नज़रिया: जहां राजीव गांधी नाकाम रहे, वहां राहुल गांधी कामयाब होंगे!

  • 18 मार्च 2018
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कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन के मौके पर राहुल गांधी ने अपने पिता राजीव गांधी की याद दिला दी.

राजीव गांधी ने भी कांग्रेस संगठन और राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन का वादा किया था. बड़ा सवाल यही है कि जहां राजीव नाकाम हुए, वहां राहुल कामयाब हो पाएंगे?

क्या वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और सामान्य कार्यकर्ताओं के बीच खड़ी दीवार गिरा पाएंगे. ग़रीबों और अमीरों के बीच की खाई पाट पाएंगे.

किसानों और नौजवानों को बेहतर ज़िंदगी देने के उनके वादे का इम्तीहान तो तब होगा जब केंद्र में राहुल गांधी के नेतृत्व वाली सरकार बनेगी और अभी इसमें वक़्त लगेगा.

इससे पहले राहुल गांधी को ये दिखाने की ज़रूरत है कि उनकी अपनी ही टीम और कार्यसमिति में युवाओं को बेहतर जगह हासिल है और वो भी पुराने दिग्गज़ों को नाराज़ किए बिना.

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सोनिया और राहुल

कहना हमेशा आसान होता है और करना मुश्किल.

जैसे राहुल हमेशा पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की बात करते रहते हैं, लेकिन पार्टी कार्यसमिति में सभी 24 लोगों को उन्होंने नॉमिनेट करना पसंद किया.

कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन की सबसे ख़ास बात ये कही जा सकती है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी की 'जुगलबंदी' कम से कम 2019 तक ज़रूर जारी रहेगी.

कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी से लेकर नई जमात तक के तमाम नेताओं के लिए ये एक अच्छी ख़बर कही जा सकती है.

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से फ़ासला रखने वाली विपक्षी पार्टियों के नेताओं को भी ये रास आएगा.

कभी सोनिया गांधी राजनीति से रिटायरमेंट की तरफ़ बढ़ती हुई दिख रही थीं और अब ऐसा लग रहा है कि उन्होंने अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार किया है.

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कड़वी हक़ीक़त

इसकी दो वजहें हो सकती हैं. एक तो ये कि एक मां के रूप में वे राहुल को कामयाब होते हुए देखना चाहती हैं.

दूसरा ये कि उन्हें लगता होगा कि सोनिया फ़ैक्टर की वजह से द्रमुक, आरजेडी, तृणमूल, एनसीपी, सपा, बसपा, लेफ़्ट और दूसरी पार्टियां कांग्रेस के साथ मिलकर एक गठबंधन बना सकती हैं.

लेकिन तुनकमिज़ाज ममता बनर्जी, मायावती और अखिलेश यादव, एम करुणानिधि, लालू यादव और शरद पवार जैसे दिग्गजों के अंहकार का टकराव एक कड़वी हक़ीक़त है.

साल 1975-77 के दौर में जो रुतबा जयप्रकाश नारायण का था या फिर संयुक्त मोर्चा सरकारों के ज़माने में हरकिशन सिंह सुरजीत की जो कद्र थी, सोनिया गांधी को भी कमोबेश वैसा ही दर्जा हासिल है कि उनके नाम पर एक-दूसरे का विरोध करने वाली पार्टियां भी साथ आ जाएं.

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ताक़तवर और प्रांसगिक

ये भी समझना होगा कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी सत्ता चलाने वाले लोग नहीं हैं बल्कि उन्होंने ख़ुद को सत्ता के संरक्षक के तौर पर पेश किया है.

साल 2004 से 2014 के दरमियां सोनिया गांधी ने ये दिखलाया कि वे बिना प्रधानमंत्री बने भी उतनी ही ताक़तवर और प्रांसगिक बनी रह सकती थीं.

राहुल गांधी भी 48 की उम्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में मंत्री बनने से बचे.

अभी भी राहुल खुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करने की जल्दबाज़ी नहीं दिखा रहे हैं.

दूसरी तरफ़ नरेंद्र मोदी विरोधी मोर्चे की अगुवाई से बचने की राहुल गांधी की हिचकिचाहट उनके राह की सबसे बड़ी बाधा है.

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मोदी से मुक़ाबला

साल 1951-52 के पहले आम चुनाव से लेकर अब तक के सभी लोकसभा चुनाव किसी बड़े चेहरे के इर्द-गिर्द लड़े गए हैं.

साल 1951-52, 1957 और 1962 के आम चुनावों में कांग्रेस की कामयाबी की बड़ी वजह पंडित नेहरू थे.

साल 1984 में अपनी मौत तक इंदिरा गांधी ने सियासी फलक पर अपना दबदबा बनाए रखा.

राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी के जीवन में भी ऐसे मौके आए जबकि पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह उस तरह से नहीं चमके.

आज जो विपक्ष की स्थिति है, उसमें न तो कांग्रेस के पास और न ही किसी और में मोदी के कद्दावर शख़्सियत से मुक़ाबले का कोई माद्दा है.

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विपक्ष की कमज़ोरी

साल 2019 के चुनाव में विपक्ष की सबसे बड़ी कमज़ोरी यही होने जा रही है.

इंदिरा की तरह ही मोदी में किसी भी चुनाव को मेरे बनाम बाक़ी की लड़ाई में तब्दील करने का और उसे जीतने का माद्दा है.

जब इंदिरा गांधी ने देखा कि समाजवादी धड़े के लोग और पिछड़े वर्ग के नेता लोहिया के साथ तालमेल बिठा रहे थे तो उन्होंने इससे मुक़ाबला करने के लिए अपनी 'महिला होने' और 'शालीन पृष्ठभूमि' का सहारा लिया.

20 जनवरी, 1967 को रायबरेली में इंदिरा गांधी ने कहा कि औरत होना उनकी ताक़त है और जब एक भाषण में उन्होंने कहा कि पूरा देश मेरा परिवार है तो कुछ लोग उन्हें 'मदर इंडिया' कहने लगे.

उन्हीं दिनों जयपुर की एक सभा में इंदिरा गांधी ने महारानी गायत्री देवी और पुराने रजवाड़ों पर हमला बोला. 1962 का लोकसभा चुनाव महारानी गायत्री देवी ने बहुत बड़े मार्जिन से जीता था.

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कांग्रेस का इतिहास

स्वतंत्र पार्टी की समर्थक गायत्री देवी इंदिरा गांधी की मुखर विरोधियों में से एक थीं. जनसंघ से उनकी क़रीबी थी.

इंदिरा गांधी ने मतदाताओं से सीधा सवाल पूछा, जाकर अपने महाराजाओं और महारानियों से पूछो कि जब वे राज कर रहे थे तो उन्होंने अपने राज्य के लोगों के लिए क्या किया. अग्रेज़ों से लड़ाई में उनका क्या योगदान था.

दशकों बाद मोदी ने भी अपनी 'चायवाले की ग़रीब पृष्ठभूमि' को कांग्रेस के 'कुलीन नेतृत्व' के विरोध में इस्तेमाल किया. मणिशंकर अय्यर के बयान से भी मोदी को काफ़ी मदद मिली थी.

कांग्रेस का 84वां महाधिवेशन कई चीज़ों के लिए याद किया जाएगा. मंच पर ऐसा कोई बैनर नहीं था जो कांग्रेस का इतिहास दिखला सके.

न तो मंच पर महात्मा गांधी की तस्वीर थी, न जवाहरलाल नेहरू, न सरदार पटेल, न सुभाष चंद्र बोस, न मौलाना आज़ाद और न ही इंदिरा गांधी की तस्वीर थी.

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यथास्थितिवादी रवैया

वरिष्ठ नेताओं को मंच पर बैठने की जगह नहीं दी गई, शायद इसकी वजह ये थी कि उनके बैठने के इंतज़ाम से राहुल की पसंद-नापसंद का संकेत मिल सकता था.

पार्टी में सुधार के लिए उठाए जाने वाले कदम कांग्रेस के पुराने दिग्गजों के यथास्थितिवादी रवैये की वजह से उस वक्त बेअसर हो गए जब राहुल गांधी को पार्टी कार्यसमिति के सभी 24 पदों पर लोगों को नॉमिनेट करने की ताक़त दे दी गई.

पार्टी नेतृत्व ने उन मुद्दों पर खुली बहस की छूट नहीं दी जिनका सामना पार्टी कर रही है.

इनमें विचारधारा से जुड़े सवाल थे, चुनाव वाले राज्यों में मुख्यमंत्री पद का चेहरा पेश करने की ज़रूरत का मुद्दा था. ईवीएम का विरोध किया जाए या नहीं या फिर पुराने बैलट पेपर की मांग की जाए, ये सवाल था.

ईवीएम का मुद्दा ममता बनर्जी और मायावती जैसे संभावित सहयोगियों को पसंद आ सकता था, लेकिन इससे पहले कांग्रेस को अपने लाखों समर्थकों से ये पूछना चाहिए कि क्या उन्हें ईवीएम पर संदेह है या नहीं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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