जेएनयू मामला: कैम्पस में कोई छेड़े तो कब, कहां और कैसे करें शिकायत ?

जेएनयू के प्रोफेसर के खिलाफ प्रदर्शन करते छात्र

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी एक बार फिर उबाल पर है.

इस बार कथित 'देश विरोधी नारों' के लिए नहीं बल्कि वहीं के एक प्रोफ़ेसर पर लगे कथित यौन उत्पीड़न के आरोप की वजह से.

जेएनयू के स्कूल ऑफ़ लाइफ़ साइंसेज़ की छात्राओं ने अपने ही प्रोफ़ेसर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है.

इस मामले में एफ़आईआर दर्ज हो गई है, विवादों के घेरे में आए प्रोफ़ेसर ने अपने प्रशासनिक पदों से इस्तीफा भी दे दिया है.

लेकिन यूनिवर्सिटी छात्र प्रोफ़ेसर की गिरफ़्तारी की मांग पर अड़े हैं.

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बढ़ रहे हैं यौन उत्पीड़न के मामले

लेकिन ऐसा नहीं कि केवल जेएनयू में ही इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं.

मानव संसाधन राज्य मंत्री डॉक्टर सत्यपाल सिंह के मुताबिक देश भर के विश्वविद्यालयों में यौन उत्पीड़न के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं.

संसद में दिए बयान के मुताबिक़ साल 2016-17 में विश्वविद्यालयों से कुल 149 ऐसे मामले रिपोर्ट किए गए हैं जबकि अलग-अलग कॉलेजों से 39 मामले सामने आए.

2015-16 में देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में 94 मामले सामने आए थे और अलग-अलग कॉलेजों में यौन उत्पीड़न के 18 मामले सामने आए थे.

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क्यों बढ़ रहे हैं यौन उत्पीड़न के मामले?

जेएनयू में पिछले साल तक GSCASH हुआ करता था. 1999 में GSCASH बना था. GSCASH यानी जेंडर सेंसेटाइज़ेशन कमेटी अगेंस्ट सेक्शुअल हैरेसमेंट.

इस कमिटी में यौन उत्पीड़न सबंधी कोई भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती थी.

लेकिन पिछले साल से इस कमेटी को ख़त्म करके इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (आईसीसी) लाई गई है. दोनों समितियों में एक बुनियादी अंतर है.

इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (आईसीसी) में सदस्य नामांकित होते हैं जबकि GSCASH में सभी सदस्यों का चुनाव किया जाता था.

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यौन उत्पीड़न के मामलों में

ऐसी कई समितियों में यौन शोषण के मुद्दे पर बाहरी प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रही लक्ष्मी मूर्ति के मुताबिक़ GSCASH कई मायनों में आईसीसी से बेहतर समिति हुआ करती थी.

GSCASH में ऐसे कई प्रावधान थे जो यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़ित को ज़्यादा अधिकार देते थे.

उनके मुताबिक़ आईसीसी यौन उत्पीड़न की शिकायतों को निपटाने में सक्षम नहीं है.

अक्सर वहां के सदस्य प्रशासन के इशारों पर काम करते नज़र आते हैं क्योंकि प्रशासन ही उनको उस पद पर बिठाता है.

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आईसीसी में कैसे करें शिकायत?

यौन उत्पीड़न के मामलों के लिए 2013 में यूजीसी ने एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया था.

प्रोफ़ेसर मीनाक्षी गोपीनाथ इसकी अध्यक्ष थीं. उन्होंने 'सक्षम' नाम से एक रिपोर्ट यूजीसी को बना कर दी.

इस रिपोर्ट के बाद ही यूजीसी ने हर उच्च शैक्षणिक संस्थान में इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (आईसीसी) बनाने की अधिसूचना जारी की थी.

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यौन उत्पीड़न की शिकायत

आईसीसी में यौन उत्पीड़न की शिकायत करने के लिए पीड़ित को एक विशेष फ़ॉर्म भरना पड़ता है.

ऐसी किसी भी शिकायत को करने की समय सीमा, घटना के होने के तीन महीने बाद तक की तय की गई है.

किसी ऐसी परिस्थिति में जहां से लिखित में शिकायत दर्ज न कराई जा सके, पीड़ित को तीन महीने का अतिरिक्त समय और दिया जा सकता है, बशर्ते कमिटी इस बात के लिए तैयार हो जाए.

यौन उत्पीड़न की शिकायत दोस्त, रिश्तेदार, सहपाठी, मनोवैज्ञानिक या पीड़ित से जुड़ा कोई संबंधी भी कर सकता है.

आईसीसी कैसे करती है जांच?

आईसीसी को लिखित में शिकायत मिलने के सात दिन के भीतर शिकायत के घेरे में आए व्यक्ति को इसकी कॉपी भेजने का प्रावधान है.

शिकायत की कॉपी मिलने के 10 दिन के अंदर उस व्यक्ति को अपना जवाब आईसीसी को भेजना होता है.

आईसीसी के नियमों के मुताबिक यौन उत्पीड़न से संबंधित शिकायत की जांच 90 दिन के अंदर पूरी हो जानी चाहिए.

जांच पूरी होने के बाद कमेटी जांच रिपोर्ट, विश्वविद्यालय प्रशासन को सुझाव के साथ देती है.

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दोनों पक्ष अगर तैयार हों...

इसके साथ ही पीड़ित और जिसके ख़िलाफ़ शिकायत की गई, दोनों पक्षों को इस रिपोर्ट की एक-एक कॉपी भी दी जानी चाहिए.

जांच रिपोर्ट पर किसी भी पक्ष को अपील दायर करने के लिए 30 दिन का समय भी दिया जाता है.

शैक्षणिक संस्थान के पास भी एक महीने का समय होता है जिसके अंदर आईसीसी की जांच रिपोर्ट को प्रशासन स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है.

हालांकि दोनों पक्ष अगर तैयार हों तो, किसी भी समय दोनों पक्षों के बीच समझौता भी हो सकता है. इसमें कोई जुर्माना नहीं लगता है.

आईसीसी द्वारा दोनों ही पक्षों की पहचान को गोपनीय रखने का भी प्रावधान है.

सज़ा का प्रावधान

यौन उत्पीड़न की शिकायत सच पाए जाने पर सर्विस रूल के तहत कर्मचारी पर कार्रवाई की जाती है.

अगर आरोप दूसरे छात्र पर है तो छात्र का विशेषाधिकार ख़त्म किया जा सकता है जैसे लाइब्रेरी का पास, ऑडिटोरियम का इस्तेमाल, छात्रवृत्ति आदि.

छात्र को सस्पेंड भी किया जा सकता है या उसके संस्थान के प्रवेश पर रोक लगाई जा सकती है.

जेएनयू छात्र संघ की प्रेसीडेंट गीता कुमारी के मुताबिक पीड़ित छात्रों ने अभी तक आईसीसी में शिकायत ही नहीं की है.

उनके मुताबिक आईसीसी पर पीड़ित छात्रों का भरोसा नहीं है क्योंकि वहां के सदस्य प्रशासन की ही पैरवी करते हैं.

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