ब्लॉग: 15 साल बाद सही पर राहुल का ये अंदाज़ मोदी को परेशान करने वाला है!

  • 19 मार्च 2018
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15 साल ज़रूर लगे, लेकिन राहुल गांधी राजनीति के मैदान में अब पांव जमाते दिख रहे हैं.

इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में कांग्रेस महाअधिवेशन के दौरान अध्यक्ष के रूप में दिए गए उनके भाषण से ज़ाहिर होता है कि वे परिपक्व हो रहे हैं, लेकिन वे अपनी ग़लतियों से लगातार सीख भी रहे हैं, इसका साबित होना बाकी है.

ये कोई पहली बार नहीं है जब उन्होंने ख़ुद को लेकर उम्मीद जगाई है, चाहे वो संसद के अंदर सज़ा पाए सांसदों के चुनाव लड़ने पर रोक संबंधी विधेयक को फाड़ने का मामला रहा हो या फिर गुजरात विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को उनके घर में चुनौती देने की बात हो, राहुल में लोगों को स्पार्क नज़र आया था.

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चुनाव कुछ महीने दूर

लेकिन पार्टी को मज़बूत करने की कोशिश में वे निरंतर जुटे हैं, इसका भरोसा नहीं होता.

गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बराबरी की टक्कर देने के बाद त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के चुनाव में वे अचानक से ग़ायब हो गए.

इससे ना केवल विपक्ष के सामने उनकी पार्टी की स्थिति कमज़ोर होती है बल्कि उनके कार्यकर्ताओं का हौसला भी कम होता है.

बहरहाल, कांग्रेस अध्यक्ष को मालूम है कि पार्टी सबसे अहम चुनाव से अब महज कुछ महीने दूर रह गई है.

मौजूदा सरकार को कांग्रेस तभी चुनौती दे पाएगी जब संगठन मज़बूत होगा और ज़मीनी स्तर पर संघर्ष करने लायक होगा.

लिहाजा उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को एक नए उत्साह से भरने का काम किया है.

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एंटी इनकैंबेंसी फैक्टर

लेकिन ये उत्साह क्या रंग दिखता है और राहुल खुद को इसके लिए कितना झोंकते हैं, इसका इम्तिहान 2019 के आम चुनाव से पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक के चुनाव में हो जाएगा.

इन राज्यों में अपेक्षाकृत कांग्रेस का संगठन मजबूत है और बीजेपी की सरकार को लेकर एंटी इनकैंबेंसी फैक्टर भी है, तो राहुल को शुरुआत यहीं से करनी होगी.

अगर इन चार राज्यों में अगर कांग्रेस वापसी कर पाती है, कम से कम तीन राज्यों में भी तभी जाकर कांग्रेस और राहुल गांधी में लोगों और दूसरे राजनीतिक दलों का भरोसा बढ़ेगा.

इसके बाद भी राहुल उस स्थिति में आ पाएंगे जहां से वो नरेंद्र मोदी को ललकार सकें.

अपने भाषण में उन्होंने इस लड़ाई को गंभीरता से लेने के संकेत तो दिए हैं, लेकिन क्या ये संभव होगा?

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राहुल का वादा

राहुल ने कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच दीवार को खत्म करने की बात उन्होंने जिस अंदाज़ में कही, उस पर कार्यकर्ता देर तक ताली बजाते रहे.

इसके अलावा कार्यकर्ता भी नेता बनने की काबिलियत रखते हैं, उन्हें मौका मिलेगा. टिकट मिलेगा. इस वादे से राहुल ने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की उम्मीदों पंख दे दिया है.

वैसे राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस का संगठन इतना कमजोर हो चुका है कि उसे आईसीयू से निकालने के लिए राहुल गांधी को अपना पूरा जोर लगाना होगा.

इस लिहाज से देखना होगा कि आने वाले दिनों में वे कार्यकर्ताओं को किस तरह से मिशन में झोंकते हैं.

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संगठन का ढांचा

उन्होंने जल्द ही संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव की बात कही है, ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस में नए चेहरों को जगह मिलेगी.

अपने दौर में राजीव गांधी ने भी कांग्रेस में नए लोगों को जगह दी थी जिनमें मणिशंकर अय्यर, अशोक गहलोत, सीपी जोशी, सुनील दत्त, मुकुल वासनिक और अजीत जोगी जैसे नेता उभरे थे.

देखना होगा कि राहुल गांधी ये कितनी जल्दी और कितनी बख़ूबी से कर पाते हैं. उत्तर भारतीय राज्यों में ना तो उनके पास चेहरे हैं और ना ही संगठन का ढांचा मज़बूत है.

लेकिन राहुल ने ये संकेत दे दिया है कि ये काम उनके एजेंडे में है.

जितना फ़ोकस उन्होंने इस मुद्दे पर दिया है, उस हिसाब से वो आधा भी कर पाए तो कांग्रेस की मौजूदा स्थिति बहुत हद तक बदल सकती है.

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मनमोहन के रास्ते पर मोदी

हालांकि बिहार और उत्तर प्रदेश में सहयोगी दल और उन दलों के समर्पित वोट बैंक को देखते हुए 2019 तक स्थिति में बहुत बदलाव होने के आसार नहीं हैं.

इसके अलावा अपने भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष ने रोज़गार और किसान का मुद्दा मज़बूती से उठाया. ये एक तरह से लोगों की दुखती रग को पकड़ने जैसा है.

लेकिन आम लोगों को ये भी समझना होगा कि रोज़गार और खेती-किसानी के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी सरकार उसी रास्ते पर चल रही है, जो मनमोहन सिंह की सरकार ने तैयार किया था.

मोदी सरकार ने अपने पिछले चार साल के शासन में उन प्रक्रियाओं को केवल एक्सीलरेट भर किया है.

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बेरोजगारों में नाराज़गी

ये बात ठीक है कि मौजूदा सरकार के प्रति आम किसानों और बेरोज़गारों में नाराज़गी बढ़ी है, लेकिन कांग्रेस के पास समस्या का मुमकिल हल क्या होगा, इसको लेकर कांग्रेस को अपनी रणनीति पर मेहनत करनी होगी.

राहुल गांधी ने समस्या के निदान की ओर इशारा किया है, लेकिन बात चाहे किसानों को सीधे बाज़ार से जोड़ने की हो या फिर चीन जैसी रफ्तार से लोगों को रोज़गार देने की, इसके लिए पूरे देश में एक नई संस्कृति की ज़रूरत है, भ्रष्ट हो चाहे साफ सुथरी संस्कृतियां इतनी जल्दी नहीं बना करती हैं.

लेकिन राहुल की तारीफ़ इस बात के लिए करनी होगी कि उन्होंने रोज़गार के मुद्दे पर मध्य प्रदेश सरकार के व्यापम घोटाले के डिज़ाइन को पूरे देश में फैलाए जाने का ज़िक्र कर उसे मुद्दा बनाने की दिशा में शुरुआत कर दी है.

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बीजेपी खेमे की चिंता

ख़ास बात ये है कि राहुल पहले अंग्रेज़ी में बोले और बाद में ज़्यादा देर तक हिंदी में बोले.

मंदिर, पुजारी और पूजा को लेकर कहानियां सुनाते वक्त थोड़ा अटके ठहरे ज़रूर, लेकिन ऐसा लग रहा था कि वे केवल उत्सुकता जगाने के लिए अटक रहे हैं, संबोधन में प्रवाह दिख रहा था और ऐसा लग रहा था कि राहुल मौलिक अंदाज़ में बोल रहे हैं.

उनका सधा हुआ लहजा और आक्रामक अंदाज़, बीजेपी खेमे को चिंता में डाल सकता है.

लेकिन कांग्रेस की बड़ी मुश्किल यही है कि उसके सामने भारतीय जनता पार्टी के अलावा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे संगठन से पार पाने की चुनौती भी है.

वैसे तो, नरेंद्र मोदी सरकार लगातार भ्रष्टाचार मुक्त होने का दावा करती रही है, लेकिन उसके लिए पिछले एक दो महीने काफ़ी मुश्किलों वाले रहे हैं.

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कांग्रेस का रोडमैप

राहुल गांधी ने पीएम मोदी की छवि को लेकर भी सवाल उठाए.

उन्होंने ललित मोदी, नीरव मोदी और नरेंद्र मोदी को आपस में इस तरह कनेक्ट किया जिसे इस तौर पर देखा जा सकता है कि एक तो घोटाले थमे नहीं हैं और ऐसे घपलों में सीधे प्रधानमंत्री तक की संलिप्तता है.

इसके अलावा उन्होंने अमित शाह को हत्या का अभियुक्त बताते हुए कहा कि बीजेपी ऐसे शख्स को अपना अध्यक्ष बना सकती है, लेकिन कांग्रेस में ऐसा कभी नहीं होगा.

राहुल गांधी ने नोटबंदी और गब्बर सिंह टैक्स का उदाहरण देते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी ग़लतियों की कभी माफ़ी नहीं मांगते. वे माफ़ी मांगने वालों में नहीं हैं.

राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर इस भाषण से आने वाले दिनों में कांग्रेस का रोडमैप तैयार कर दिया है.

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सरकार में वापसी का भरोसा

उन्होंने अपने इस भाषण में मुख्य तौर पर तीन बातों पर फ़ोकस किया है- मोदी सरकार की नाकामी पर हमला, कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार और भरोसा, कि हम सरकार में वापसी कर लेंगे.

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी की पार्टी, ऐसा करिश्मा नहीं कर सकती.

लेकिन इस करिश्मे के लिए राहुल गांधी को अपने कार्यकर्ताओं के साथ खुद ही संघर्ष के लिए उतरना होगा. जिस दिन राहुल गांधी आम लोगों के मुद्दों पर सड़कों पर उतर आएंगे, लोगों से उनका कनेक्ट बनने लगेगा, उसी दिन से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चिंताएं बढ़ने लगेंगी.

उन्हें वह रास्ता चुनना होगा, जिसका ज़िक्र करते हुए उन्होंने ख़ुद ही कहा है- लड़ना है, बिना डरे, शेरों का संगठन है.

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सड़क पर संघर्ष

राहुल गांधी और उनके नेताओं को इसे अपनाना होगा और समय बहुत कम है और अब सीखने का वक्त भी बीत चुका है.

राहुल गांधी अब तक मिले अहम मौकों पर सड़क पर संघर्ष करते रहने से बचते आए हैं.

राजीव गांधी के सामने इस तरह की नौबत नहीं आई थी, लेकिन राहुल गांधी इस मामले में इंदिरा गांधी से सीखना होगा, वरना वो खाई बनी रहेगी, जिसे पार किए बिना कांग्रेस सत्ता में नहीं लौट पाएगी.

इस संघर्ष की शुरुआत राहुल को ख़ुद से करनी होगी. वे आगे रहेंगे, कार्यकर्ता साथ रहेंगे तभी लोग भी पीछे-पीछे आएंगे, ये बात दूसरी है कि ये सब इतनी आसानी से होता नहीं है.

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