझ नहीं पाए. जैसा कि योगी ने कहा कि अति उत्साह भी इसका कारण है.''

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कुछ लोग खुलकर कह रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ थे तो बात और थी लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है.

एक व्यक्ति ने कहा, ''गोरखनाथ मंदिर आस्था का प्रतीक रहा है. योगी सभी का ख़्याल रखते थे. वो सबसे तालमेल रखते थे. जब वो चुनाव लड़ते थे तो वो किसी जाति के नहीं होते थे. वो जनता से कनेक्ट करते हैं. और पीठ का सम्मान सिर्फ़ गोरखपुर तक सीमित नहीं है.''

कुछ लोगों का ये भी कहना है कि साल 2014 में दो निषाद उम्मीदवार थे और दोनों को दो-दो लाख वोट मिले थे. यानी बंट जाता था वोट लेकिन इस बार वो वोट भी एकजुट हो गया.

भाजपा से नाराज़गी भी थी?

इसके अलावा कुछ का कहना है कि उप चुनाव की वजह से भाजपा के वोटर में वो उत्साह नहीं था जो आम चुनावों में होता है. और कम वोटिंग भाजपा की हार का मुख्य कारण रहा.

हालांकि, जानकारों का मानना है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनसे उम्मीदें बढ़ गई हैं और वादें अब तक ज़मीन पर उतर नहीं पाए हैं.

स्थानीय पत्रकार गौरव त्रिपाठी ने बीबीसी से कहा, ''इस बार चुनावों में जातिवाद हावी रहा. निषाद वोट 4 लाख से ऊपर है और सपा को इसका फ़ायदा हुआ.''

''इसके अलावा भाजपा के ख़िलाफ़ गुस्सा भी था. कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं थी. फ़रियादी आते थे, उनकी अनदेखी हो रही थी. वोटर लिस्ट में कई लोगों के नाम नहीं थे. ये तमाम वजह हैं कि भाजपा को नुकसान हुआ.''

त्रिपाठी ने कहा, ''कई लोगों का ये भी मानना है कि जब से योगी सीएम बने तब से कुछ ख़ास तरह के लोगों से घिरे रहते हैं. सांसद थे तो ज़मीनी हक़ीक़त जानते थे. तीन लाख वोट से जीत जाते थे लेकिन इस बार पार्टी हार गई.''

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उनका कहना है कि महंत शब्द सुनते हैं तो ईश्वर माने जाते थे. जाति-धर्म बीच में नहीं आते थे. मंदिर का शख़्स चुनाव लड़ा होता तो वही जीतता. ख़ास तौर से साधु-संत.

उन्होंने कहा, ''29 साल से एम्स, फ़र्टिलाइज़र की बात की जा रही है. लेकिन ज़मीनी स्तर पर कुछ नहीं दिख रहा.''

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