नज़रिया: गोरखपुर, नागपुर और दिल्ली के त्रिकोण में फंसा है 2019

  • 17 मार्च 2018
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आज की तारीख में ये कह देना कि 2019 के आम चुनाव में कौन जीतेगा या कौन हारेगा, किसी जुए से कम नहीं है.

लेकिन जिस तरह गोरखपुर की सीट बीजेपी ने गंवाई उसने झटके में तीन सवाल को तो जन्म दे ही दिया है.

पहला, चुनाव जातीय मैथेमेटिक्स पर चलेगा. दूसरा, विकास का नारा ग़रीबी हटाओ सरीखा एक जुमला है.

तीसरा, परिवर्तन की बिसात बिछी हुई है, सिर्फ़ एक दमदार राजनेता की तलाश है जो राहुल गांधी नहीं हैं.

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हिन्दू महासभा बनाम संघ परिवार

यानी चाहे अनचाहे 2014 के जनादेश को चुनौती देने के लिए 2019 तैयार हो रहा है.

चूंकि गोरखपुर लोकसभा सीट दशकों से जातीय समीकरण को ख़ारिज करते हुए हिन्दू महासभा के पहचान के साथ जुड़ी रही और राजनीतिक तौर पर हिन्दू महासभा ने संघ परिवार को कहीं चुनौती दी तो वह गोरखपुर की ही सीट है.

जहां महंत दिग्विजयनाथ से लेकर अवैद्यनाथ तक के दौर में न जनसंघ टिकी न बीजेपी.

और योदी आदित्यनाथ की राजनीतिक ट्रेनिंग भी आरएसएस की शाखा में नहीं बल्कि गोरखधाम में पैर जमाए हिन्दू महासभा की उस सोच के तहत हुई जहां सावरकर का हिन्दुत्व बार-बार हेडगेवार के हिन्दुत्व से टकराता रहा है.

पर संघ ने ही पहली बार सियासी पहल कर यूपी के मुख्यमंत्री के तौर पर हिन्दू महासभा के योगी आदित्यनाथ को नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की पंसद मनोज सिन्हा के आगे खड़ा कर दिया.

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इसका अंदेशा नागपुर-दिल्ली को न था

यानी योगी आदित्यनाथ सिर्फ मुख्यमंत्री भर नहीं बल्कि नागपुर के लिए गोरखपुर हिन्दुत्व की वह प्रयोगशाला भी है जिसके आसरे संघ के भीतर सावरकरवाद को अलग खड़े होने से रोकने से लेकर हिन्दुत्व के एजेंडे तले सत्ता को अनुकूल बनाना है.

यानी वाजपेयी की तर्ज़ पर मोदी विकासवाद के नारे तले अगर संघ के एजेंडे को पूरा नहीं कर सकते हैं तो फिर योगी फॉर्मूला पर संघ चलेगा ये संकेत 2017 में दे दिए गए.

पर योगी आदित्यनाथ की जो राजनीतिक काबिलियत संघ ने लगातार गोरखपुर लोकसभा सीट पर जीत में देखी उसकी ज़मीन मुख्यमंत्री बनाने के बरस भर के भीतर टूट जाएगी इसका अंदेशा न तो नागपुर को था न ही दिल्ली को.

और यहीं से अगला सवाल खड़ा होता है कि अब संघ परिवार अपने स्वयंसेवक नरेन्द्र मोदी की सियासी क्षमता पर भरोसा करें और योगी सरीखे प्रयोग को ख़ारिज कर दें या फिर योगी-मोदी के संयुक्त सियासी मंत्र के बेअसर होने की बात मानकर अपने पुराने एजेंडे पर लौटें.

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लहर किसी की नहीं

पर यहां संघ परिवार की हथेली उसी तरह खाली है जैसे मोदी के सामने किसी नेता को खड़ाकर 2019 के मैदान में कूदने के लिए विपक्ष के पास कोई नायाब चेहरा नहीं है.

ज़ाहिर है ये हालात चाहे-अनचाहे 2019 की बिसात उसी मैथेमैटिक्स पर जा टिकते हैं जहां लहर किसी की नहीं है.

जहां सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जातियों का उभार और हिन्दुत्व के नाम पर धर्मिक भावनाओं का टकराव वोटबैंक में तब्दील हो जाए.

ये हालात भी मोदी सरकार से तीन कार्य तो कराएंगे ही. पहला, राम मंदिर निर्माण के लिए नवंबर तक रास्ता साफ कर दें.

दूसरा, जनधन के नाम खुले बैंक खातों तक सरकारी मदद सीधे पहुंचाने में सक्षम हो जाएं. तीसरा, मायावती-अखिलेश की फाइलों को सीबीआई के ज़रिए खुलवा दें.

और करप्शन के ख़िलाफ़ राजनीतिक लड़ाई का मुंह 2019 के लिए मोड़ दें.

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बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद

ये हालात बिना मोदी लहर या विकास-रोज़गार के मोदी को सत्ता में ले आएंगे. मौजूदा वक्त में ये भी बड़ा सवाल है.

क्योंकि राम मंदिर निर्माण का रास्ता भी ज़्यादा से ज़्यादा 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1996 में हुए पहले लोकसभा चुनाव से ज़्यादा असर कैसे करेगा.

ये भी सवाल है. 1996 में बीजेपी को राम मंदिर लहर के बावजूद 161 सीटें मिली थीं. हालांकि उसे सबसे ज़्यादा 29.65 फ़ीसदी वोट मिले थे.

99 सीटों पर बीजेपी दूसरे नंबर पर रही थी. यानी हिन्दुत्व या राम मंदिर की लहर भी बीजेपी को 200 पार कैसे कराएगी.

ये सवाल जब 1996 में जवाब के तौर पर नहीं आया तो 2019 में कौन-सा जनादेश बीजेपी को दो सौ पार करायेगा ये सवाल है.

फिर 1996 में तो हर वोटर अयोध्याकांड से वाकिफ था. पर 2019 में तो 27 फ़ीसदी वोटर का जन्म ही 1992 के बाद हुआ है.

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युवा वोटर्स के सवाल

और कुल 38 फ़ीसदी युवा वोटर्स के सामने तो रोज़गार शिक्षा के सवाल हैं. विकास को लेकर उनकी अपनी परिभाषा सूचना तकनीकी के दौर में दुनिया से जा जुड़ी हैं.

ऐसे में हिन्दुत्व या राम मंदिर का असर युवा वोटर पर होगा कितना ये भी सवाल है. यूं लहर तो राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की भी चली थी.

पर 1991 के चुनाव में कांग्रेस भी 272 के जादुई आंकड़े को छू नहीं पाई थी.

45.69 फ़ीसदी वोट के साथ कांग्रेस को 244 सीट पर जीत मिली थी और बीजेपी को 22.47 फ़ीसदी के साथ 120 सीट पर जीत मिली.

यानी 1991 में कांग्रेस की लहर 1996 में अयोध्या कांड की लहर तले इस तरह मटियामेट हुई कि उसका वोट 45.69 फ़ीसदी से घटकर 25.78 हो गया और बीजेपी का वोट 22.47 से बढ़कर 29.65 फ़ीसदी हो गया.

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यादव, जाटव और मुसलमान गठजोड़

यानी बीजेपी सिर्फ राम मंदिर के घोड़े पर सवार होकर 2019 में सत्ता में लौट आए यह असंभव सा है.

क्योंकि 2014 में जिस उम्मीद-आस को जगाकर बीजेपी सत्ता में आई वह 2019 में कांग्रेस या कहें पूरे विपक्ष को ही हर पुराने भार से मुक्त किए हुए हैं.

यानी 2014 में मोदी के जादुई रंग ने बीजेपी को 2009 के मुकाबले 12.19 फ़ीसदी ज़्यादा वोट दिलाते हुए 31 फ़ीसदी वोट दिला दिए.

और कांग्रेस के वोट 2009 के मुकाबले 9.25 फ़ीसदी घटकर 28.55 फ़ीसदी से 18.80 फ़ीसदी ही रह गए.

यानी 1991 के बाद से सिर्फ भारतीय बाजार ही पूंजी में नहीं सिमटे बल्कि राजनीतिक बिसात भी पारंपरिक राजनीतिक मिजाज़ में सिमटकर रह गई और उसे 2014 में मोदी ने गुजरात मॉडल के ज़रिए जिस ज़ोर से धक्का दिया.

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क्या संघ का मोदी प्रेम ख़त्म हो रहा है?

संयोग से उसी गुजरात मॉडल की सांसें भी 2017 के विधानसभा चुनाव में फूलने लगी. तो फिर 2019 के लिए किस पार्टी के पास क्या कुछ देने के लिए है.

खासकर तब जब 1991 से 2014 तक लगातार जिस गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ जीतते रहे उसी गोरखपुर में नंगी आंखों से दिखाई देने वाले यादव, जाटव और मुसलमान गठजोड़ ने बीजेपी की हर हाल में जीत की कश्ती में ही छेद कर दिया.

इसी दौर में संघ परिवार के भीतर हिन्दुत्व से इतर आर्थिक सवालों को लेकर उठापटक मची रही.

किसान संघ से लेकर मज़दूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच से लेकर विहिप तक मोदी से टकराते नज़र आए.

संघ को अपने इशारे पर नचाते नरेन्द्र मोदी मज़दूर संघ, किसान संघ और स्वदेशी जागरण के पदाधिकारियों को तो बदलवा गए पर तोगड़िया की छुट्टी करा नहीं पाए और भैयाजी जोशी की जगह दत्तात्रेय होसबोले की सहकार्यवाहक के पद पर नियुक्ति भी ना करा पाए.

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संघ परिवार की हिन्दू प्रयोगशाला

और भैयाजी जोशी भी चौथी बार सरकार्यवाहक बनने के बाद राम मंदिर के साथ-साथ किसानों की बदहाली का ज़िक्र करने से भी नहीं चूके.

यानी चाहे-अनचाहे संघ परिवार का मोदी प्रेम उसी तरह ख़त्म हो रहा है जैसे कभी वाजपेयी प्रेम ख़त्म हुआ था.

उस वक्त वाजपेयी चाहते थे कि राजनीति समझने वाले मदनदास देवी सरकार्यवाह बनें. पर तब के सरसंघचालक सुदर्शन ने मोहन भागवत को सरकार्यवाह नियुक्त किया.

यानी गोरखपुर के जनादेश तले 2019 की बिसात सिर्फ विपक्ष की रणनीति पर ही नहीं टिकी है बल्कि बीजेपी-संघ परिवार की हिन्दू प्रयोगशाला पर भी टिकी है.

और अरसे बाद क्षत्रपों की महत्ता बहुत साफ़ बता रही है कि 2019 का चुनाव किसी वादे-उम्मीद-आस या चुनावी तिलिस्म पर नहीं होगा बल्कि शुद्ध सत्ता पाने की जोड़तोड़ पर होगा जिसमें जीते कोई पर वोटर हारेगा ये तय है.

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