बुआ-भतीजा साथ आए, लोहिया-आंबेडकर ऐसे चूक गए थे

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''मेरे लिए डॉक्टर आंबेडकर हिंदुस्तान की राजनीति के एक महान व्यक्ति थे और गांधीजी को छोड़कर बड़े से बड़े सवर्ण हिंदुओं के बराबर. इससे मुझे संतोष और विश्वास मिला है कि हिंदू धर्म की जातिप्रथा एक-न-एक दिन खत्म की जा सकती है.'' डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, एक जुलाई 1957

आंबेडकर के बारे में लोहिया के ये विचार अगर लोहियावादियों ने ध्यान से पढ़ा होता तो आंबेडकरवादियों से एकता करने में उन्हें 37 साल न लग जाते, दोनों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पहली बार 1993 में एक साथ आए.

और अगर इस बयान को आंबेडकरवादियों ने ध्यान से पढ़ा होता तो महात्मा गांधी को गाली देने की जगह, उनके महान शिष्य लोहिया के माध्यम से उनके विचारों को समझते. गांधी और आंबेडकर अपने विवाद का व्यावहारिक समाधान तो निकालते ही रहे हैं, लेकिन सैद्धांतिक समाधान अगर किसी के पास है तो वो लोहिया ही हैं.

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संयोग से उत्तर प्रदेश में अखिलेश और मायावती के बहाने लोहियावादियों और आंबेडरवादियों की नई एकता आज तूफान उठाए हुए है. उस एकता में सत्ता परिवर्तन की अल्पकालिक शक्ति तो है ही, उसके सैद्धांतिक समागम में व्यवस्था परिवर्तन की भी शक्ति छुपी है. सवाल है कि क्या सपा और बसपा इसे समझ रही है?

उत्तर प्रदेश के दो लोकसभा उपचुनावों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने एक साथ आकर कमाल तो किया है. उसी के कारण भाजपा फूलपुर में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सीट तो हारी ही, साथ ही गोरखपुर की अजेय कही जाने वाली योगी आदित्यनाथ की सीट भी गंवा बैठी.

कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर यह गठबंधन आगे भी रहा तो उत्तर प्रदेश में भाजपा को मुंह की खानी होगी. इस भावी गठबंधन को मज़बूत करने के लिए सपा समर्थकों ने आंबेडकर और बसपा वालों ने लोहिया के चित्रों के साथ प्रदर्शन किया है.

कैसे लोहिया और आंबेडकर मिलने से रह गए थे

1956 में लोहिया और आंबेडकर का मिलन होने से रह गया था और आज उनकी विरासत के दावेदार उस सपने को पूरा करने निकले हैं. सपा और बसपा के कार्यकर्ता गांवों में एक-दूसरे से प्रेम पूर्वक मिलने लगे हैं. विशेष तौर पर सपा से जुड़ी बीच वाली जातियों के लोग दलित जातियों के साथ अतिरिक्त आदर के साथ पेश आने लगे हैं.

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पता नहीं यह अखिलेश यादव का जादू है या सत्ता की कुंजी समझकर ऐसा बर्ताव हो रहा है. ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आंबेडकर और लोहिया किन मुद्दों पर समान रूप से सोचते थे, उनके मतभेद कहां थे और उनका मिलन भारतीय राजनीति में क्या भूचाल ला सकता था?

आंबेडकर और लोहिया दोनों के भीतर भारतीय जाति व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश की ज्वाला धधक रही थी. वे उसे भस्म करके दलितों, पिछड़ों, किसानों और मज़दूरों के लिए बराबरी पर आधारित समाज बनाना चाहते थे. लोहिया इसे समाजवाद का नाम देते थे, लेकिन आंबेडकर इसे गणतंत्र कहते थे.

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किस ओर बढ़ रहे हैं सपा-बसपा

यह सवाल उठता है कि क्या अखिलेश यादव और मायावती किसी बड़े सपने पर आधारित सैद्धांतिक मिलन की ओर बढ़ रहे हैं या अपनी सत्ता के लिए कोई काम चलाऊ जुगाड़ तैयार कर रहे हैं?

दरअसल, जुगाड़ वह उपकरण है जिसमें इंजन पंपिंग सेट का लगाया जाता है और पहिया टैक्ट्रर का. उसका रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं होता और उसकी जगह पर लिखा होता है- जय बाबा टिकैत या बम बम भोले.

जिन्हें भी सपा-बसपा के इस मिलन को एक दीर्घकालिक सैद्धांतिक औज़ार बनाना है उन्हें लोहिया और आंबेडकर के उस पत्राचार को जानना चाहिए जो उनके बीच में हुआ था और उनके भीतर के उस आक्रोश को भी समझना चाहिए जो वे समय-समय पर जाति व्यवस्था के घृणित रूप पर व्यक्त करते थे और जिस पर आजकल बड़े-बड़े नेता ख़ामोश रहना ही पसंद करते हैं या उसे सिर झुकाकर मान लेते हैं.

आंबेडकर चाहते थे कि वे अपनी शेड्यूल्ड कास्ट फ़ेडरेशन को भंग करके सर्वजन समावेशक रिपब्लिकन पार्टी बनाएँ. इसी उद्देश्य से उन्होंने लोहिया को पत्र लिखे थे.

कांग्रेस के ब्राह्मणवाद से लड़ने के लिए लोहिया को आंबेडकर जैसे दिग्गज बुद्धिजीवी का साथ चाहिए था, इसलिए लोहिया ने 10 दिसंबर 1955 को हैदराबाद से बाबा साहेब को पत्र लिखा.

''प्रिय डॉक्टर आंबेडकर, मैनकाइंड (अख़बार) पूरे मन से जाति समस्या को अपनी संपूर्णता में खोलकर रखने का प्रयत्न करेगा. इसलिए आप अपना कोई लेख भेज सकें तो प्रसन्नता होगी. आप जिस विषय पर चाहें, लिखिए. हमारे देश में प्रचलित जाति प्रथा के किसी पहलू पर आप लिखना पसंद करें, तो मैं चाहूंगा कि आप कुछ ऐसा लिखें कि हिंदुस्तान की जनता न सिर्फ़ क्रोधित हो बल्कि आश्चर्य भी करे. मैं चाहता हूं कि क्रोध के साथ दया भी जोड़नी चाहिए ताकि आप न सिर्फ़ अनुसूचित जातियों के नेता बनें बल्कि पूरी हिंदुस्तानी जनता के भी नेता बनें.

इसी पत्र में लोहिया ने लिखा, "मैं नहीं जानता कि समाजवादी दल के स्थापना सम्मेलन में आप की कोई दिलचस्पी होगी या नहीं. सम्मेलन में आप विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में आ सकते हैं. अन्य विषयों के अलावा सम्मेलन में खेत मजदूरों, कारीगरों, औरतों, और संसदीय काम से संबधित समस्याओं पर भी विचार होगा और इनमें से किसी एक पर आपको कुछ बात कहनी ही है.''

अलग-अलग व्यस्तताओं और कार्यक्रम में तालमेल न हो पाने के कारण, वे दोनों तो नहीं मिले, लेकिन लोहिया के दो मित्र विमल मेहरोत्रा और धर्मवीर गोस्वामी ने आंबेडकर से मुलाकात की. इस मुलाकात की पुष्टि करते हुए और उसके प्रति उत्साह दिखाते हुए आंबेडकर ने लोहिया को पत्र लिखा.

पत्र में उन्होंने लिखा, ''प्रिय डॉक्टर लोहिया, आपके दो मित्र मुझसे मिलने आए थे. मैंने उनसे काफ़ी देर तक बातचीत की. अखिल भारतीय शेड्यूल्ड कास्ट फ़ेडरेशन की कार्यसमिति की बैठक 30 सितंबर को होगी और मैं समिति के सामने आपके मित्रों का प्रस्ताव रख दूंगा. मैं चाहूंगा कि आपकी पार्टी के प्रमुख लोगों से बात हो सके ताकि हम लोग अंतिम रूप से तय कर सकें कि साथ होने के लिए हम लोग क्या कर सकते हैं. मुझे खुशी होगी अगर आप दिल्ली में मंगलवार 2 अक्तूबर 1956 को मेरे आवास पर आ सकें. अगर आप आ रहे हैं तो कृपया तार से मुझे सूचित करें ताकि मैं कार्यसमिति के कुछ लोगों को भी आपसे मिलने के लिए रोक सकूँ.''

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Image caption डॉक्टर बीआर आंबेडकर अपनी पत्नी डॉक्टर शारदा कबीर के साथ

धम्मदीक्षा के लिए आमंत्रण

ध्यान रखिए कि उसी महीने में आंबेडकर 14 अक्तूबर 1956 को नागपुर में धम्मदीक्षा लेने जा रहे थे. वहीं साथ में वे लोहिया को भी एक साथ आने के लिए आमंत्रित कर रहे थे. यानी वे धम्मक्रांति करने के बाद राजनीतिक क्रांति की तैयारी भी कर रहे थे और उस काम में लोहिया उन्हें अच्छे साथी लगे थे. इसी आशा के साथ उन्होंने धम्मदीक्षा लेने के बाद कहा था, ''मैं धम्मदीक्षा ग्रहण करने के बाद राजनीति नहीं छोड़ूंगा. बैट लेकर पैवेलियन में लौटने वाला खिलाड़ी नहीं हूँ.'' ध्यान देने की बात है कि बाबा साहेब अपने भाषणों में क्रिकेट की मिसालों का अक्सर इस्तेमाल करते थे.

लोहिया ने आंबेडकर का जवाब 1 अक्तूबर 1956 को लिखा, ''आपके 24 सितंबर के कृपा पत्र के लिए बहुत धन्यवाद! आपके सुझाए समय पर दिल्ली पहुंच पाने में बिल्कुल असमर्थ हूँ. फिर भी जल्दी से जल्दी आपसे मिलना चाहूंगा. आप से दिल्ली में 19 और 20 अक्तूबर को मिल सकूँगा. अगर आप 29 अक्तूबर को बंबई में हैं तो वहां आपसे मिल सकता हूं. कृपया मुझे तार से सूचित करें कि इन दोनों तारीखों में कौन सी तारीख़ आपके लिए ठीक रहेगी. आपकी सेहत के बारे में जानकर चिंता हुई. आशा है, आप अवश्य सावधानी बरत रहे होंगे. मैं केवल इतना कहूंगा कि हमारे देश में बौद्धिकता निढाल हो चुकी है. मैं आशा करता हूं कि यह वक्ती है और इसलिए आप जैसे लोगों का बिना रुके बोलना बहुत ज़रूरी है.''

इस बीच आंबेडकर से मिलने वाले लोहिया के मित्रों ने उन्हें 27 सितंबर को पत्र लिखकर पूरा ब्योरा दिया. विमल मेहरोत्रा और धर्मवीर गोस्वामी ने लोहिया को लिखा, ''हम लोग दिल्ली जाकर आंबेडकरजी से मिले. 75 मिनट तक बातचीत हुई, वे आपसे ज़रूर मिलना चाहेंगे. वे पार्टी का पूरा साहित्य चाहते हैं और 'मैनकाइंड' के सभी अंक. वे इसका पैसा देंगे. वे हमारी राय से सहमत थे कि श्री नेहरू हर एक दल को तोड़ना चाहते हैं जबकि विरोधी पक्ष को मज़बूत होना चाहिए. वे मजबूत जड़ों वाले एक नए राजनीतिक दल के पक्ष में हैं. वे नहीं समझते कि मार्क्सवादी ढंग का साम्यवाद या समाजवाद हिंदुस्तान के लिए लाभदायक होगा. लेकिन जब हम लोगों ने अपना दृष्टिकोण रखा तो उनकी दिलचस्पी बढ़ी.''

''हम लोगों ने उन्हें कानपुर के आम क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ने का न्योता दिया. इस ख़्याल को उन्होंने नापंसद नहीं किया, लेकिन कहा कि वे आपसे पूरे भारत के पैमाने पर बात करना चाहते हैं. ऐसा लगा कि वे अनुसूचित जाति संघ से ज़्यादा मोह नहीं रखते. श्री नेहरू के बारे में जानकारी लेने में उनकी ज़्यादा दिलचस्पी थी. वे दिल्ली से एक अंग्रेज़ी अखबार भी निकालना चाहते थे. वे हम लोगों के दृष्टिकोण को बहुत सहानुभूति, तबीयत और उत्सुकता के साथ, पूरे विस्तार से समझना चाहते थे. उन्होंने थोड़े विस्तार से इंग्लैंड की प्रजातांत्रिक प्रणाली की चर्चा की जिससे उम्मीदवार चुने जाते हैं और लगता है कि जनतंत्र में उनका दृढ़ विश्वास है.''

इससे आगे लोहिया अपने साथियों को लिखते हैं, ''डॉ. आंबेडकर को लिखी चिट्ठी की एक नकल भिजवा रहा हूं. अगर वे चाहते हैं कि मैं उनसे दिल्ली मिलूं तो तुम लोग भी वहां रह सकते हो. मेरा डॉ. आंबेडकर से मिलना राजनीतिक नतीजों के साथ इस बात की भी तारीफ़ होगी कि पिछड़ी जातियां उनके जैसे विद्वान पैदा कर सकती हैं.''

आंबेडकर ने लोहिया को 5 अक्तूबर को लिखा, ''आपका 1 अक्तूबर 1956 का पत्र मिला. अगर आप 20 अक्तूबर को मुझसे मिलना चाहते हैं तो मैं दिल्ली में रहूंगा. आपका स्वागत है. समय के लिए टेलीफ़ोन कर लेंगे.''

लेकिन मुलाकात का वह संयोग नहीं आया और आया छह दिसंबर 1956 का दुर्योग. उस दिन आंबेडकर का निधन हो गया और उनकी और लोहिया की संभावनाओं से भरी भेंट नहीं हो सकी. लेकिन डॉ. आंबेडकर के प्रति अपनी भावना व्यक्त करते हुए लोहिया ने मधु लिमये को जो पत्र लिखा वह बाबा साहेब के प्रति लोहिया के अगाध प्रेम और अपार सम्मान को व्यक्त करने वाला है.

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जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद पर आक्रोश

लोहिया ने लिमये को लिखा, ''मुझे डॉक्टर आंबेडकर से हुई बातचीत, उनसे संबंधित चिट्ठी-पत्री मिल गई है और उसे मैं तुम्हारे पास भिजवा रहा हूं. तुम समझ सकते हो कि डॉ.आंबेडकर की अचानक मौत का दुख मेरे लिए थोड़ा-बहुत व्यक्तिगत रहा है और वह अब भी है. मेरी बराबर आकांक्षा रही है कि वे मेरे साथ आएँ, केवल संगठन में नहीं, बल्कि पूरी तौर से सिद्धांत में भी और यह मौका क़रीब मालूम होता था. मैं एक पल के लिए भी नहीं चाहूंगा कि तुम इस पत्र व्यवहार को हम लोगों के व्यक्तिगत नुकसान की नजर से देखो. मेरे लिए डॉ. आंबेडकर हिंदुस्तान की राजनीति के एक महान आदमी थे और गांधीजी को छोड़कर वे बड़े से बड़े सवर्ण हिंदुओं के बराबर. इससे मुझे संतोष और विश्वास मिला है कि हिंदू धर्म की जाति प्रथा एक न एक दिन समाप्त की जा सकती है.''

अगर डॉ. आंबेडकर की 'रिडल्स इन हिंदुइज्म' किताब उनके जीवनकाल में इसलिए नहीं छप सकी क्योंकि उन्हें समय से वह चित्र नहीं मिल सका जिसमें राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद काशी में सौ ब्राह्मणों के पैर धोते दिखते हैं. उस किताब में डॉ. आंबेडकर ने लिखा है, ''अब ब्राह्मणों ने संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी. उन्होंने एक शरारतपूर्ण सिद्धांत का प्रतिपादन किया है. वह है वेदों के निर्भ्रांत होने का. यदि हिंदुओं की बुद्धि को ताला नहीं लग गया है और हिंदू सभ्यता और संस्कृति एक सड़ा हुआ तालाब नहीं बन गई है तो इस सिद्धांत को जड़मूल से उखाड़ फेंकना होगा.''

उधर बनारस में ब्राह्मणों के पद प्रक्षालन पर टिप्पणी करते हुए लोहिया लिखते हैं, ''भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति ने पुण्य नगरी बनारस में सार्वजनिक रूप से ब्राह्मणों के पैर धोए. सार्वजनिक रूप से किसी के पैर धोना अश्लीलता है. इस काम को करना दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए.''

आज जब वेदों में सारी आधुनिक विद्या होने का एलान किया जा रहा है, योगियों और साध्वियों के माध्यम से ब्राह्मणवाद नए सिरे से वापस लौट रहा है तब डॉ. आंबेडकर और डॉ. लोहिया के अनुयायियों के सामने व्यवस्था परिवर्तन की गंभीर लड़ाई उपस्थित है. क्या वे सिर्फ सत्ता परिवर्तन की तात्कालिक लड़ाई जीतने के लिए तमाम समझौते और जुगाड़ करेंगे या व्यवस्था परिवर्तन के सैद्धांतिक सवालों को उठाने का खतरा मोल लेंगे?

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