किसानों के मुंबई तक के लॉन्ग मार्च के पीछे की कहानी

किसान आंदोलन

मध्य फ़रवरी में करीब 200 सीपीआईएम कार्यकर्ता पश्चिम महाराष्ट्र के सांगली में स्थित मराठी समाज भवन में एकत्र हुए. यहां राज्यस्तरीय सम्मेलन में तीन दिनों तक चर्चा और बहस के बाद वो एक निर्णय पर पहुंचे. यह था किसानों का लॉन्ग मार्च.

अखिल भारतीय किसान सभा को आदिवासी किसानों को मुंबई में लामबंद करने और उन्हें ले जाने की ज़िम्मेदारी दी गई. उन्होंने वन भूमि, कर्ज़ माफ़ी, डॉ स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों इत्यादि को लागू करने को लेकर भाजपा सरकार को घेरने का फ़ैसला किया.

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उनकी मांगों को मानने से पहले किसान छह दिनों तक पैदल मार्च करके मुंबई पहुंचे. महाराष्ट्र में बिना किसी महत्वपूर्ण उपस्थिति के बावजूद पार्टी ने हज़ारों किसानों को जिस तरह इकट्ठा किया वो उत्सुकता का विषय बन गया. इसमें कई ज्ञात और अज्ञात चेहरे थे जिन्होंने दिन-रात काम कर इसे सफल बनाया. लेकिन, इसके आयोजक कहते हैं कि किसानों की इस लॉन्ग मार्च से पहले कई तरह की चुनौतियां थीं.

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किसानों के लॉन्ग मार्च के बारे में किसने सोचा था?

महाराष्ट्र विधानसभा में कम्युनिस्ट पार्टी के एकमात्र विधायक जीवा पांडु गावित कहते हैं, "हम लंबे समय से वन भूमि के अधिकार को लेकर लड़ रहे थे. वन अधिकार अधिनियम को 2006 में अमल में लाया गया था, लेकिन सरकार ने इसे अच्छी तरह लागू नहीं किया. हमने पहले भी कई विरोध प्रदर्शन किए लेकिन सरकार ने हमारी मांगों को अनसुना कर दिया."

वो सात बार विधायक रह चुके हैं और नासिक और इसके आस-पास के इलाके में एक प्रभावशाली आदिवासी नेता हैं. कई किसान उनकी अपील पर इस मार्च में शामिल हुए.

वो कहते हैं, "किसानों और कार्यकर्ताओं से लंबी बातचीत के बाद, हमें लगा कि लंबे समय से चले आ रही सभी लंबित मामलों के निपटारे के लिए एक बड़े आंदोलन की ज़रूरत है."

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बिजनौर के किसान सीताराम हल में जुतने के लिए मजबूर हैं.

हज़ारों लोगों का प्रबंधन

अखिल भारतीय किसान सभा के किशन गुजर कहते हैं कि सीपीआईएम की किसान संगठन अखिल भारतीय किसान सभा को पर्चे छपवाने, कैडर तक संदेश पहुंचाने, लोगों को जोड़ने और बाकी कई कामों की ज़िम्मेदारी दी गई.

उन्होंने कहा, "तहसील स्तर के कार्यकर्ता गांव-गांव गए और पर्चे को बांटा, लोगों को इसका उद्देश्य समझाया और लोगों को लामबंद करने की भूमिका तैयार की."

किशन गुजर ने बीबीसी से कहा, "हमने 6 मार्च को चलना शुरू किया और पहले दिन 15 किलोमीटर की दूरी तय की. हमने किसानों से दो दिनों के लिए खाना लाने और बाद के दिनों में पकाने के बर्तन लाने की अपील की थी. किसानों ने तीन दिनों तक अपने घर के खाने खाए. बाद में जब हम ठाणे ज़िले में शाहपुर पहुंचे तो हमने सामुदायिक किचन शुरू किया. इस यात्रा के दौरान रास्ते में हमें सभी क्षेत्रों के लोगों ने प्रत्येक स्टॉप के दौरान अनायास भोजन-पानी दिया."

राज्य सीपीआईएम के मीडिया संयोजक प्रसाद सुब्रमण्यम कहते हैं, "हमने किसानों से पहले ही भोजन लेकर आने की अपील की थी और वो जितना ला सकते थे लेकर आए. हमने करीब दो हज़ार किलो चावल और अन्य ज़रूरत की चीजें इकट्ठे किए थे. तीन दिन के बाद हमने सामुदायिक किचन शुरू किया. हमने गांव के अनुसार समूह बनाकर लोगों को अपना खाना ख़ुद बनाने को कहा. प्रदर्शन के अंतिम दिन, सेतकारी कामगार पक्ष के नेताओं ने एक लाख भाखड़ा और बहुत-सी करी लाए."

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राहत पैकेज को लेकर तमिलनाडु के कुछ किसान दिल्ली के जंतरमंतर पर धरने पर बैठे हैं.

जीवा पांडु गावित कहते हैं, "हम शुरुआत में चिंतित थे क्योंकि हमारे पास केवल एक डॉक्टर थे. उन्हें जितने लोग बीमार पड़ते उन्हें अकेले देखना होता. हमें उनके लिए गाड़ियों का इंतज़ाम करना था. हम इस गर्मी में पैदल चलने वाले लोगों के बारे में चिंतित थे."

किस तरह एक उस पार्टी ने जिसकी राजनीतिक उपस्थिति बहुत थोड़ी है उसने हज़ारों लोगों को जुटाया?

वरिष्ठ पत्रकार सुनील तांबे कहते हैं, "पूरे महाराष्ट्र में कम्युनिस्टों की कोई उपस्थिति नहीं है, लेकिन यह एक कैडर आधारित पार्टी है इसलिए आदिवासी क्षेत्र के आस-पास की मज़बूत पकड़ है. जल, जंगल और ज़मीन, इस पार्टी का यह पुराना एजेंडा है."

तांबे कहते हैं, "मुंबई में गन्ने, कपास, प्याज़ उगाने वाले किसानों ने कई विरोध प्रदर्शन किए हैं. लेकिन यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में आदिवासी किसान राजधानी पहुंचे हैं. ख़ासतौर पर यह आदिवासी किसानों की आवाज़ को उठाने का प्रयास था."

वयोवृद्ध कम्युनिस्ट पार्टी कार्यकर्ता राज सलोखे के अनुसार, "कम्युनिस्ट पार्टी कार्यकर्ता गांव-गांव जाते हैं. वे अपने अधिकारों के बारे में किसानों के बीच जागरुकता लाने की कोशिश करते हैं. वे कठपुतली शो, नुक्कड़ नाटक और लोकगीतों के माध्यम से लोगों को पार्टी से जोड़ते हैं."

उन्होंने कहा, "किसानों के बीच एक असंतोष है क्योंकि सरकार लगातार उनकी मांगों की उपेक्षा कर रही थी. पार्टी ने केवल उनके गुस्से को एक तर्कसंगत रास्ता दिया है."

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पुलिस से मिला सहयोग

अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव वीजू कृष्णन कहते हैं, "पुलिस और प्रशासन ने बहुत अच्छी तरह से सहयोग किया है. पुलिस ने सुगम यातायात में मदद की और शहर में सभी आवश्यक सुरक्षा प्रदान किए गए."

वो कहते हैं, "जब मुंबईवासी गलियों में खाना, पानी, दवा और अन्य ज़रूरत की चीज़ें लेकर पहुंचे, जिससे हम बहुत अभिभूत हो गए."

हज़ारों टोपी और झंडे कैसे मिले?

किसानों के इस लॉन्ग मार्च को लाल आंधी का नाम दिया गया. इसमें चारों ओर हज़ारों की संख्या में लाल टोपी और झंडे दिख रहे थे.

जब बीबीसी ने यह जानना चाहा कि ये टोपी और झंडे कैसे मिले तो विजू कृष्णन ने जवाब दिया, "हमारे पास हमेशा टोपी और झंडे तैयार रहते हैं. आम तौर पर हम देश में कहीं भी होने वाले प्रदर्शन में इनका ही उपयोग करते हैं. इस तरह के आंदोलनों में शामिल होने वाले अधिकांश लोग इसे वापस लौटा देते हैं और हम कार्यकर्ताओं को इसे एकत्र करने और उन्हें अच्छी स्थिति में रखने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है."

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अगर वार्ता विफल होती तो क्या होता?

अखिल भारतीय किसान संघ के अजीत नावले कहते हैं कि अगर सरकार हमारी मांगों को नहीं मानती तो हम भूख हड़ताल पर बैठ जाते.

महाराष्ट्र के अहमदनगर क्षेत्र से लोगों को जुटाने में नावले ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. वो 2017 में हुए किसान आंदोलन में भी अगुवा रहे हैं. जिसकी वजह से महाराष्ट्र सरकार को उस दौरान किसानों की कर्ज़ माफ़ी के पैकेज की घोषणा करनी पड़ी.

आंदोलन के महत्वपूर्ण अगुवा

जिवा पांडु गावित, सीपीआई (एम) के नेता और कलवान के विधायक

नासिक के कलवान से सात बार विधायक रहे जीवा पांडु गावित सीपीआई (एम) नेता हैं और महाराष्ट्र विधानसभा में वामपंथी पार्टियों का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र विधायक. गावित, जो आदिवासी समुदाय के हैं, लो प्रोफ़ाइल रखना पसंद करते हैं और इस लॉन्ग मार्च के पीछे उन्हीं की सोच थी. इस आंदोलन से कई आदिवासी समूहों के जुड़ने के पीछे गावित एक मुख्य वजह हैं.

अखिल भारतीय किसान संघ के अध्यक्ष डॉ अशोक ढवले

डॉक्टर ढवले को हाल ही में अखिल भारतीय किसान संघ, अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रतिनिधित्व वाले किसान संघ, का अध्यक्ष चुना गया है. वो सामाजिक कार्यकर्ता गोदावरी परुलेकर के कट्टर अनुयायी हैं. ढवले 1993 से ठाणे और पालघर ज़िलों में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं और वन अधिकार अधिनियम को लागू करने और स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों सहित विभिन्न कृषि मुद्दों के लिए संघर्ष करते रहे हैं.

डॉक्टर अजीत नावले, सचिव, महाराष्ट्र राज्य अखिल भारतीय किसान संघ

जून 2017 में किसान आंदोलन के पीछे अजीत नावले ही प्रेरणास्रोत थे. उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसकी वजह से मुख्यमंत्री को कर्ज़ माफ़ी योजना की घोषणा करनी पड़ी. वो अहमदनगर ज़िले में अकोले और संगमनेर तहसील के आदिवासी इलाकों में काम करते रहे हैं. वो इस क्षेत्र से आदिवासियों को जुटाने में महत्वपूर्ण रहे.

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