जेएनयू उत्पीड़न मामला: प्रोफ़ेसर जौहरी कुछ ही घंटे में ज़मानत पर रिहा

  • 20 मार्च 2018
जेएनयू

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में यौन उत्पीड़न के अभियुक्त प्रो़फ़ेसर अतुल जौहरी को पुलिस ने पांच दिन बाद गिरफ़्तार तो किया, लेकिन कुछ देर बाद ही उन्हें अदालत से ज़मानत मिल गई.

अतुल जौहरी के ख़िलाफ़ गुरुवार को उनकी आठ छात्राओं ने एफ़आईआर दर्ज कराई थी जिसमें उन पर लड़कियों को ग़लत तरीक़े से छूने, भद्दी टिप्पणियां करने और देर रात फ़ोन करने जैसे आरोप लगाए गए हैं.

जौहरी मंगलवार शाम पांच बजे पूछताछ के लिए वसंत कुंज थाने पहुंचे, जहां पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ़्तार किया गया.

रिमांड लेने के लिए पुलिस जौहरी को पटियाला हाउस कोर्ट लेकर गई जहां अदालत ने उन्हें ज़मानत दे दी.

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता दीपेंद्र पाठक ने कहा कि "दिल्ली पुलिस ने अदालत के सामने मामले से जुड़े सारे तथ्य रखे और अदालत को बताया कि अभियुक्त को आठ मामलों में गिरफ़्तार किया गया है. हमने अदालत में ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए ये भी कहा कि शिकायत करने वाली लड़कियों ने ऐसी आशंका जताई है कि प्रोफ़ेसर अपनी ताक़त का इस्तेमाल उन्हें डराने में कर सकते हैं. सारी दलीलें सुनने के बाद अदालत ने प्रोफ़ेसर जौहरी को इस शर्त पर ज़मानत दे दी कि वे जांच में किसी भी तरह का अडंगा नहीं लगाएंगे और लड़कियों को डराने-धमकाने की कोशिश नहीं करेंगे. साथ ही अदालत ने प्रोफ़ेसर जौहरी को सभी आठों मामलों में अलग-अलग 30 हज़ार रुपये का मुचलका भरने का आदेश दिया है. मामले की आगे जांच की जा रही है."

पुलिस सूत्रों के मुताबिक़ पूछताछ में प्रोफ़ेसर जौहरी ने अपने ऊपर लगे सारे आरोपों को निराधार बताया है. उनका कहना है कि अटेंडेंस को लेकर उनकी सख़्ती से नाराज़ छात्राएं उन्हें निशाना बना रही हैं.

कई दिन से चल रहे हैं विरोध प्रदर्शन

इस मामले में पिछले पांच दिन से विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. सोमवार रात जेएनयू के छात्र-छात्राओं ने वसंत कुंज थाने पर जमकर प्रदर्शन किया.

वहीं मंगलवार की दोपहर आइसा और ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन एसोसिएशन समेत कई महिला संगठनों ने पुलिस थाने का का घेराव किया.

प्रदर्शन में मौजूद आइसा यानी ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की नेशनल प्रेसीडेंट सुचेता डे ने कहा कि प्रोफ़ेसर जौहरी के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की जा रही क्योंकि वो एक ख़ास राजनीतिक पार्टी को पसंद करते हैं और जेएनयू के वाइस चांसलर के बेहद क़रीबी माने जाते हैं.

सुचेता के मुताबिक़, "अगर किसी आदमी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है तो उस पर कार्रवाई करने के लिए यह नहीं सोचना चाहिए कि वो किस राजनीतिक पार्टी को पसंद करता है या यूनिवर्सिटी प्रशासन से उसके कैसे नज़दीकी संबंध हैं. पांच दिन हो गए, फिर भी वाइस चांसलर ने अब तक कोई एक्शन नहीं लिया. अगर GSCASH होता तो अभी तक अभियुक्त प्रोफ़ेसर को सुओ मोटो नोटिस दे दिया जाता. साथ ही उन्हें रेस्ट्रेन ऑर्डर दे दिया गया होता और उन पर कार्रवाई शुरू हो गई होती. वो लैब में नहीं जा पाते ताकि लड़कियां बिना डर के पढ़ाई कर पाएं. लेकिन GSCASH को तो यूनिवर्सिटी प्रशासन ने हटा दिया. अब हालत ये है जेएनयू में कि लड़कियां पुलिस स्टेशन में हैं."

लड़कियां आईसीसी के पास क्यों नहीं गईं?

GSCASH यानी जेंडर सेंसिटाइज़ेशन कमेटी अगेंस्ट सेक्शुअल हैरेसमेंट जेएनयू की एक कमेटी थी जिसे पिछले साल ख़त्म कर दिया गया.

इसकी जगह इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (आईसीसी) बनाई गई जिसमें सारे नुमाइंदे वाइस चांसलर द्वारा नामित होते हैं.

जेएनयू में पढ़ने वाली और जीएसकैश की प्रतिनिधि रही स्वाति सिम्हा के मुताबिक़ GSCASH इसलिए लोकप्रिय था क्योंकि उसमें यूनिवर्सिटी के हर धड़े का प्रतिनिधि होता था और सारे सदस्य चुनाव के ज़रिये आते थे.

स्वाति के मुताबिक़ "GSCASH में टीचर्स यूनियन के चुने हुए लोग होते थे, छात्रों के प्रतिनिधि होते थे, कर्मचारी एसोसिएशन के लोग भी चुनकर आते थे. जबकि आईसीसी में बैठे सारे लोग वाइस चांसलर ने चुने हैं. अब अगर एक ही आदमी ये फ़ैसले करेगा कि कौन से मामले फ़र्ज़ी हैं, कौन से नहीं और किस पर हम कार्रवाई करेंगे तो उनसे इंसाफ़ की उम्मीद कैसे की जा सकती है?"

'आईसीसी ने अब तक कुछ नहीं किया'

स्वाति बताती हैं, "ऐसे ही एक और मामले में कुछ छात्राएं एक बार आईसीसी के पास गई भी थीं. एक बार ऐसा हो चुका है कि एक शिकायत को पुलिस ने आईसीसी के पास भेज दिया कि तुम देख लो इस मामले को. आईसीसी ने शिकायत करने वालों के नाम और नंबर को एक नोटिस सार्वजनिक रूप से दीवार पर चस्पा कर दिया कि तुम्हें इस समय पर बयान रिकॉर्ड कराने आना है. ऐसा कौन करता है? ज़ाहिर है लड़कियां उनके पास जाने से डरती हैं. इस बार भी उन्होंने आईसीसी के पास जाने से बेहतर पुलिस के पास जाना समझा."

सुचेता के मुताबिक़, "शिकायत सामने आने के बाद भी आईसीसी ने अब तक कुछ नहीं किया."

इस बात को आगे बढ़ाते हुए स्वाति कहती हैं कि "कोई ये नहीं कह रहा कि बिना जांच के किसी को दोषी क़रार दो, लेकिन कम से कम आईसीसी को मानना तो चाहिए कि उनकी यूनिवर्सिटी में लड़कियों को कोई शिकायत है. आईसीसी तो अभी भी सबसे यही कह रही है कि उसे कोई लिखित शिकायत नहीं दी गई. एफ़आईआर से बड़ी शिकायत क्या हो सकती है?"

टीचर्स एसोसिएशन ने भी जांच की मांग की

जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के सेक्रेट्री सुधीर कुमार भी इससे इत्तेफ़ाक रखते हैं. उनके मुताबिक़, "हमारा मानना है कि लड़कियों के आरोप बेहद संगीन हैं और उनकी पूरी जांच की जानी चाहिए. साथ ही यूनवर्सिटी प्रशासन को इस बात पर विचार करना चाहिए कि छात्र-छात्राओं को आज भी आईसीसी के मुक़ाबले GSCASH में भरोसा क्यों है. वो उसे ज़्यादा लोकतांत्रिक क्यों मानते हैं."

अतुल जौहरी जेएनयू के स्कूल ऑफ़ लाइफ़ साइंसेज़ में माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफ़ेसर हैं.

उनके ख़िलाफ़ शिकायत करने वाली आठ लड़कियों में से छह फ़िलहाल उनके नीचे रिसर्च स्कॉलर हैं.

एक उनकी पूर्व छात्रा है और आठवीं लड़की का कहना है कि उसने प्रोफ़ेसर जौहरी के उत्पीड़न से परेशान होकर उनके साथ रिसर्च छोड़ दी और कैंसर बायोलॉजी जॉइन कर ली.

लड़कियों ने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दे दिए हैं जिसके आधार पर पुलिस ने प्रोफ़ेसर जौहरी पर आईपीसी की धारा 354 और 509 के तहत मामला दर्ज किया है जो ग़ैर ज़मानती अपराध हैं.

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