नज़रिया: योगी ने अपनी ही पहचान को धूमिल कर लिया!

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ठीक 12 महीने पहले जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब ऐसा लग रहा था कि हिन्दुस्तान के सबसे बड़े प्रदेश में कुछ नया होने वाला है.

आख़िरकार इतिहास में पहली बार एक भगवाधारी साधु प्रदेश की सर्वोच्च कुर्सी पर आसीन हुआ था. आज योगी आदित्यनाथ को इस महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठे एक साल हो गया है और इस बीच जैसे उन्होंने कुछ पाया और कुछ खोया, वैसे ही प्रदेश ने भी कुछ पाया और कुछ खोया है.

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दिन केवल योगी के बदले

19 मार्च 2017 को जब योगी ने शपथ लेते ही वादों का पिटारा खोल दिया और अपनी तेज़तर्रार आवाज़ से प्रदेशवासियों को ये भी विश्वास दिला दिया कि वो हवाई बातें नहीं करते हैं और सच में उत्तर प्रदेश का कायाकल्प कर देंगे.

सबको इस बात की समझ थी कि इस प्रदेश की हर समस्या के धरातल में भ्रष्टाचार बसा हुआ है.

ये मानते हुए कि प्रदेश में बहुत समय बाद कोई ईमानदार व्यक्ति मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुआ है, लोगों की ये धारणा बनी कि अब प्रदेश के दिन बिसरने वाले हैं.

दिन तो बदले पर शायद केवल योगी आदित्यनाथ के लिए. गोरखनाथ मंदिर के महंत जो कि खुलेआम जनता को दर्शन देते थे और उनकी समस्याएं सुलझाते थे, अब ब्लैक कमांडो की कड़ी सुरक्षा में एक क़िले के अंदर रहने लगे. वो आदित्यनाथ जो ज़मीनी हक़ीक़त को समझने के लिए ख़ुद ज़मीन पर रहते थे, अब हेलिकॉप्टर से नीचे का दृश्य देखने लगे.

सुरक्षाकर्मियों और नौकरशाही से हमेशा घिरे हुए आदित्यनाथ अब छन कर (फिल्टर्ड) आई सूचना पर निर्भर हो गए. हां, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि ये हुई कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ ही ज़िलों तक सीमित रहने वाले ये साधु (योगी) भाजपा के राष्ट्रीय स्तर तक स्टार प्रचारक बन गए.

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Image caption अगस्त में गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में 70 बच्चों की ऑक्सीजन की कमी से मौत हो गई थी

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बरसों तक मठाधीश होने के कारण आदत बन चुकी थी अपनी ही बात मनवाने की ना कि दूसरों की बात मानने की. मठ के भक्तों को तो आदत थी दिन को भी रात कहने की.

पर एक लोकतांत्रिक सरकार के सर्वोच्च पद पर बैठ कर मठाधीश बन कर रहना तो संभव नहीं था. लेकिन स्वार्थी, भ्रष्ट और नकारा नेता और नौकरशाही समय के साथ हावी होती गई.

योगी और आमजन के बीच की खाई बढ़ती गई. जो "वाह-वाह" की बीमारी समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की मायावती को ले डूबी, वो ही योगी आदित्यनाथ की सरकार को भी तेज़ी से दीमक लगाने लग गई, जिससे वो ख़ुद बेख़बर रहे.

'जी हुजुरी' सुनने की आदत पड़ जाने पर जब कोई हक़ीक़त का अहसास दिलाने का प्रयास करता तो वो दुश्मन हो जाता है.

यहां तक कि जब उनके अपने शहर गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में 70 बच्चे ऑक्सिजन की कमी के कारण मरे तब उन्होंने मीडिया को 'झूठी ख़बर' फ़ैलाने का दोषी ठहरा दिया.

उल्टा उस ज़िलाधिकारी (डीएम) को सीने से लगा लिया जिसे इस बात का दोषी मानना चाहिए था. और तो और डीएम को तब हटाया जब पानी सिर के ऊपर चला गया और डीएम के नकारेपन का खामियाज़ा उनके ही लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव की हार के रूप में भुगतना पड़ा.

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एक साल और 1100 एनकाउंटर

इसी तरह अपनी आंख पर पट्टी बांध कर अपने सहयोगी उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और नौकरशाहों के झूठ को सच मान कर यक़ीन कर लिया कि उनके प्रदेश की सड़कों को गड्ढा मुक्त कर देने का वादा पूरा हो गया.

असलियत ये है कि लखनऊ को छोड़ कर अन्य सभी शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें आज भी पूरी तरह गड्ढा युक्त हैं.

क़ानून-व्यवस्था को सुधारने के लिए उन्होंने एनकाउंटर करवाना ही सही रास्ता समझ लिया और कुछ ही महीनों में 1,100 से अधिक एनकाउंटर करवा डाले. ये बात अलग है कि इनमें मरने वालों की संख्या केवल 43 ही है. उसमें भी कई छुटभैय्ये हैं.

कहने को तो एनकाउंटर में मारे गए सभी अपराधी 'इनामी' बताए जाते हैं पर उनमें ऐसे भी हैं जिनके लिए इनाम की घोषणा उनके एनकाउंटर होने के कुछ ही दिन पहले की गई. कुछ ऐसे भी निकले जिन्हें जेल से ज़मानत पर छूटते ही गोली का शिकार बना दिया गया.

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एनकाउंटर से इन्वेस्टर्स समिट का कनेक्शन?

एनकाउंटर की होड़ भी तभी तक लगी रही जब तक लखनऊ में 22-23 फ़रवरी को एक बहुत ही विशाल 'इन्वेस्टर्स समिट' नहीं हो गया. आख़िर इन्वेस्टर्स को यूपी से दूर रखने वाली उत्तर प्रदेश की बुरी क़ानून-व्यवस्था में सुधार दिखाना ज़रूरी था.

ये सच है कि इतना बड़ा इन्वेस्टर्स समिट पहले कभी नहीं हुआ जिसमें अरबों का खर्चा केवल साज-सज्जा और अन्य इंतज़ामों में कर दिया गया.

लेकिन जैसे ही इस बात पर ज़ोर दिया गया कि प्रदेश के सालाना बजट के बराबर ही इस समिट में साइन किए गए मसौदे (एमओयू) भी 4,28,000 करोड़ के हैं, ये स्पष्ट हो गया कि दाल में कुछ काला है, वरना धनराशि की ऐसी उचित व्यवस्था नहीं हो सकती.

दूसरी ओर मुकेश अंबानी, कुमारमंगलम बिड़ला, गौतम अडाणी, आनंद महिंद्रा सरीखे भारी भरकम उद्योगपतियों के इस समिट में शामिल होने से योगी का कद ऊंचा हुआ, लेकिन साथ ही यह भी पता चला कि ये सभी उद्योगपति अन्य कई प्रदेशों में इस प्रकार के इन्वेस्टर्स समिट्स में ऐसे ही वादा करते आए हैं.

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साख बनाने में भले ही समय लगता हो, गिरने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता. और ऐसा ही हुआ. गोरखपुर, जहां से वो स्वयं लगातार पांच बार लोकसभा सदस्य चुने गए और जहां उससे पहले उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ तीन बार जीते, योगी आदित्यनाथ अपने नुमाइंदे को 2018 के मार्च में हुए उपचुनाव जीता नहीं पाए. उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. जम कर प्रचार किया और डेढ़ दर्जन से भी ज़्यादा जनसभाएं की थीं.

काश वो ज़मीनी हक़ीक़त को समझने की कोशिश करते; जनता से संवाद बनाए रखा होता; अपने आप को तमाम बंदिशों में जकड़ने नहीं दिया होता; दिलों दिमाग़ के दरवाज़ों में ताले नहीं लगाए होते और सबसे ज़रूरी अपनी सोच को इतना सीमित ना किया होता और अपने प्रिय नारे, "सबका साथ-सबका विकास" को सही मायने में लागू किया होता तो इतनी जल्दी इतना सब खोना नहीं पड़ता.

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