विवेचनाः कल्याण सिंह ने कार सेवकों पर गोली चलवाने से कर दिया था इनकार

  • 17 मार्च 2018
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ढहाई गई थी बाबरी मस्जिद, जिससे पूरे देश में हंगामा शुरू हो गया था इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ढहाई गई थी बाबरी मस्जिद, जिससे पूरे देश में हंगामा शुरू हो गया था

6 दिसंबर, 1992 की दोपहर कल्याण सिंह अपने निवास स्थान 5 कालिदास मार्ग पर अपने दो मंत्रिमंडलीय सहयोगियों लालजी टंडन और ओमप्रकाश सिंह के साथ एक टेलिविजन के सामने बैठे हुए थे.

मुख्यमंत्री के कमरे के बाहर उनके प्रधान सचिव योगेंद्र नारायण भी मौजूद थे. वहाँ मौजूद सब लोगों को भोजन परोसा जा रहा था. अचानक सबने देखा कि कई कार सेवक बाबरी मस्जिद के गुंबद पर चढ़ गए और कुदालों से उसे तोड़ने लगे.

हांलाकि वहाँ पर्याप्त संख्या में अर्ध सैनिक बल तैनात थे, लेकिन कारसेवकों ने उनके और बाबरी मस्जिद के बीच एक घेरा सा बना दिया था, ताकि वो वहाँ तक पहुंच न पाएं.

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कल्याण सिंह

उस समय कल्याण सिंह के प्रधान सचिव रहे योगेंद्र नारायण बताते हैं, 'तभी उस समय उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक एस एम त्रिपाठी भागते हुए आए और उन्होंने मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से तुरंत मिलने की अनुमति मांगी. जब मैंने अंदर संदेश भिजवाया तो मुख्यमंत्री ने उन्हें भोजन समाप्त होने तक इंतज़ार करने के लिए कहा.'

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Image caption बाबरी मस्जिद

वो कहते हैं, 'थोड़ी देर बाद जब त्रिपाठी अंदर गए तो उन्होंने उन्हें देखते ही कार सेवकों पर गोली चलाने की अनुमति मांगी, ताकि बाबरी मस्जिद को गिरने से बचाया जा सके. कल्याण सिंह ने मेरे सामने उनसे पूछा कि अगर गोली चलाई जाती है तो क्या बहुत से कार सेवक मारे जाएंगे?

त्रिपाठी ने जवाब दिया, 'जी हाँ बहुत से लोग मरेंगे.'

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Image caption मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के साथ योगेंद्र नारायण

कल्याण सिंह ने तब उनसे कहा कि 'मैं आपको गोली चलाने की अनुमति नहीं दूंगा. आप दूसरे माध्यमों जैसे लाठीचार्ज या आँसू गैस से हालात पर नियंत्रण करने की कोशिश करिए.'

योगेंद्र नारायण आगे कहते हैं, 'डीजीपी ये सुन कर वापस अपने दफ़्तर लौट गए. जैसे ही बाबरी मस्जिद की आखिरी ईंट गिरी, कल्याण सिंह ने अपना राइटिंग पैड मंगवाया और अपने हाथों से अपना त्याग पत्र लिखा और उसे ले कर खुद राज्यपाल के यहाँ पहुंच गए.'

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Image caption नारायणदत्त तिवारी तीन बार उत्तर प्रदेश और एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे

जब श्रीपति मिश्र को वाइन 'सर्व' की गई

इससे पहले योगेंद्र नारायण दो पूर्व मुख्यमंत्रियों श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी के भी प्रधान सचिव रह चुके थे. श्रीपति मिश्र बहुत सादे इंसान थे.

योगेंद्र नारायण बताते हैं, 'एक बार उन्हें एक सरकारी दौरे पर दुबई जाना पड़ा. मैं उनके साथ गया. हवाई जहाज़ में उनकी सीट 'फ़र्स्ट क्लास' में थी, जबकि मैं 'इकॉनमी' क्लास में बैठा हुआ था. अचानक मैंने अपनी सीट से देखा कि 'एयर होस्टेस' श्रीपति मिश्रा को वाइन का एक गिलास पेश कर रही है.'

उन्होंने कहा, 'मैं चिल्ला कर उसे बताने ही वाला था कि मुख्यमंत्री शराब नहीं पीते, तभी मुख्यमंत्री ने वो गिलास एयर होस्टेस के हाथ से ले लिया. पाँच मिनट बाद मैंने देखा कि उनके हाथ में वाइन का दूसरा गिलास था. फिर उन्होंने तीसरा गिलास भी पिया. जब वो दुबई हवाई अड्डे पर उतरे तो उनके पैर कांप रहे थे और मुझे उन्हें सहारा दे कर विमान से नीचे उतारना पड़ा.'

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Image caption रक्षा सचिव के पद से रिटायर हुए योगेंद्र नारायण बीबीसी दफ़्तर में रेहान फ़ज़ल के साथ

नारायणदत्त तिवारी की 'ना' न कहने की आदत

दूसरी तरफ़ नारायणदत्त तिवारी बहुत शिष्ट और विनम्र शख़्स थे. वो किसी को भी न नहीं कह सकते थे और हर एक शख़्स से खुद मिलते थे.

योगेंद्र नारायण बताते हैं, 'मैंने उनको अक्सर मुख्य हॉल में एक व्यक्ति से मिलने के बाद सिटिंग रूम में एक दूसरे व्यक्ति से गुपचुप बातें करते देखा है. और तो और उसको भी वहीं छोड़कर वो एक तीसरे शख़्स से मिलने टॉयलेट के पास पहुंच जाते थे.'

Image caption रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस और रक्षा राज्य मंत्री हरिन पटेल के साथ योगेंद्र नारायण

नारायण कहते हैं, 'उनका एक गुण ये भी था कि वो विधान सभा में जाने से पहले उस दिन सामने आने वाले हर विषय का पहले से अध्ययन करते थे और लाइब्रेरी में घंटों बैठ कर 'नोट्स' लिया करते थे. वो अक्सर अचानक अपने विमान से दिल्ली चले जाया करते थे.'

उन्होंने बताया, 'एक बार मैं अपनी पत्नी के साथ हज़रतगंज में एक फ़िल्म देख रहा था. तभी उन्होंने मुझे बुलवा भेजा. मैं अपनी पत्नी से कह कर गया कि तुम फ़िल्म देखना जारी रखो. मैं थोड़ी देर में वापस आ जाउंगा. मैं सिनेमा हॉल नहीं लौट पाया क्योंकि तिवारी मुझे अपने साथ 'स्टेट प्लेन' से दिल्ली ले गए. ज़ाहिर है मेरी पत्नी मुझसे बहुत नाराज़ हुई और अकेले घर लौटीं.'

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अमिताभ बच्चन के साथ की पढ़ाई

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए में 'टॉप' करने वाले योगेंद्र नारायण की प्रारंभिक शिक्षा इलाहाबाद के ही 'ब्वाएज़ हाई स्कूल' में हुई थी जहाँ मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन उनसे एक साल सीनियर हुआ करते थे.

योगेंद्र नारायण बताते हैं, 'हम लोगों ने एक साथ कई प्रहसनों और नाटकों में भाग लिया. एक साल उन्हें स्कूल के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला. अगले साल मुझे भी यही पुरस्कार मिला.'

अमिताभ से जुड़ा एक वाक़या याद करते हुए वो कहते हैं, 'उस ज़माने में जूनियर छात्र सीनियर छात्रों से आधे दाम पर पुरानी किताबें ख़रीदा करते थे. मुझे याद है कि मैं उनके 'बैंक रोड' वाले घर पर उनकी किताबें ख़रीदने गया था और बहुत मोल भाव के बाद मैंने कुछ रुपए और आने दे कर उनकी पुरानी किताबें ख़रीदी थीं.'

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Image caption मारुति उद्योग के प्रबंध निदेशक रहे जगदीश खट्टर ने योगेंद्र नारायण के साथ आईएएस की पढ़ाई की

संकट प्रबंधन के माहिर

आईएएस में चुने जाने के बाद योगेंद्र नारायण को शुरू में अलीगढ़, कानपुर और मुज़फ़्फ़रनगर ज़िलों में तैनात किया गया. 1974 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ ज़िला मैजिस्ट्रेट का पुरस्कार मिला.

उनके बैचमेट और मारुति उद्योग के प्रबंध निदेशक रहे जगदीश खट्टर बताते हैं, 'हम दोनों 1965 में एक साथ आईएएस में आए थे. फ़र्क इतना था कि वो इलाहाबाद से आए थे और मैं दिल्ली से. हमारे बैच में ये सबसे लोकप्रिय अफ़सर माने जाते हैं. क्राइसेस मेनेजमेंट में इनकी बहुत ख्याति रही है.'

खट्टर कहते हैं, 'मुझे याद है 'इमर्जेंसी' के दौरान मुज़फ़्फ़रनगर में परिवार नियोजन को ले कर एक बड़ा दंगा भड़क गया था और इन्हें ख़ास तौर से उस पर नियंत्रण करने के लिए वहां भेजा गया था. कुछ ही दिनों में उन्होंने वहाँ पर शांति स्थापित कर दी.'

वो आगे कहते हैं, 'एक बार जब योगेंद्र दिल्ली में भूतल यातायात मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे तो दिल्ली में 'डीटीसी' की हड़ताल हुई. उनके मंत्री राजेश पायलट ने उन्हें ज़िम्मेदारी दी कि हड़ताल के दौरान दिल्ली के लोगों को कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.'

उन्होंने कहा, 'उस समय मैं उत्तर प्रदेश में 'यातायात कमिश्नर' था. वो मेरे पास आए और उत्तर प्रदेश सरकार से 200 बसों को भेजने की मांग की. मैंने एक हफ़्ते के अंदर बसों की व्यवस्था कराई. नतीजा ये हुआ कि 'डीटीसी' की हड़ताल टूट गई और दिल्ली के लोगों को कोई परेशानी नहीं हुई.'

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Image caption नेपाल के पूर्व नरेश वीरेंद्र वीर विक्रम शाहदेव

जब नेपाल नरेश और राजीव गाँधी में ठनी

इसी पद पर रहने के दौरान योगेंद्र नारायण के सामने उस समय एक विचित्र सी स्थिति पैदा हो गई जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आदेश दिया कि चारों तरफ़ भूमि से घिरा होने के कारण नेपाल को कोलकाता बंदरगाह पर मिलने वाली सारी सुविधाएं रोक दी जाएं. कारण था नेपाल नरेश का राजीव गाँधी के प्रति अपमानजनक व्यवहार जिसे उन्होंने बहुत नापसंद किया था.

योगेंद्र नारायण याद करते हैं, 'जैसे ही मुझे प्रधानमंत्री कार्यालय से आदेश मिले, मैंने कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के अध्यक्ष को फ़ोन मिला कर नेपाल के सामान के लिए 'रिज़र्व्ड' जगह को बंद करने के लिए कहा. अध्यक्ष ने कहा कि कि ये आदेश अंतरराष्ट्रीय नियमों के ख़िलाफ़ है और वो तभी इसका पालन करेंगे जब उन्हें इसके लिखित आदेश दिए जाएं.'

इस पर योगेंद्र नारायण ने क्या किया? वो कहते हैं, 'मैंने बीच का रास्ता निकाला और उनसे कहा कि मैं लिखित आदेश ज़रूर भेजूंगा, लेकिन उसे आपको बंद ताले में अलमारी के अंदर रखना होगा. अगर बाद में कोई जांच बैठाई जाती है तो आप उस आदेश को दिखा सकते हैं. इस बात पर कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के अध्यक्ष राज़ी हो गए. बहाना बनाया गया कि उस स्थान पर जहाँ नेपाल का सामान आता है काफ़ी रेत जमा हो गई है, इसलिए उसे बंद कर दिया गया है.'

उन्होंने बताया, 'तीन हफ़्तों तक नेपाल को किसी भी सामान की सप्लाई नहीं हुई और नेपाल में ज़रूरी सामान की भारी कमी हो गई. उच्चतम स्तर पर बातचीत के बाद कहीं जा कर ये मामला सुलझाया गया.'

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Image caption पूर्व रक्षा मंत्री जसवंत सिंह

जब जसवंत सिंह को क्रेमलिन के दरवाज़े पर रोका गया

उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव के पद की ज़िम्मेदारी निभाने के बाद योगेंद्र नारायण को केंद्र में रक्षा सचिव बनाया गया. एक बार उन्हें तत्कालीन रक्षा मंत्री जसवंत सिंह के साथ मॉस्को जाने का मौका मिला जहाँ 'क्रेमलिन' में उनकी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाक़ात तय थी. लेकिन गेट पर सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक लिया, क्योंकि जसवंत सिंह अपना 'आईडी कार्ड' होटल में ही भूल आए थे.

योगेंद्र नारायण याद करते हैं, 'जसवंत सिंह सेना में मेजर रह चुके थे. उन्होंने इस बात से अपने आप को बहुत अपमानित महसूस किया कि एक अदना से रूसी गार्ड ने उन्हें 'क्रेमलिन' में नहीं घुसने दिया. हमारे राजदूत के रघुनाथ ने गार्ड को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो टस से मस नहीं हुआ और बार-बार यही कहता रहा कि उसे बिना परिचय पत्र के किसी को भी अंदर घुसाने की इजाज़त नहीं है. आखिरकार हमारे राजदूत को अपनी आवाज़ ऊंची करनी पड़ी. 'क्रेमलिन' के वरिष्ठ अधिकारी दौड़ते हुए आए और तब जा कर जसवंत सिंह भवन के अंदर घुस पाए.'

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Image caption पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस

जब रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस की तलाशी ली गई

इसी तरह की एक घटना बाद में रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के साथ हुई, जब अमरीका की एक सरकारी यात्रा के दौरान बाक़ायदा उनकी तलाशी ली गई.

योगेंद्र नारायण बताते हैं, 'भारत में हम ऐसे माहौल में बढ़े थे जहाँ कोई मंत्री की तलाशी लेने के बारे में सोच तक नहीं सकता था. मैं उस समय अवाक रह गया जब मैंने देखा कि अमरीकी सैनिक जॉर्ज की तलाशी ले रहे हैं. और तो और उन्हें तलाशी के बाद अपने जूते तक उतारने के लिए कहा गया. मैंने मन ही मन सोचा कि अगर हम भी अमरीका के रक्षा मंत्री की दिल्ली में तलाशी लें तो उन्हें कैसा लगेगा. हम तो ऐसा नहीं कर पाए, लेकिन बाद में मुझे बताया गया कि ब्राज़ील ने अमरीका की तरह उनके रक्षा मंत्री की तलाशी करवाई.'

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Image caption जॉर्ज फर्नांडिस और जसवंत सिंह

जार्ज घर से पैदल दफ़्तर जाते थे

योगेंद्र नारायण को रक्षा सचिव के रूप में जसवंत सिंह और जॉर्ज फर्नांडिस के काम करने के ढंग को बहुत नज़दीक से देखने का मौक़ा मिला है. उनकी नज़र में दोनों बहुत क़ाबिल रक्षा मंत्री थे, लेकिन दोनों के काम करने के ढंग में बहुत फ़र्क था.

योगेंद्र नारायण याद करते हैं, 'जॉर्ज फर्नांडिस जहाँ बहुत सादगी पसंद थे, जसवंत सिंह सैनिक टीमटाम पर बहुत यक़ीन करते थे. जॉर्ज अपने घर से दफ़्तर तक पैदल आया करते थे. उनका दफ़्तर तीसरी मंज़िल पर था, लेकिन वो कभी वहाँ तक पहुंचने के लिए लिफ़्ट का इस्तेमाल नहीं करते थे. एक बार उन्होंने कुछ सैनिक अधिकारियों को अपने यहाँ खाने पर बुलाया और उन्हें सिर्फ़ एक सब्ज़ी, दाल और रोटी परोसी.'

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जया जेटली के साथ कई विशेषण जोड़े जा सकते हैं.

योगेंद्र नारायण आगे कहते हैं, 'वो अपने कपड़े ख़ुद अपने हाथों से धोते थे और रात को उन्हें अपने तकिए के नीचे रख देते थे, ताकि उसमें अपनेआप प्रेस हो जाए. जबकि जसवंत सिंह के कमरे मे हमेशा एक सौम्य संगीत बजता रहता था. उनके दफ़्तर की दीवारों पर सुंदर पेंटिंग्स लगी रहती थीं. सैनिक मामलों के वो बहुत अच्छे जानकार थे और बहुत पढ़ा लिखा करते थे. उनकी कमीज़ की आस्तीन हमेशा मुड़ी रहती थी और वो सैनिक स्टाइल की 'बुश शर्ट' पहना करते थे. वो कभी अपनी कमीज़ को पैंट में 'टक' नहीं करते थे.'

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Image caption योगेंद्र नारायण की किताब बॉर्न टू सर्व

वो आगे कहते हैं, 'वो धीमे धीमे बोलते थे. मैंने एक चीज़ नोट की कि वो जब भी बोलते थे, उनका दाहिना हाथ हमेशा उनकी कमीज़ के अंदर होता था. हमें बताया गया कि वो हमेशा अपनी 'इष्ट देवी' की तस्वीर को अपनी जेब के अंदर रखते थे और हमेशा उसे छूते रहते थे.'

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