नज़रिया: 2019 में मोदी-शाह की हार की भविष्यवाणी जल्दबाज़ी है

  • 15 मार्च 2018
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गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उप-चुनावों में भाजपा की करारी हार के बाद कहा जाने लगा है कि अगर सारी विपक्षी पार्टियां एक जुट हो जाएं तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में भाजपा की हार तय है.

कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी कहने लगे हैं कि नरेंद्र मोदी का क़रिश्मा अब ढलान पर है. उनका यह भी मानना है कि इन दो उपचुनावों के नतीजों ने दिखा दिया है कि मोदी-शाह की जोड़ी हिंदी पट्टी में अजेय नहीं है और अगर मिल कर काम किया जाए तो उन्हें धूल चटाई जा सकती है.

ये टिप्पणियां कुछ-कुछ वैसी ही हैं जो 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत के बाद की गई थीं. उस चुनाव में भी पारंपरिक रूप से प्रतिद्वंद्वी रहे लालू प्रसाद और नीतीश कुमार साथ आए थे.

भाजपा के लिए नीतीश का यू-टर्न

लालू ने अपमान का घूंट पीते हुए न सिर्फ़ नीतीश कुमार को अपना नेता माना बल्कि चुनाव नतीजे के बाद सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने दिया.

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हालांकि बिहार की राजनीति में उत्तर और दक्षिण ध्रुव कहे जाने वाले लालू-नीतीश के साथ आने के बाद क्या हुआ, यह सबके सामने है. न सिर्फ़ साफ़-सुथरी छवि वाले नीतीश का दम घुटने लगा बल्कि उन्होंने मोदी विरोध के अपने रवैये से यू-टर्न लेते हुए फिर भाजपा से हाथ मिलाया.

बिहार का ज़िक्र इसलिए क्योंकि वहां जैसा ही महागठबंधन प्रयोग के तौर पर पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश में इन लोकसभा उपचुनावों में मैदान में उतरा.

1995 के गेस्टहाउस कांड की बेहद कड़वी यादों को भुलाकर मायावती ने मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव का साथ देने का फ़ैसला किया. रातों-रात मायावती की एक अपील पर उनके दलित वोट एकमुश्त सपा के खाते में चले गए.

ख़तरे की घंटी!

नतीजा ये हुआ कि भाजपा को लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तुलना में ज़बर्दस्त नुक़सान उठाना पड़ा. इन उप-चुनावों का नतीजा सिर्फ़ सपा-बसपा के वोट जुड़ने भर को नहीं दिखा रहा, बल्कि भाजपा के ख़िलाफ़ मतदाताओं का गुस्सा भी दिखा रहा है क्योंकि भाजपा के ख़िलाफ़ स्विंग साफ दिख रहा है.

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यह भाजपा के लिए अगले लोकसभा चुनाव से पहले खतरे की घंटी है.

दरअसल, भाजपा के लिए ज़्यादा बड़ी दिक्कत ब्रैंड योगी को बहुत गहरा धक्का पहुंचने से हुई है. विधानसभा चुनाव में भारी जीत के बाद सरल, सौम्य और प्रशासनिक अनुभव के धनी मनोज सिन्हा के बजाए तेज़तर्रार, हिंदुत्व छवि वाले आदित्यनाथ योगी को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की सोच मानी जाती है.

हिंदुत्व और विकास का तालमेल

उसके पीछे रणनीति साफ़ थी कि योगी हिंदुत्व को उभार देंगे और केंद्र की मोदी सरकार के विकास की बातें सामने रख मिशन-2019 के लिए यूपी में पार्टी 2014 जैसा ही प्रदर्शन दोहरा सकेगी.

हिंदुत्व और विकास का यह तालमेल भाजपा को फिर हिन्दी भाषी राज्यों में मजबूती दे सकेगा. भगवा वस्त्रधारी योगी यूपी के बाहर भी पार्टी के लिए वोट खींच सकेंगे. ऐसा हुआ भी. भाजपा ने यूपी से बाहर आदित्यनाथ योगी की छवि का जमकर इस्तेमाल किया है.

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गुजरात, त्रिपुरा जैसे राज्यों में योगी से जमकर प्रचार कराया गया. कर्नाटक में भी उनकी सभाएं हो चुकी हैं. इन राज्यों में भाजपा की जीत के बाद लखनऊ के हवाले दिल्ली के अख़बारों में खबरें भी छपीं कि किस तरह योगी के प्रचार करने से भाजपा के पक्ष में हवा बनी और योगी जहां-जहां गए वहां भाजपा ने किस तरह जीत हासिल की.

लेकिन वही योगी अब अपने सबसे मजबूत गढ़ गोरखपुर में हार कर पार्टी की इस रणनीति पर सवालिया निशान लगा रहे हैं.

भाजपा की स्पष्ट नीति

गोरखपुर और फूलपुर की हार को पीएम मोदी और अमित शाह से इसलिए नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि पिछले साढ़े तीन साल में हुए सभी उपचुनावों से उन्होंने अपने को दूर रखा है. दरअसल, इस मामले में उनकी नीति स्पष्ट है कि अव्वल तो उपचुनाव की नौबत नहीं आने दी जाए और अगर ऐसा होता भी है तो राज्य इकाई ही उसकी पूरी जिम्मेदारी ले.

यही वजह है कि कलराज मिश्र जैसे नेता मंत्रिमंडल से हटाए जाने के बावजूद अभी तक राज्यपाल नहीं बनाए गए क्योंकि ऐसा होने पर उन्हें लोक सभा से इस्तीफ़ा देना होगा और एक और उप-चुनाव की नौबत आ जाएगी.

स्वाभाविक है कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां के मुख्यमंत्री और पार्टी संगठन से ही यह अपेक्षा रहती है कि वह इन चुनावों में पार्टी की जीत सुनिश्चित कराए.

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यही वजह है कि मध्य प्रदेश में हाल में हुए विधानसभा उप-चुनावों में शिवराज सिंह चौहान मंत्रियों समेत वहां डेरा डाल कर बैठे रहे. राजस्थान में लोकसभा के दो उप-चुनावों में हार के लिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को जिम्मेदार ठहराया गया.

लेकिन फूलपुर और गोरखपुर की हार सिर्फ़ आदित्यनाथ योगी ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के लिए भी चिंता का विषय है. इससे पहले हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में चाहे भाजपा ने शहरी इलाक़ों में कामयाबी हासिल की, लेकिन ग्रामीण इलाकों में उसे झटका लगा.

पहले से ज़्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य

शाह ने यूपी में लोकसभा चुनाव में पिछली बार से भी अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है. लेकिन उप-चुनाव के नतीजे संकेत दे रहे हैं कि 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा का साथ देने वाले सामाजिक समीकरण दरक रहे हैं और शहरी वर्ग के मतदाता का भाजपा से तेज़ी से मोहभंग हो रहा है.

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सपा-बसपा का मज़बूत जातीय गणित भाजपा पर भारी पड़ सकता है. ख़ासतौर से मायावती का अपना दलित वोट बैंक जो उनके साथ न सिर्फ़ चट्टान की तरह खड़ा है बल्कि उनके एक इशारे पर उनकी धुर-विरोधी पार्टी को वोट देने से भी नहीं कतराता.

वैसे एक बात जरूर है कि उत्तर प्रदेश में उप-चुनाव किसी बड़ी हवा या आंधी का संकेत नहीं देते. आज इंडियन एक्सप्रेस में गिल्स वर्नियर्स ने बेहद महत्वपूर्ण आंकड़े सामने रखे हैं.

उन्होंने 1962 से 2014 तक के हुए कई उप-चुनावों के नतीजों का अध्ययन कर बताया है कि सिर्फ़ 11 बार ऐसा हुआ कि उप-चुनाव जीतने वाली पार्टी ने उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनाव को जीता हो. ऐसा भी कम ही हुआ है कि जिस पार्टी की राज्य में सत्ता हो उसे सभी उप-चुनावों में जीत मिली हो.

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योगी की पसंद की गई दरकिनार

उप-चुनावों में स्थानीय जातीय समीकरण, उम्मीदवार और पार्टी नेतृत्व की छवि बड़ी भूमिका निभाती है. गोरखपुर में गोरक्षपीठ के बाहर का उम्मीदवार पहली बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा. भाजपा ने योगी की पसंद को दरकिनार करते हुए ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारा और जिसकी ख़राब सेहत को भी मुद्दा बनाया गया.

वहीं सपा ने जातीय समीकरणों को साधते हुए निषाद समाज के व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया. बसपा से गठबंधन के चलते दलित और मुस्लिम वोटों को एकजुट होने में कोई दिक्कत नहीं हुई. मतदान का कम प्रतिशत भी भाजपा के ख़िलाफ़ गया और उसका शहरी वोटर घर से बाहर नहीं निकला.

सपा-बसपा गठबंधन की संभावना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है. यह गठबंधन संभव भी है क्योंकि कल रात ही अखिलेश यादव मायावती के घर गए. लेकिन कई लिहाज़ से भाजपा के लिए इसमें भी संभावनाएं छिपी हैं.

पहली बात तो ये है कि भाजपा का केंद्र में मुक़ाबला कांग्रेस से है जिसके उम्मीदवारों के दोनों सीटों पर ज़मानत ज़ब्त हो गई. बिहार और यूपी की 120 सीटों पर कांग्रेस कहीं भी टक्कर में नहीं है. राहुल गांधी का नेतृत्व न तो अखिलेश यादव को और न ही मायावती को मंजूर होगा.

दूसरी तरफ, अगर कांग्रेस सपा-बसपा गठबंधन में शामिल भी होती है तो इन दोनों पार्टियों के लिए 35-35-10 के फ़ार्मूले से पीछे हटना मुश्किल होगा. अगर बसपा और सपा की बात करें तो इन दोनों के तालमेल के पीछे एक प्रायोगिक समस्या यह भी आएगी कि बरसों से जिस तरह से उन्होंने अपनी ज़मीन तैयार की है वहां वो अपनी कल तक विरोधी रही पार्टी को पनपने का मौका क्यों देंगे.

नतीजों को राष्ट्रीय तस्वीर से जोड़ना कितना ठीक?

क्योंकि जैसा बिहार में हुआ कल यूपी में भी हो सकता है. मोदी को रोकने के नाम पर यह सब एक जरूर हो सकते हैं. लेकिन मोदी के बाद कौन, इस सवाल का जवाब उन्हें आपस में लड़ने और बिखराव की ओर भी धकेल सकता है. इसलिए इन दो उप-चुनावों के नतीजों को व्यापक राष्ट्रीय तस्वीर से जोड़ना ठीक नहीं होगा.

लेकिन भाजपा के लिए यह परिणाम बहुत बड़ा सबक हैं. सुशासन के उसके वादे को कसौटी पर कसा जा रहा है और अन्य चुनावी वादों को लेकर अब मतदाता अधीर हो रहे हैं. यूपी में जिस गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित वर्ग को लेकर उसने चुनावी समीकरण तैयार किया था उसमें अब सेंध लगती दिख रही है.

किसानों की समस्याओं, नौजवानों को रोजगार जैसे मुद्दों पर भाजपा सवालों के घेरे में है.

पार्टी नेता दबी ज़बान में अब स्वीकार करने लगे हैं कि बड़े नेताओं का अहंकार कार्यकर्ताओं को उनसे दूर कर रहा है.

जाहिर है अगले एक साल में भाजपा को इन्हीं सब समस्याओं से पार पाना होगा नहीं तो 2019 में वापसी के लिए लखनऊ से होते हुए दिल्ली आने का उसका रास्ता मुश्किल हो जाएगा.

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