क्या विश्वास है किसी का अविश्वास प्रस्ताव में?

  • 21 मार्च 2018
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नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार को लोकसभा में उसके ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव से क्या वाकई डरने की ज़रूरत है, जैसा कि उसके विरोधी कह रहे हैं?

16 लोकसभा सदस्यों वाली तेलुगु देसम (टीडीपी) के सरकार और अंतत: एनडीए से भी अलग हो जाने और कुछ उप-चुनावों में हार के बाद लोकसभा में एनडीए का संख्या बल भले 336 से घटकर 314 रह गया हो, लेकिन वह इतना कम तो कतई नहीं कि सरकार वाईएसआर कांग्रेस और टीडीपी के अविश्वास प्रस्ताव जिसे कांग्रेस, तृणमूल समेत कई विपक्षी दलों ने समर्थन दिया है, से घबरा जाए?

फिर क्या वजह है कि अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा नहीं की शुरुआत का मुहूर्त नहीं बन पा रहा है?

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अविश्वास प्रस्ताव का नियम

संविधान में अविश्वास प्रस्ताव का कोई ज़िक्र नहीं है. हां, अनुच्छेद 118 के तहत हर सदन अपनी प्रक्रिया के नियम बना सकता है. अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित नियम 198 के तहत व्यवस्था है कि कोई भी सदस्य लोकसभा अध्यक्ष को सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे सकता है.

शर्त यह है कि नोटिस को अध्यक्ष जिस दिन की कार्यवाही का हिस्सा बनाएं और वह सदन के समक्ष आए तो उसके समर्थन में 50 सदस्यों को अपना समर्थन जताना होगा.

लेकिन सदन में हंगामा और संभ्रम (यानी अध्यक्ष का 50 सदस्यों की स्पष्ट गिनती करने में असमर्थ होना) की स्थिति में अविश्वास प्रस्ताव चर्चा के लिए नहीं लिया जा सकता.

लोकसभा अध्यक्ष इसी बिना पर अविश्वास प्रस्ताव चर्चा के लिए नहीं रख रही हैं कि सदस्य अपने आसनों पर नहीं बैठ रहे सो, उनके लिए 50 समर्थक सदस्यों की स्पष्ट गिनती करना असंभव है.

अब लोकसभा ही नहीं, राज्यसभा में भी पिछले 12-13 दिनों से क्या हो रहा है, यह सारा देश देख रहा है. हर रोज़ सदनों में कामकाज की न्यूनतम अवधि 4 मिनट और अधिकतम एक घंटा रही है. यहां तक कि बजट जैसा महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी बिना चर्चा के पारित हो गया और 20 मार्च को जब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इराक में मोसुल में 39 भारतीयों के आइएसआइएस के हाथों मारे जाने की शोकपूर्ण सूचना देने के लिए खड़ी हुर्इं तब भी हंगामा चलता रहा.

अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले आंध्र के दलों टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस के सदस्य सोमवार 20 मार्च को तो अपनी सीटों पर बैठे दिखे लेकिन सदन के बाहर उनका धरना-प्रदर्शन हर रोज़ जारी है.

यहां कि आंध्र प्रदेश में टीडीपी ने तो लाउडस्पीकरों के ज़रिए लोगों से अपने अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में मानवीय ऋंखला बनाने की अपील तक कर डाली इसका सदन में पेश अविश्वास प्रस्ताव से क्या लेना-देना?

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क्षेत्रीय दलों की संसद में हुंकार

उसके एक सांसद ने पत्रकारों से कहा कि टीडीपी अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए एनडीए सरकार गिराना नहीं चाहती, बल्कि आंध्र के लिए विशेष दर्जे के समर्थन में दूसरे विपक्षी दलों को इकठ्ठा करना चाहती है!

उधर, एआईएडीएमके और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के सदस्य नारे लगाते हुए हर रोज़ सदन के बीचोंबीच आ जाते हैं. एआईएडीएमके सदस्य कावेरी नदी जल बंटवारे पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में कावेरी प्रबंधन बोर्ड बनवाना चाहते हैं तो टीआरएस सदस्यों ने मनरेगा को कृषि मजदूरों से जोड़ने समेत कई मांगें लेकर सदन को सिर पर उठाया है.

एआईएडीएमके ने तो आरोप भी मढ़ दिया है कि टीडीपी दरअसल आंध्र को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग उठाकर तमिलनाडु के नदी जल संबंधी हितों की आवाज़ दबा रही है. इसमें पेंच यह है कि ये दोनों दल अविश्वास प्रस्ताव के समर्थक नहीं. यानी प्रकारांतर से सरकार के साथ हैं. इसलिए टीडीपी और उसके अविश्वास प्रस्ताव को समर्थन देने वाली दूसरी पार्टियों को कहने का मौका मिल गया है कि अपने इन समर्थक दलों के ज़रिए एनडीए सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा टाल रही है.

हालांकि, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और अनंत कुमार कह चुके हैं कि सरकार अविश्वास प्रस्ताव समेत हर एक विषय पर चर्चा के लिए तैयार है.

सरकार तैयार है और विपक्ष भी उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चाहता है. लेकिन बहस है कि हो नहीं रही! इसकी दो वजहें हो सकती हैं. पहली का संबंध आंध्र प्रदेश की राजनीति से है. आंध्र में वाइएसआर कांग्रेस ने विशेष दर्जे की मांग को लेकर टीडीपी की नाक में दम कर रखा है.

दूसरे, बीजेपी अपनी विस्तारक योजना के ज़रिए कार्यकर्ताओं को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में अपना आधार मज़बूत करने के लिए तैनात कर रही है जिससे ख़ासकर सत्तारुढ़ टीडीपी की सांसें फूली हुई हैं.

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अविश्वास प्रस्ताव में कांग्रेस की नहीं थी दिलचस्पी

टीडीपी समेत दूसरे विपक्षी दलों ने बीजेपी की पैर पसारने की इस योजना का चमत्कार उत्तर-पूर्व के राज्यों और त्रिपुरा में देख लिया है. टीडीपी के लिए वाइएसआर कांग्रेस और बीजेपी के विस्तारवादी इरादे दोहरी चुनौती खड़ी कर रहे हैं.

फिर सरकार उसके इस तर्क की भी आंकड़ों के साथ काट पेश कर रही है कि वादे के अनुरूप उसने आंध्र को नई राजधानी निर्माण, ग़रीबों के लिए घर जैसे कई कामों के लिए यथोचित रकम नहीं दी. इससे टीडीपी के लिए भविष्य संकटमय हो सकता है.

इसलिए पार्टी ने अपना सर्वोत्तम हित इसी में देखा कि विशेष दर्जे के नाम पर अविश्वास प्रस्ताव दूसरे विपक्षी दलों को जोड़कर माहौल बनाया जाए जिससे अगले लोकसभा चुनाव में उसकी सीटें बरकरार रह सकें. टीडीपी को मालूम है कि देश में आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जे की मांग दूसरे कुछ पिछड़े राज्यों की ऐसी ही मांगों के मद्देनज़र ज़्यादा लोगों के गले नहीं उतर रही.

उसके अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने वाले कांग्रेस, तृणमूल जैसे दल जानते हैं कि सदन की चर्चा में प्रधानमंत्री मोदी समेत हर किसी को बोलने का मौका मिलेगा. विपक्ष अपने तरकश का हर तीर तो सदन के बाहर ही चला चुका है जबकि सरकार उसकी खासकर कांग्रेस की बोलती बंद करने के लिए बहुत कुछ नया मसाला ला सकती है.

सरकार को अपने बहुमत के मद्देनज़र अविश्वास प्रस्ताव में जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखती, हालांकि मौका आया तो अपनी तैयारी सरकारी पक्ष साफ जता चुका है.

ऐसे में एक संभावना यह भी बनती है कि अप्रैल के शुरू में राज्यसभा के नए सदस्यों की शपथ विधि पूरी हो जाने के बाद सदन की बैठक अपना समय पूरा किए बिना अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो जाए.

यह चर्चा-बहस और मतभिन्नता के आधार पर चलने वाली हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कोई अच्छी बात न होगी.

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