नज़रिया: कांग्रेस की राजनीति में परदे के पीछे सक्रिय प्रियंका गांधी

  • 19 मार्च 2018
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कांग्रेस के महाधिवेशन में वैसे तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी मंच पर दिखते रहे, लेकिन मां-बेटे के अलावा परदे के पीछे प्रियंका गांधी भी जुटी हुई थीं.

प्रियंका अधिवेशन के दो-तीन दिन पहले से ही इंदिरा गांधी स्टेडियम की तैयारियों पर नजर बनाए हुए थीं.

शनिवार को सोनिया गांधी ने मच्छर की समस्या की शिकायत की थी तो वे देर रात तक मच्छरों को भगाने वाला स्प्रे अपनी निगरानी में कराती रहीं.

रविवार को वो पर्दे के पीछे से वॉकी-टॉकी लेकर इंतज़ाम में तालमेल बनाती नजर आईं थी.

प्रियंका ने ही मंच पर बोलने वाले वक्ताओं की सूची को अंतिम रूप दिया और पहली बार युवा और अनुभवी वक्ताओं का एक मिश्रण दिया.

यहां तक कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी समेत करीब-करीब सभी के भाषण के 'फैक्ट चेक' का जिम्मा भी लिया.

इस दौरान प्रियंका गांधी ने ये पूरा ध्यान रखा कि उनकी तस्वीर सामने न आए ताकि लोगों का पूरा ध्यान कांग्रेस अधिवेशन पर ही रहे.

नवजोत सिंह सिद्धू ने मंच से प्रियंका गांधी की तारीफ़ की और कहा कि वे उनकी वजह से ही कांग्रेस में आए हैं.

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भैयाजी के नाम से मशहूर प्रियंका गांधी

प्रियंका गांधी नेहरू गांधी परिवार की वो सदस्य हैं जिनको लेकर लोगों में कौतुहल बना रहता है.

माना जाता है कि वो अपने परिवार के किसी भी सदस्य से ज्यादा असर पैदा कर सकती हैं लेकिन वो सक्रिय राजनीति में बिलकुल नहीं आती.

वो चुनाव मैनेज कर लेती हैं, लेकिन खुद चुनाव नहीं लड़ती. प्रियंका बड़ी सभाओं के बजाय छोटी सभाएं करना पसंद करती हैं.

ये पहली बार नहीं है कि प्रियंका गांधी अपनी मां और भाई की मदद कर रही हैं. रायबरेली और अमेठी में पार्टी का पूरा काम प्रियंका गांधी ही संभालती हैं.

वहां लोगों के बीच 'भैयाजी' के नाम से मशहूर प्रियंका लोगों के बीच में बहुत ही सहजता से मिलती हैं.

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समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन

पिछले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी की पहल पर ही समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच में गठबंधन हुआ था.

राहुल गांधी की तरफ से प्रियंका गांधी ने ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से बात की और पूरे गठबंधन की रूपरेखा रखी.

इस गठबंधन को लेकर पर्दे के पीछे से जो रोल प्रियंका गांधी निभा रही थीं उसकी पुष्टि तब हुई जब कांग्रेस पार्टी के उत्तर प्रदेश के इंचार्ज और महासचिव गुलाम नबी आजाद ने गठबंधन के लिए प्रियंका गांधी को धन्यवाद दिया था.

उस समय ये अंदाजा लगाया जा रहा था कि राहुल गांधी के बजाय प्रियंका गांधी की भूमिका ज्यादा सक्रिय होगी.

राजनीतिक जानकार मानते है कि अगर उत्तर प्रदेश का गठबंधन सकारात्मक परिणाम लाता तो प्रियंका गांधी की भूमिका ज्यादा मजबूत होती.

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कांग्रेस से लोगों को जोड़ती प्रियंका

वैसे प्रियंका गांधी की भूमिका लोगों को कांग्रेस में जोड़ने में भी काफी मजबूत रही है.

इस अधिवेशन में नवजोत सिंह सिद्धू ने तो बाकयदा प्रियंका गांधी की तारीफ करते हुए कहा था उनसे मिलने के बाद ये तय हो गया था कि देश का भविष्य कांग्रेस ही तय कर सकती है.

गुजरात चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले हार्दिक पटेल ने भी प्रियंका गांधी को राजनीति में सक्रिय नेता के तौर पर देखने की इच्छा जाहिर की थी.

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कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय

प्रियंका कांग्रेस कार्यकर्ताओं से भी समय-समय पर मिलती रहती हैं. बीच सड़क पर रुक कर किसी भी कार्यकर्ता को नाम से पुकार लेती हैं.

लोगों के बीच जाना, बात करना जैसे गुण खासे पसंद किए जाते हैं. प्रियंका गांधी से कार्यकर्ताओं का जुड़ाव अच्छा है.

प्रियंका कार्यकर्ता के परिवार का हालचाल पूछना नहीं भूलती हैं. इस तरह वोटर से भी संवाद बनाने का उनका तरीका निराला है.

राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने से पहले और हर चुनाव के दौरान प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग पार्टी के अंदर उठती रही है.

जबकि प्रियंका ने हर बार यही कहा कि राहुल ही पार्टी का जिम्मा संभालेंगे.

सोनिया गांधी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद रायबरेली की सीट से प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की भी चर्चा हुई जिसे प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी दोनों ने नकार दिया.

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इंदिरा गांधी की छवि

प्रियंका की तुलना अक्सर उनकी दादी इंदिरा गांधी से होती है. प्रियंका का हेयरस्टाइल, कपड़ों के चयन और बात करने के सलीके में इंदिरा गांधी की छाप साफ नजर आती है.

ये भी एक वजह है कि प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने को लेकर चर्चा हमेशा रहती है. प्रियंका गांधी ने अपना पहला सार्वजनिक भाषण 16 साल की उम्र में दिया था.

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रियंका गांधी को बनारस से चुनाव लड़ाना चाहती थी लेकिन मोदी के खिलाफ खड़े होने के जोखिम से उन्हें बचने की सलाह दी गई थी.

अगर प्रियंका राजनीति में इस हद तक शामिल हैं तो फिर परदे के पीछे क्यों हैं?

क्या वजह है कि प्रियंका सक्रिय राजनीति से परहेज करती हैं. ये सवाल बार बार उठता है कि प्रियंका नेता है पर राजनीति से दूर क्यों रहती हैं.

हाल ही सोनिया गांधी ने एक न्यूज चैनल से बातचीत के दौरान कहा था कि प्रियंका गांधी अभी अपने बच्चों को संभालने में लगी है. ऐसे में राजनीति कैसे करेंगी?

हालांकि सोनिया गांधी ने कहा कि ये प्रियंका तय करेंगी कि वो राजनीति में कब आना चाहती हैं.

लेकिन ये साफ है कि सोनिया गांधी फिलहाल प्रियंका को राजनीति में नहीं आने देना चाहती हैं.

सोनिया गांधी बखूबी समझती हैं कि जैसे ही प्रियंका गांधी ने राजनीति मे कदम रखा वैसे ही भाई-बहन के बीच तुलना शुरू हो जाएगी. पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ जाएगी.

जो कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित होगा. साथ ही प्रियंका गांधी के आने से राहुल गांधी के ग्राफ पर असर पड़ सकता है.

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राबर्ट वाड्रा पर भ्रष्टाचार के आरोप

प्रियंका गांधी के पति राबर्ट वाड्रा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. जानकार मानते हैं कि ये उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है.

जैसे ही वो सक्रिय राजनीति में आएंगी उन पर ये मुद्दा हावी हो जाएगा.

राजनीति में प्रियंका के कदम बढ़ाते ही दूसरी पार्टियां राबर्ट वाड्रा को लेकर उन पर हमला बोल देंगी. इससे प्रियंका का नैतिक पक्ष कमजोर होगा.

राबर्ट वाड्रा के विवाद में आने के पहले से ही प्रियंका अमेठी और रायबरेली तक सिमटी रही हैं.

वैसे पार्टी में एक तबका ये भी मानता है कि प्रियंका गांधी ने कभी भी राष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार नहीं दिए. किस मुद्दे पर वो क्या सोचती हैं वो खुल कर नहीं बोली.

सिर्फ गांधी नेहरू परिवार के सदस्य होने के नाते उन्हें लोग स्वीकार लेंगे इसे लेकर लोगों में आशंका है.

हालांकि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस प्रियंका गांधी को एक बंद मुट्ठी की तरह रखना चाहती है.

जब तक प्रियंका गांधी राजनीति में औपचारिक तौर पर नहीं आ जातीं, तब तक उनके नेतृत्व कौशल पर कोई सवाल भी नहीं उठेगा.

यह प्रियंका ही नहीं, राहुल और कांग्रेस के लिए भी अच्छा है.

अगर प्रियंका का राजनीति में औपचारिक पदार्पण होगा, तो इससे पहला संदेश यही जाएगा कि कांग्रेस ने राहुल गांधी को ख़ारिज कर दिया है.

अगर प्रियंका सफल हो जाती है तो बहुत बढ़िया होगा लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो प्रियंका और कांग्रेस की भविष्य की राजनीति के लिए विकल्प भी खत्म हो जाएगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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